राष्ट्रभक्ति
   Date28-Dec-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
अ पने ढाई वर्ष के अमेरिकी प्रवास में स्वामी रामतीर्थ को भेंटस्वरूप जो प्रचुर धनराशि मिली थी, वह सब उन्होंने अन्य देशों के मुमुक्षितों के लिए समर्पित कर दी। उनके पास रह गई केवल एक अमेरिकी पोशाक। स्वामी रामतीर्थ अमेरिका से वापस लौट आने के बाद एक दिन वह पोशाक पहनने लगे। कोट-पैंट तो पहनने के बजाय उन्होंने कंधों से लटका लिए और अमेरिकी जूते पांव में डालकर खड़े हो गए, किन्तु कीमती टोपी की जगह उन्होंने अपना सादा साफ ही सिर पर बांधा। पूछा गया- आपने इतना सुंदर हैट तो पहना ही नहीं, तब उन्होंने बड़ी मस्ती से जवाब दिया- राम के सिर-माथे पर तो हमेशा महान भारत ही रहेगा, अलबत्ता अमेरिका पांवों में पड़ा रह सकता है। इतना कहकर उन्होंने नीचे झुककर मातृभूमि की मिट्टी उठाई और माथे पर लगा ली। इस छोटी-सी घटना से उनकी भारत भक्ति प्रकट होती है। भारत का गौरव ऐसे ही ऋषि-मुनियों और सज्जनों ने देश में ही नहीं, विदेश में भी बढ़ाया।