क्रोध मनुष्य की नकारात्मक ऊर्जा
   Date06-Feb-2020

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धर्मधारा
क्रो ध जीवन का ऐसा नकारात्मक भाव है, जो कभी भी हमारे जीवन में प्रकट हो जाता है। यदि किसी को क्रोध करने की आदत हो गई है, क्रोध करने की प्रकृति हो गई है, तो वह क्रोध किए बिना रह नहीं पाता। बात-बात पर अपनी नाराजगी दिखाना, क्रोध करना अधिकांश लोगों के जीवन का स्वभाव हो गया है। जब क्रोध का यह गुबार उतरता है तो मन में पछतावा भी होता है कि अनावश्यक क्रोध किया गया, क्रोध करने से इतना नुकसान हो गया।
जब भी हमारा कोई कार्य पूरा नहीं होता, हमारे मन के अनुसार नहीं होता, जो हमें चाहिए, वह नहीं मिलता, इच्छा के विपरीत कार्य होता है, जबरदस्ती किसी कार्य को करना पड़ता है तो क्रोध आ जाता है। कहीं पर क्रोध प्रकट रूप में होता है और कहीं पर क्रोध आंतरिक भाव में होता है। प्रकट रूप में जो क्रोध आता है, उसका प्रभाव उपस्थितजनों पर भी पड़ता है, जिसके ऊपर आता है, अगर वह उपस्थित है तो उसे थोड़ी बहुत हानि भी पहुंच सकती है, क्योंकि क्रोध एक तरह की नकारात्मक ऊर्जा है, जिसका प्रक्षेपण क्रोध के समय होता है। यदि व्यक्ति का इस प्रक्षेपण पर नियंत्रण है तो ज्यादा परेशानी नहीं होती, लेकिन यदि इस प्रक्षेपण-प्रक्रिया पर नियंत्रण नहीं है, तो परेशानी हो सकती है।
क्रोध का आवेग जब व्यक्ति में धीमा होता है तो यह नियंत्रण में होता है, लेकिन यदि क्रोध का आवेग बहुत ज्यादा है तो व्यक्ति का स्वयं पर नियंत्रण नहीं होता। उस समय उसके अंदर सुनने-समझने की शक्ति नहीं होती। उस अवस्था में वह क्या करेगा, उसे स्वयं भी पता नहीं होता। वह कुछ भी कर सकता है, क्योंकि उस अवस्था में ऊर्जा का आवेग बहुत ज्यादा होता है। जिस तरह दूध जब उबलने लगता है तो उफनता है और यदि आंच को धीमा न किया जाए तो वह उफन कर बरतन से बाहर गिर जाता है, यही स्थिति क्रोध के समय व्यक्ति की होती है। उसकी ऊर्जा भी क्रोधरूपी तेज आंच के कारण उफन-उफनकर तेजी से बाहर गिरती है और उसके क्रोध को प्रकट करती है।
क्रोध की अवस्था में व्यक्ति यदि इस ऊर्जा को निकाल देता है तो जल्दी शांत भी हो जाता है और यदि इस ऊर्जा को दबा देता है तो वह कुंठा बन जाती है। अचेतन की परतों में दबती चली जाती है। क्रोध की अवस्था में ज्यादातर लोग दो तरह के तरीके अपनाते है- या तो वे अपने से कमजोर व्यक्ति पर अपना क्रोध, तेज आवाज में बोलकर या उसे नुकसान पहुंचाकर उतारते हैं या फिर सामान उठाकर इधर-उधर फेंककर अपने मन की भड़ास निकालते हैं। दूसरे तरीके में वे अपने क्रोध को दबा देते हैं, सहन कर लेते हैं, लेकिन ऐसा करने पर क्रोध दिखने में शांत दिखता प्रतीत होता है, दब जाता है, लेकिन यह दबा हुआ क्रोध, मन में घाव के रूप में रिसता रहता है और अचेतन को प्रभावित करता रहता है।
कहते हैं कि जब बहुत सन्नाटा दिखता है तो यह आने वाले तूफान की ओर इशारा करता है। जब पृथ्वी के अंदर टेक्नोनिक प्लेटों पर दबाव बढ़ता है, तभी भूकंप आता है। पृथ्वी की कमजोर सतहों से ही ज्वालामुखी फूटता है।