पं. नेहरू के दृष्टिदोष की उपज बलूचिस्तान
   Date28-Dec-2020

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विवेक भटनागर
स नातन परंपरा के बलूचों पर पाकिस्तान की इमरान सरकार और आईएसआई लगातार अत्याचार कर रही और अब बलूचों को अरबी मूल का सबित करने में लगी है, लेकिन दुर्भाग्य से भारत सरकार इतिहास के इस स्वरूप पर 1947 से ही आंखें मूंदे बैठी है।
बलूचिस्तान की जानी-मानी राजनीतिक कार्यकर्ता और बलूच स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन की पूर्व अध्यक्ष करीमा बलूच का शव कनाडा के टोरंटो में पाया गया। इसके बाद से एक बार फिर पाकिस्तानी डायसपोरा और विश्व के बलूच समर्थकों के बीच यह घटना चर्चा का विषय बनी हुई है। बलूच समस्या पर कोई भी बोलने को तैयार नहीं है। बलूच जो एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में 1947 में प्रगटा, आज पाकिस्तान के खूनी पंजों में फंसा है। वहीं पाकिस्तान की फौजी सरकार बलूचिस्तान की पोप्युलेशन डेमोग्राफी बदलने में लगी है। इधर, गूगल और विकीपीडिया एक षड्यंत्र रच रहे हैं और पाकिस्तान के प्रभाव में आकार बलूचों को अरबी मूल का सिद्ध करने में लगे हैं। यह मीडिया प्लेटफॉर्म दावा कर रहे हैं कि बलूच भारत से अलग नस्ल है, यह सेमेटिक मूल (अफ्रो-एशियाई) की सीरिया निवासी जनजाति है। साथ ही वे यह भी साबित करने में लगे हैं कि बलूचिस्तान ईरानी सम्राज्य के प्रांत कामरान और सीस्तान का हिस्सा है। इसके विपरीत जब हम चचनामा पढ़ते हैं तो यह एक बौद्ध दर्शन को मानने वाली भारतीय सनातनी परिवार की एक शाखा है और इसका विस्तार दक्षिणी ईरान तक है। इनकी संस्कृति भारतीय है। ईरानी संस्कृति भी भारतीय है। इसे पूरे खित्ते (क्षेत्र) में भारतीय संस्कृति के सिवा कुछ नहीं है। अगर यूरोप एक संस्कृति है तो भारत भी एक संस्कृति है। यह समझना जरूरी है।
कैस्पियन के पूर्व छोर से मेकांग के मैदान तक और आमूर दरिया से अंटार्कटिक तक कुछ भी देख लें और पढ़ लें, सब कुछ एक संस्कृति का उत्पाद है। अब सिंधू का पूर्वी किनारा हो या नर्मदा के नीचे सब कुछ एक है। राखीगढ़ी से मिले कंकाल के अध्ययन ने इसे और सुस्पष्ट कर दिया है कि इस पूरे खित्ते में हम एक ही नस्ल के हैं, हमारा डीएनए और रक्त संबंध एक है। फिर यहां कोई सिंधू घाटी सभ्यता या बलूच कबीला होने की बात ही कैसे कर सकता है। बलूच सिंधु घाटी सभ्यता के मूल लोग नहीं, सिंधु सभ्यता भारतीय मूल के लोगों ने विकसित की थी। इसके साक्ष्य मौजूद हैं, लेकिन इन्हें नकारकर पहले तुर्कों ने और बाद में अंग्रेजों ने हमें अपने मूल से भटकाने का प्रयास किया। मेहरगढ़ सिंधु को सबसे पुराने स्थलों में से एक पुरावेत्ताओं ने माना है, ऐसे में भारत से बलूच अलग कैसे हो सकते हैं और वे सेमेटिक कैसे हो सकते हैं?
गंगा के पश्चिमी दहाने से लेकर सुलेमान, किरथर और चगाई की पहाडिय़ों तक और आमू दरिया से थार के रेगिस्तान तक अगर देखें, तो मौसम, पारिस्थितिकी तंत्र और भू-स्थिैतिकी का प्रभाव यहां के निवासियों के नैन-नक्श, रंग-रूप और वस्त्र विन्यास एक-सा बना देती है। यहां तक कि भोजन और मसाले भी एक से हैं। रीति-रिवाज और रूढ़ परम्पराएं भी देखें, तो सेमेटिक धर्म इस्लाम के इस क्षेत्र में प्रभाव के बावजूद इनमें अत्यधिक बदलाव नहीं हो पाया है। सिंधु घाटी की लिपि को नहीं पढ़ पाने का दावा ही अब तो गलत लगने लगा है, क्योंकि इसका ब्राह्मी से तुलनात्मक संरूपण नहीं किया जाना अंग्रेजों और वर्तमान पुरावेत्ताओं की मंशा पर भी सवाल उठा देता है। वहीं लिपि चिह्नों का पुराअध्ययन यह प्रमाणित करता है कि यह कोई लिपि नहीं है, बल्कि कुछ संरूपणों को प्रदर्शित करने की कूट विधि है। इसे वैदिक निकाय से अलग करके देखना नहीं चाहिए। इनकी भाषा संस्कृत है और यह मूर्तिपूजक नहीं होकर सनातनियों के समान यज्ञों के प्रवक्ता है। सिंधु सभ्यता के अवशेष बलूचिस्तान में बड़ी संख्या में हैं, लेकिन युद्ध और पाकिस्तानी हुकूमत के कारण यहां पर इनका अध्ययन कम ही हो पाया है। देवी सती के 52 शक्तिपीठों में से एक हिंगलाज भवानी का पीठ लस्बेला बलूचिस्तान में स्थित है, इससे भी स्पष्ट है कि यह सनातन क्षेत्र है।
व्यापक समस्या 652 ईस्वी में राशिदुन खलीफा उमर के बलूच क्षेत्र पर हमला करना और उसका कामरान नामकरण कर अपने साम्राज्य का अंग बना लेने से शुरू होती है। उमर ने दस्त-ए-लुत के रेगिस्तान तक ही खुद को सीमित रखा। इसके बाद चौथे राशिदुन खलीफा और मोहम्मद के चचाजात भाई और दामाद अली की खिलाफत सिंधु के पश्चिमी हिस्से ने अरबों के रक्तचरित्र को देखा, लस्बेला और मकरान तक लूट हुई, हमारे बच्चों को तक मारा गया और औरतों का बलात्कार किया गया, उन्हें माल-ए-गनीमत के रूप में बगदाद से कुफा तक के बाजारों में नीलाम किया गया और आज उसी प्रताडि़त क्षेत्र को सीरियन मूल के लोगों का बनाने का षड्यंत्र वैश्विक स्तर पर हो रहा है। भारत सरकार इतिहास के इस स्वरूप पर 1947 से ही आंखें मूंदे बैठी है। अली के शासन के पूरा होने के बाद बलूचिस्तान में एक राष्ट्रवाद की लहर आती है और 663 ईस्वी में कलात (बलूचिस्तान) खिलाफत सम्राज्य से मुक्त हो जाता है। इसके बाद उम्मायदों का सेनापति हज्जाज बिन यूसुफ इस पर कब्जा कर लेता है।
12वीं सदी तक एक बार फिर यह भारतीय क्षत्रियों के शासन में रहता है। जामोट राजपूत शासक यहां पर शासन करने लगते हैं। यह स्वयं को सम्मां राजवंश का वंश अर्थात् हिन्दुशाही वंश के उत्तराधिकारी मानते थे। अब सभी इस्लाम को स्वीकार कर चुके हैं, लेकिन इनमें एक छोटा भाग अब तक हिन्दू है। यहां पर कुछ समय के लिए सिंध के लासी राजपूतों ने भी शासन किया। इसका वर्णन अंग्रेज इतिहासकार कर्नल टॉड अपनी पुस्तक 'एनाल्स एंड एंटिक्विटिज ऑफ राजस्थानÓ में करता है और वह यह भी दावा करता है कि बलूच का मूल राजपूतों से ही शासित था और यही बाद में इस्लाम को मानने लगे। आज के बलूच कबीलों के सरदार मूल राजपूत हैं और इन्हें अरबी मूल का बताकर भारत की संस्कृति से अलग करने का प्रयास किया जा रहा है। इनकी मूल भाषाएं ब्राहुई, सरायकी और पश्तों में से एक का भी अरबी से कोई लेना-देना नहीं है, यह पैशाची प्राकृत से उद्घृत है। इनमें ब्राहुई की लिपि ब्राह्मी और भाषा तमिल है। 16वीं सदी में बलूचिस्तान मुगलों के अधिकार में आ गया और अंत में ब्रिटिश शासन में शामिल हो गया।
1944 में इसे अंग्रेजों ने स्वतंत्र घोषित कर दिया और इसकी एक एम्बेसी कराची में खोली गई। 1947 में कलात के खान मीर अहमद खान यार अहमदजई और वहां के कांग्रेस नेता अब्दुस्समद अचकजई ने कलात को भारत में शामिल करने की अनुशंसा की थी, लेकिन भारत के तत्कालीन शिक्षामंत्री मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि यह क्षेत्र भारत से अत्यधिक दूर है, जबकि राजस्थान से इसकी दूरी मात्र 169 मील थी। इनके मना करने के बाद पाकिस्तान को खुला हाथ मिला और उसने कलात पर हमला कर उसे पाकिस्तानी राज्य का हिस्सा बना लिया। इसके साथ ही जवाहरलाल नेहरू ने एक सामरिक गलती भी की। ग्वादर, जिसे मकरान के नाम से भी जाना जाता है, अंग्रेजों के शासन में उनके भारतीय साम्राज्य के अरबी राज्य ओमान का बंदरगाह माना जाता था। इस बंदरगाह को ओमान का अमीर भारत को एक करोड़ की राशि के बदले सौंप रहा था, लेकिन दृष्टिदोष से पडि़त नेहरू इसका सामरिक महत्व समझ नहीं पाए और इसे लेने से इनकार कर दिया। अगर ग्वादर भारत के अधिकार में रहता तो शायद पाकिस्तान बलूचिस्तान की राजनीति स्थिति और सामरिक स्थिति को बदल नहीं पाता। आज बलूचिस्तान एक समस्या से अधिक पाकिस्तान आतंकवाद का शिकार है। दुनिया इसे पाकिस्तान का अंदरूनी मामला कहकर नकार रही है, इस समस्या का हल भारत में आतंकवाद और कश्मीर के पाकिस्तानी अलगाववाद दोनों को समाप्त कर सकता है, साथ ही अफगानिस्तान को भी स्थिर देश बना सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)