नेपाली सियासत से बेचैन चीन...
   Date28-Dec-2020

vishesh lekh_1  
नेपाल में पिछले तीन सालों से सरकार कमोबेश सामान्य गति से काम कर रही थी, तो यही अपने आप में एक उपलब्धि थी... दरअसल, उससे पहले के कई साल तक नेपाल लगातार राजनीतिक अस्थिरता से गुजरा था और शायद इसीलिए अपेक्षया स्थिरता के साथ सरकार का चलना एक खास बात मानी जा रही थी... रविवार को नेपाल में जो हुआ, उससे एक बार फिर राजनीतिक उथल-पुथल का नया दौर शुरू हो गया है... लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि चीन भारत के पड़ोसियों को हर हाल में भारत के खिलाफ भड़ाए रखने का खुराफाती खेल लगातार खेल रहा है... नेपाल के ताजे संकट पर चीन बेचैन है... तभी तो चीन हर हाल में नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन चाहता है ताकि भारत के इस पड़ोसी देश में वह साजिशों को अंजाम दे सके... इसलिए चीन कम्युनिस्ट पार्टी के बिखराव को देखकर बेचैन हो उठा है... ड्रैगन इस कदर परेशान हो उठा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी पार्टी से एक हाई लेवल टीम को काठमांडू जाकर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में टूट को रोकने को कहा है... चीनी राष्ट्रपति का यह फैसला नेपाल में राजदूत हाउ यांकी को मिली असफलता के बाद आया है... नेपाल में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मंत्रिमंडल की आपात बैठक में संसद को भंग करने का फैसला लिया और इसे राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी को भेज दिया... एक आकलन यह है कि मौजूदा संसदीय दल, केंद्रीय समिति और पार्टी सचिवालय में प्रधानमंत्री केपी ओली अपना बहुमत खो चुके हैं... इस मसले पर आंतरिक बैठक करने और उसका हल निकालने की कोशिश करने के बजाय उन्होंने संसद भंग करने का फैसला ले लिया... हैरानी की बात यह है कि जिस फैसले से नेपाल में फिलहाल राजनीतिक तौर पर व्यापक उथल-पुथल मच सकती है, उस पर राष्ट्रपति ने मंजूरी देने में देर नहीं लगाई... उन्होंने ओली सरकार की सिफारिश के मुताबिक देश की संसद यानी प्रतिनिधि सभा को भंग करने के बाद आनन-फानन में मध्यावधि चुनावों की घोषणा कर दी... दिलचस्प यह है कि इस बार यह संकट वहां के विपक्षी दलों या आम जनता की ओर से किसी विरोध आंदोलन का नतीजा नहीं है, बल्कि खुद सत्ताधारी खेमे के भीतर ही महत्वाकांक्षाओं की होड़ और आपसी खींचतान की वजह से यह स्थिति पैदा हुई... इसे खुद नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने सार्वजनिक रूप से जाहिर किया कि कुछ नेताओं की अवांछित गतिविधियों के कारण ऐसे हालात पैदा हुए... हालांकि बीते कुछ समय से सत्ताधारी दल के भीतर मौजूद दोनों खेमों के बीच परोक्ष रूप से खींचतान चल रही थी और इसे अंदरूनी तौर पर सत्ता-संघर्ष के रूप में देखा जा रहा था... पार्टी के शीर्ष नेताओं की ओर से ओली पर एकतरफा नीतिगत फैसले लेने के आरोप लगाए जा रहे थे... सवाल यह भी है कि क्या इसका आखिरी हल संसद को भंग करना ही था..! आने वाले समय में नेपाल की सियासत किस करवट बैठती है, इसी पर तय होगा कि आने वाले समय में नेपाल चीन के पाले में जाएगा या भारत के साथ उसके परंपरागत संबंधों को मजबूत करेगा...
दृष्टिकोण
बदलते मौसम के साथ प्रदूषण...
राजधानी दिल्ली से लेकर अन्य राज्यों में बढ़ते प्रदूषण को लेकर हमारी तैयारी व सुधार की स्थितियां जस की तस हैं... मौसम में बदलाव के साथ यह कृत्रिम प्रदूषण समस्याएं और बढ़ा देता है... बढ़ते प्रदूषण को हमने अभी भी गंभीरता से लेना शुरू नहीं किया है और उसके नतीजे आएदिन हमें सताने लगे हैं। देश के एक बड़े इलाके में ठंड, कोहरे और प्रदूषण का आलम है। राष्ट्रीय राजधानी की अगर हम बात करें, तो वायु गुणवत्ता फिर एक बार खतरनाक स्तर पर है... वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 400 से ऊपर चल रहा है... दिल्ली से भी बुरी स्थिति गाजियाबाद, ग्रेटर नोएडा, नोएडा और फरीदाबाद की है... इससे पता चलता है कि हम वायु प्रदूषण रोकने के प्रति बहुत समर्पित नहीं हैं... द लांसेट प्लेनेटरी हेल्थ में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, भारत में साल 2019 में वायु प्रदूषण के चलते 17 लाख मौतें हुईं, जो देश में होने वाली कुल मौतों का 18 प्रतिशत थी... कुल मिलाकर, हमारी अर्थव्यवस्था पर भी इसका बड़ा असर पड़ रहा है... सकल घरेलू उत्पाद में हमें 1.4 प्रतिशत का नुकसान झेलना पड़ा है... यह सीधे-सीधे 2,60,000 करोड़ रुपए का नुकसान है... इतने भारी नुकसान के बावजूद हम प्रदूषण की अनदेखी कर रहे हैं... हम यही सोचते हैं कि हमारे अकेले के गंदगी फैलाने से क्या होता है..? हम सफाई करने वालों और सरकारों पर जिम्मेदारी डालकर खुद को भुलावा देते हैं, जबकि प्रदूषण एक ऐसी कमी है, जिसका सामना खुद हमें भी करना पड़ता है... कहीं किसी को होने वाला छोटा फायदा हम सबके लिए एक बड़े नुकसान में बदल जाता है...