राजनीतिक वनवास के मायने...

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राजनीतिक वनवास कभी स्थायी नहीं होता.., हाँ, वह कभी-कभी अपनी अवधि बढ़ाता चला जाता है...देश का दिल कहलाने वाली दिल्ली यानी इंद्रप्रस्थ ने अपना राजनीतिक मानस प्रकट कर दिया है...जिसमें आम आदमी पार्टी यानी आआपा ने फिर ऐतिहासिक जनादेश के साथ सत्ता में वापसी का कमाल कर दिखाया...2015 में 70 विस सीटों वाली दिल्ली में आआपा को रिकॉर्ड 67, जबकि भाजपा को महज 3 सीटें मिली और कांग्रेस तो खाता भी नहीं खोल पाई थी...आज पांच वर्षों बाद भी कांग्रेस शून्य पर खड़ी है...यह तय भी था, क्योंकि वह (कांग्रेस) इस चुनाव में कहीं जमीन पर नहीं थी। हाँ, आआपा को सहयोग करने के मान से यह मैदान में कूदी और वही उसने किया भी...2015 की तुलना में 2020 में आआपा-भाजपा में भले ही वोट प्रतिशत का आंकड़ा व्यापक रूप से बदल गया हो, लेकिन सीटों के मान से आआपा को उतना ही नुकसान हुआ है, जितना भाजपा को लाभ...यानी कुल मिलाकर दिल्ली चुनाव में भाजपा की रणनीति केजरीवाल के पांच वर्षों के कार्यों चाहे हम उसे खैरात, मुफ्तखोरी कुछ भी नाम दें..,लेकिन सच्चाई यही है कि आमजन की समस्याओं के समाधान के वादे को कैसे भी निभाने के बदले ही आआपा को सत्ता में जनता ने वापस लौटाया है...अत: इसे न तो धार्मिक हार-जीत बताया जा सकता है और न ही इसे राष्ट्रवाद-सेकुलरवाद की हार-जीत के रूप में लिया जा सकता है..,बल्कि यह जनादेश उस जनता-जनार्दन की भाव अभिव्यक्ति है, जो 'महंगी दिल्लीÓ में अपने लिए सहज-सुलभ-रियायती शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पानी की तलाश में राजनीतिक वादों-इरादों को ही अपनी नियति मान बैठता है...अत: इन नतीजों को न तो भारत-पाक की हार-जीत के रूप में देखना और न ही नतीजों को जनता का केंद्र की रीति-नीति से मोहभंग हुआ है, इस तरह से लेना चाहिए...
इन चुनावी नतीजों को दिल्ली में आबादी के बदले परिदृश्य के रूप में भी देखने का प्रयास करना चाहिए..,क्योंकि जब-जब चुनाव सिर्फ एक मुद्दे पर फोकस होता है, तो उसके कारण अन्य मुद्दे व समीकरण गौण हो जाते हैं...जिससे चुनावी प्रचार के फलक पर, लेकिन उनका असर परिणामों पर दिखता है...एक माह से दिल्ली में भाजपा-आपापा और कांग्रेस हिन्दू-मुस्लिम, शाहीन बाग और राष्ट्रवाद, भारत-पाक जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहे..,लेकिन हम क्यों भूल जाते हैं कि 70 के दशक तक देश का दिल यानी दिल्ली पाकिस्तान से अपना सब-कुछ गंवाकर राजधानी को अपना आशियाना पंजाबी शरणार्थियों ने बनाया था...तब से लेकर 90 तक वे जनमत को प्रभावित करने की एकतरफा क्षमता रखते थे.., लेकिन दिल्ली की सामाजिक संरचना अब बहुत बदल चुकी है...आज दिल्ली में 30 प्रतिशत लोग तो पूर्वी भारत के रहते हैं...यह आबादी जाति-धर्म से परे सिर्फ रोजगार को ही अपना धर्म-कर्म मानती है...इसलिए उसका ध्यान छोटी-छोटी राहतों पर जल्दी जाता है...यानी औद्योगिक-वाणिज्यिक संबंधों से निर्देशित यहां की सामाजिक संरचना 'राजनीतिक सहाराÓ भी मांगती है...तभी तो अगर भाजपा ने चुनाव से पूर्व दिल्ली में डेढ़ हजार से ज्यादा अवैध कॉलोनियों को वैध करने की घोषणा की तो यह भी याद रखना चाहिए कि इन्हीं बस्तियों में पिछले पांच वर्षों से जल वितरण-सीवर की व्यवस्था आआपा सरकार ही कर रही थी...कहने का मतलब यही है कि जनता ने अपना तत्कालिक एवं दीर्घकालिक स्वार्थ या कहें हित-लाभ का मंथन करने के बाद ही ईवीएम का बटन दबाया है... परिणाम सबके सामने है...
भाजपा ने दिल्ली में अपना 20 वर्षों का राजनीतिक वनवास खत्म करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया था.., क्योंकि वह केंद्र में बैठकर राजधानी दिल्ली का अपने दृष्टि-पत्र के मान से विकास करना चाहती है...ऐसा करने के लिए प्रत्येक दल स्वतंत्र भी है...तभी तो भाजपा ने 'ब्रॉड मोदीÓ और केंद्र सरकार द्वारा 'राष्ट्रहितÓ में किए गए ऐतिहासिक निर्णयों, तीन तलाक, अनुच्छेद 370, 35-ए और नागरिकता संशोधन अधिनियम कानून के जरिए जनता का मानस दिल्ली में बदलने का प्रयास किया..,लेकिन प्रचार के दौरान जो विषैलापन प्रत्येक दल द्वारा बढ़ाया गया, वह हतप्रभ करता है...भाजपा को आखिर 70 सीटों पर 250 सांसदों की फौज खड़ा करना क्यों जरूरी था.., योगी की 12 सभाएं करवाना और गृहमंत्री शाह का घर-घर दस्तक देना, 35 सभा करना भी बदलाव का मंत्र नहीं बन सका....कारण साफ है कि भाजपा झारखंड की भांति फिर दिल्ली में बिना चेहरे के उतरी, यह रणनीति भविष्य में अन्य राज्यों में आत्मघाती सिद्ध होगी...यहां शाह के नेतृत्व की प्रशंसा करना चाहिए कि वे प्रत्येक चुनाव को पहला और अंंतिम मानकर लड़ते हैं...और कार्यकर्ताओं का मनोबल भी नहीं टूटने देते...लेकिन शाहीन बाग के मामले में भाजपा का केजरीवाल-आआपा पर हमलावर होना उलटा ही पड़ा..,क्योंकि कानून व्यवस्था तो केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है...उन्होंने प्रदर्शनकारियों को समय रहते क्यों नहीं उठाया...आआपा ने इसे ही भुनाया..,फिर हनुमान चालीसा का पाठ हो या मोदीजी की सभाएं, गत चुनाव (2015) की यानी 2 सभा करना भी केजरीवाल के लिए फायदेमंद रहा है...कहने का अर्थ यही है कि केंद्र के कार्यों, विकास एवं मुद्दों को कंधा बनाकर राज्य जीतने की रणनीति हर जगह सफल होगी..? इसकी कोई गारंटी नहीं है.., यह दिल्ली के नतीजों ने बता दिया है...
70 सीटों वाली दिल्ली में आआपा तीसरी बार सिरमौर रही है...और अगर भाजपा को लगातार दूसरी बार इकाई अंक से संतोष करना पड़ रहा है...तो उसे अपनी सर्वाधिक खर्चीली एवं सब-कुछ दांव पर लगा देने वाली प्रचार शैली का विश्लेषण करना चाहिए..,क्योंकि अगर केजरीवाल की आआपा ने जनता के करों से कमाई गई राशि को मुफ्त की योजनाएं चलाकर चुनावी जीत का मंत्र बना लिया है..,तो भाजपा भी कहां दूध की धुली है, उसने भी तो केजरीवाल की तोड़ में उसी मुफ्तखोरी वाली योजनाओं-घोषणाओं को घोषणा-पत्र में तरजीह दी थी...जनता का मानस सिर्फ ज्वलंत मुद्दों में कुछ समय के लिए बदला जा सकता है..,रोजगार, महंगाई और प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति सबसे पहली जरूरत है... यह बात राजनीतिक वनवास घटाने-बढ़ाने या खत्म करने का आधार बनती है...भाजपा शायद आआपा से इतर अपनी इस वनवास अवधि बढऩे को अन्य राज्यों के आईने में जितनी जल्दी देख लेगी, लाभ में रहेगी... श्चड्डह्म्द्वड्डह्म्ह्यद्धड्डद्मह्लद्ब८०ञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व