आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ा मामा बालेश्वरदयाल ने
   Date26-Dec-2020

se8_1  H x W: 0
रामस्वरूप मंत्री
मामा बालेश्वर दयाल का राजनीतिक जीवन इटावा (उत्तर प्रदेश) में स्कूल में पढ़ते समय ही गॉंधी के अहिंसक ऑंदोलन की व्यापकता और का्रंतिकारी ऑंदोलन की उग्रता के बीच अंकुरित हुआ। 1923 में उन्हे स्कूल से निकाल दिया गया क्योंकि उन्होंने अपने अंग्रेज़ अध्यापक को पीट दिया था जो गॉंधी के खि़लाफ़ बोल रहा था। पिता की डांट के डर से उज्जैन के एक दोस्त के मामा के घर चले गये। कुछ दिन वहां एक स्कूल में अध्यापक की नौकरी करी। केरल में गुरूवायुर मंदिर में दलितों को प्रवेश दिलवाने के आंदोलन से प्रभावित होकर यहॉं भी उन्होने एक मंदिर में दलितों से प्रशाद बॅंटवाने की कोशिष की। कुछ ही समय में यहॉं से भी भागना पड़ा।
1931 में चंद्रशेखर आज़ाद की मृत्यु के बाद उनकी मॉं से मिलने झाबुआ के भाबरा गॉंव, यह सोचकर गये कि उनकी मॉं अकेली होगी। वहॉं उनकी मुलाकात आज़ाद के एक बचपन के साथी - भीमा से हुईं। भीमा के साथ भाबरा में रहकर काम करने का निर्णय ले लिया। 1932 में झाबुआ जि़ले के थांदला के एक स्कूल में हैड मास्टर की नौकरी पाकर वहां आ गये। धीरे धीरे जिले के भीलों के बीच इतने रम गये कि यहीं अपना घर बना लिया और पूरा जीवन बिता दिया।
1939 में मामा जी पास के, इंदौर रियासत के गॉंव, बामनिया आ गये - जो अॅंत तक उनका निवास स्थान और आंदोलनों का केन्द्र रहा। बामनिया में इन्होने एक डूंगर विद्यापीठ नामक स्कूल शुरू किया जिसमें आदिवासी बच्चों को अपने साथ रख कर पढ़ाना शुरू कर दिया। स्कूल में पन्द्रह बच्चे चुन चुन कर रखे थे - ष्जिनकी दाढ़ी मूछ अभी नहीं निकली थी, कुछ लड़कियों को भी रखाश्। इन्हे पढऩे लिखने के साथ साथ राजनीति के क - ख की शिक्षा दी। अर्जियां लिखना सिखाया और सरकारी नियम कानूनों की जानकारी दी। लोगों से सम्पर्क कर उनकी समस्याओं को समझना सिखाया। जब ये पन्द्रह प्यारे कुछ बड़े हो गये तो इन्हे पूरे आदिवासी क्षेत्र में स्कूल खोल कर वहॉं भेज दिया। झाबुआ, धार, रतलाम, बांसवाड़ा, डूंगरपुर आदि जि़लों में स्कूल खोले गये। इन्ही पन्द्रह शिक्षकों नें अपने छात्रों को साथ लेकर मामा जी के संदेश का पूरे इलाके में प्रचार किया। मामाजी नें इस काम को लंबे समय तक चलाने की दृष्टि से संसद से लेकर गॉंव तक का संगठनात्मक ढांचा तैयार किया। इन पन्द्रह प्यारों में से अधिकांश, आगे चलकर विधायक और सांसद बने। आगे चलकर इन्होने ही मामा जी की जन जागृति की आग को सात आठ जि़लों में फैला दिया। इस इलाके के भील स्थानीय राजाओं की वेठ बेगार से बहुत त्रस्त थे। राजा का नियम था कि चोखियार - उच्च जाति के लोग - को बेगार माफ़ थी। मामा जी नें तिकड़म लगाई और पुरी के शंकराचार्य से मिलकर आदिवासियों को जनेउ पहनाने की अनुमति ले ली। शंकराचार्य का आदेश आया कि दारू मास छोड़ो और जनेउ पहनो। बस मामा जी ने इंदौर के कृष्ण कांत व्यास से कहकर इस बात के तीन लाख परचे छपवाये। गांॅव गॉंव में खबर पहुंॅचाई। प्रचार का ज़बरदस्त असर हुआ और हज़ारों की संख्या में आदिवासी दूर दूर से बामनिया आने लगे। जनेउ पहन कर आदिवासियों को राजा की बेगार नहीं करनी पड़ती थी हालॉंकि इसके लिये लोगों को गांव गांव में कड़ा संघर्ष करना पड़ा। बेगार विराधी ऑंदोलन इस भील क्षेत्र की बारह रियासतों में फैल गया। बेगार के साथ साथ अकाल के समय में जबरन कर वसूली के विरोध में भी आंदोलन छेड़ा।
राजाओं व कर्मचारियों की दमनकारी नीतियों का विरोध करने के साथ मामा जी ने सामाजिक मुद्दों पर भी काम किया। भीलों में नशाबंदी का लंबा ऑंदोलन चला। शराब पीने में आई कमी के चलते राजा की शराब के ठेकों से आमदनी बहुत कम हो गई। मामा जी की इन हरकतों के कारण राजाओं और पादरियों नें मिलकर मामा जी की शिकायतें करीं जिसके फल स्वरूप 1942 में महू के रेसीडेन्ट नें उन्हे इस क्षेत्र की नौ रियासतों से देश निकाला करने का आदेश दे दिया। कुछ दिन मामाजी को इंदौर की छावनी जेल में रखा गया। बाद में अहमदाबाद के एक होटल में पुलिस पहरे में रखा गया। मामा जी को जब पता चला कि सरकारी खर्च पर उन्हे होटल में रखा गया है तो उन्होने बामनिया बांसवाड़ा और कुशलगढ़ के लोगों को मिलने के लिये बुला लिया। बड़ी संख्या में लोग उनसे मिलने आने लगे। होटल का खर्च इतना बढ़ गया कि सरकार नें उन्हे छोड़ दिया। छूटने के बाद वे दाहोद में रहने लगे। माताजी ने जागीरी प्रथा और राजाओं की वेठ बेगार के खि़लाफ़ ज़ोरदार आंदोलन छेड़ दिया। कश्मीर में हुई - देशी राज्य परिषद बैठक में नेहरू नें इन्हे बुलाया। वहांॅ मामाजी नें जागीरी प्रथा के कारण आदिवासियों की बर्बादी की कहानी नेहरू को सुनाई। उनकी बातें सुनकर नेहरू नें कहा - .''स्वतंत्रता की पहली किरण के साथ ही जागीरें ख़त्म की जायेंगीÓÓ। इस कथन अनुसार मामाजी नें सारे इलाके में पर्चे छपवा कर बंटवा दिये। परन्तु देश आज़ाद होने के बाद सारे जागीरदार कॉन्ग्रेस में शामिल हो गये। और जागीरें ख़त्म करने की बात को ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। नेहरू को याद दिलाने पर भी, कुछ न होता देख मामाजी ने कॉन्ग्रेस से स्तीफ़ा दे दिया और जागीरदारों को लगान न देने का आंदोलन छेड़ दिया। इस आंदोलन में आदिवासी भारी संख्या में उमड़ पड़े। छ: महीनों तक यह सिलसिला चलता रहा। 1949 में इसी संबंध में एक मीटिंग करके उदयपुर से लौटते समय मामाजी को रेल रोक कर गिरफ़तार कर लिया गया। साढ़े आठ महीने उन्हे टोंक जेल में रखा गया। बाहर लोगों का आंदोलन ज़ोर पर था। आंदोलन की खबरें अखबारों में छप रहीं थीं। यह अनूठा उदाहरण है जहॉं एक स्वतंत्रता सेनानी आज़ादी के बाद भी जेल में था। खबर पढ़कर समाजवादी पार्टी के जयप्रकाश नारायण ने बामनिया आकर मीटिंग की। उनकी मीटिंग से इस क्षेत्र में इस पार्टी का प्रचार हो गया और लोगों नें इसकी निशानी स्वरूप लाल टोपी पहननी शुरू कर दी। धीरे धीरे यह लाल टोपी मामा जी के आंदोलन की पर्याय बन गई। सरकारी कर्मचारी व शहरवासी, मामा जी से जुड़े लोगों को लाल टूपिया कहने लगे और इन्हे अब कॉंग्रेस की सफ़ेद टोपी का विरोधी के रूप में देखा जाने लगा। खैर, इस तरह मामा जी की बात भारत के प्रथम वाइसरॉय श्री राजागोपालचारी तक पहुंची और उन्होने इस क्षेत्र की रियासतों को खारिज करने का एक आदेश जारी कर दिया और मामा जी को भी रिहा करवा दिया। आदिवासियों में आई इस जन जागृति को मामा जी ने मुख्यधारा की राजनीती से जोड़ा जिसके फलस्वरूप आज़ादी के बाद के पहले आम चुनावों में इस पूरे क्षेत्र में मामा जी से जुड़े आदिवासी कार्यकर्ता विधायक और सांसद चुने गये। 1952 के पहले मध्य प्रदश विधान सभा चुनाव में झाबुआ की पॉंचों सीटों से समाजवादी कार्यकर्ता जीते। इनमें जमना देवी भी थीं जो बाद में उप मुख्य मंत्री भी बनीं। राजस्थान में जसोदा बहन विधान सभा में जाने वाली पहली महिला विधायक थीं। सन् 71 में जब पूरे देष में इंदिरा गॉंधी की लहर थी, बॉसवाड़ा में मामा जी के सहयोगी 45 हज़ार वोट से जीते थे। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि मामा जी नें समाजवादी पार्टी को देश के इस आदिवासी क्षेत्र में पहचान दिलाई। पश्चिम भारत के इन जि़लों की खासियत यह है कि यहॉं अधिकांॅश आदिवासी रहते हैं और थोड़े बहुत अन्य जातियों के लोग गॉंवों से घिरे छोटे छोटे बाज़ारों में रहते हैं। इसीलिये आदिवासी इन्हे बज़ारिया या शहरिया भी कहते हैं।
( लेखक सोशलिस्ट पार्टी मध्य प्रदेश के अध्यक्ष हैं)