श्रम का गौरव
   Date05-Feb-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
पै से के अभाव में सभी विभागों में पर्याप्त आदमी नहीं जुट पाए हैं। कैसे काम होगा? कैसे समय पर अखबारों के बण्डल रेलवे स्टेशन तक पहुंचेंगे? कैसे ट्रेनों पर लदेंगे? पण्डित दीनदयालजी उपाध्याय ने सबकी समस्या सुन ली। उनकी कठिनाई को हृदयंगम कर लिया है। अपने मुँह से कुछ न कहते हुए चुपचाप काम में आकर लग गए। कहते हैं - तुम लोग कोई दूसरा काम करो। ग्राहकों के बिल मैं बनाए देता हूँ। घंटे दो घंटे में सारे बिल बनकर तैयार हो गए। बिल बनने पर भी उपाध्यायजी ने छुट्टी नहीं ली। इस समय वे संचालक नहीं, मात्र एक श्रमिक हैं। श्रम का गौरव उनके उज्ज्वल और प्रकाशमान नेत्रों से प्रतिबिम्बित हो उठा। अखबारों के बण्डल तैयार हो गए। उन्हें स्टेशन तक पहुंचाने के लिए कई आदमी चाहिए। पण्डितजी ने कहा - इसमें चिंता की कौन सी बात है, मैं भी तो हूँ। एक साइकिल मुझे भी दे दो। उस दिन राष्ट्रधर्म प्रकाशन के प्रबंध संचालक अखबारों के बण्डल स्टेशन पर ले गए और सबको ठीक समय से ट्रेनों पर चढ़ा दिए। सभी कर्मचारियों के साथ दीनदयालजी भी खुश थे।