भारतीय चिंतन में सभी धर्म से श्रेष्ठ राष्ट्रधर्म
   Date05-Feb-2020

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धर्मधारा
य दा-यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।. अभ्युथानम धर्मस्य: तदात्मन सृजन्याहम।। गीता के यह अमृत वचन वह ब्रह्म वाक्य है, जो युग-युग से हमारा मार्गदर्शन करते आ रहे हैं। यह भी एक यथार्थ है कि गीता के उपदेशों की सृजनहार कुरुक्षेत्र की रणभूमि बनी। तीर-तलवार, बरछी-ढाल, गदा-दांडीव और सुदर्शन चक्रय की छत्रछाया में श्रीजी के श्रीमुख से अवतरित शब्द गंगा गीता का संदेश सही मायने में राष्ट्रधर्म का संदेश है। उस दृश्य को आँखों के आगे सदृश्य करके देखिये - एक और भीष्म पितामाह, गुरु द्रोणाचार्य, धर्मराज कर्ण, जड़ों से जुड़े धर्म धारक व्यक्तित्व थे, मगर अराजकता और अधर्म के संरक्षक बने खड़े थे। दूसरी ओर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संदेश देकर राष्ट्रधर्म का शंखनाद कर रहे थे।
मनुष्य जन्म लेते ही जिस धर्म में बंधता है, वह उस जाति संप्रदाय के प्रति होता, जिसमें उसने जन्म लिया है। नई पौध जैसे-जैसे पौधे के रूप में विकसित होती है, स्वयं विविध धर्मों में बंधती चली जाती है। देव धरा भारतवर्ष में धर्म की पृष्ठभूमि पृथ्वी सी विशाल है, आकाश सी अनंत है। धर्म का आरंभ जन्म से होता है। माता, पिता, गुरु से लगाकर राजधर्म देवधर्म, राष्ट्रधर्म व्यक्ति पूरी उम्र धर्मपरायण होकर जीवन व्यतीत करता है। कोई भी जाति, कोई भी धर्म या कोई भी संप्रदाय, भाषा और शब्द भले पृथक-पृथक हो, मगर सभी धर्म मानवता की रक्षा के प्रबल पक्षधर हैं। राष्ट्रधर्म को सभी धर्मों में श्रेष्ठ माना गया है।
परमधर्म राष्ट्रधर्म है, क्योंकि मनुष्य जन्म से लेकर जीवन के अंत तक राष्ट्र का इतना ऋणी हो जाता है, वह राष्ट्र के ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकता है। जिस धरा पर हम जन्में, जहां की जलवायु में फुले-फले, जहां की मिट्टी में उगे अन्न से हम पोषित हुए, जिस राष्ट्र की धरा पर व्यापार व्यवसाय करके हम विकसित हुए, जिस राष्ट्रीय संपत्ति को हमने अपने अंशदान से स्थापित कर अखिल विश्व में अपने राष्ट्र की पहचान बनाई।