अमेरिकी बागडोर बाइडेन के हाथों में...
   Date09-Nov-2020

vishesh lekh_1  
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को लेकर स्थिति लगभग साफ हो चुकी है... बाइडेन अमेरिका के राष्ट्रपति पद हेतु चुन लिए गए हैं... इस बीच ऐसी संभावनाएं मतगणना के दिन से ही व्यक्त की जा रही थी, लेकिन उसी दिन से ट्रंप का व्यवहार पद के अनुरूप नहीं था... वर्तमान राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिक्रिया या कहें कि उनकी जीत विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा करने वाले अमेरिका में हास्यास्पद स्थिति निर्मित कर रही है... आखिर जनता के जनादेश को लेकर कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि वह पद नहीं छोड़ेगा... क्या यह जनादेश को ठेंगा दिखाने जैसा नहीं है..? शायद उनसे कोई और उम्मीद भी नहीं थी... पिछले चार साल में यह शिकायत आमतौर पर सुनाई देती थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तौर-तरीकों में वह गरिमा नहीं है, जो दुनिया के सबसे ताकतवर शख्स में होनी चाहिए... पूरे चार साल तक वह कहीं भी, कुछ भी उलटा-सीधा बोलने के लिए कुख्यात रहे और अब जब वह हारते दिख रहे हैं, तब यह सोचना व्यर्थ है कि वह उस सलीके से पेश आएंगे, जो किसी लोकतंत्र में जनता के आदेश को स्वीकार करने के लिए जरूरी होता है... फिलहाल यह कहना तो ठीक नहीं है कि वे पूरी तरह हार ही गए हैं, मतगणना अभी जारी है और टक्कर कांटे की है... इसलिए ट्रंप के बर्ताव में जो खीझ दिख रही है, वह दरअसल मनमुताबिक नतीजे न आने की खीझ है... या शायद इन्हीं नतीजों में उन्होंने अपनी हार को सूंघ लिया है और परेशान हो गए हैं... मंगलवार की शाम को उन्होंने अपनी जीत का ऐलान कर दिया था... बुधवार से ही उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया था कि चुनाव में धांधली हुई है और उनके साथ धोखा हुआ है... शुक्रवार को उन्होंने व्हाइट हाउस में बाकायदा पत्रकारों के सामने कहा कि उन्हें हराने के लिए चुनाव में धांधली की गई... उनका कहना था कि अगर कानूनी वोट गिने जाएं, तो वह जीते हुए हैं, लेकिन गैरकानूनी वोटों की वजह से वह हार रहे हैं... उसके बाद उन्होंने न इस धांधली के कोई सुबूत दिए और न ही पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए... ये कौन से वोट हैं, जिन्हें वह गैरकानूनी बता रहे हैं..? दरअसल इस बार अमेरिका में बड़ी संख्या में मतदाताओं ने डाक से वोट दिए हैं... कोरोना संक्रमण के चलते ऐसे बहुत से मतदाता हैं, जिन्होंने मतदान केंद्र तक जाकर भीड़ में वोट देना बेहतर नहीं समझा और डाक वाले विकल्प को चुना... यह भी कहा जाता है कि ये वे मतदाता हैं, जिन्हें संक्रमण रोकने संबंधी ट्रंप प्रशासन की व्यवस्थाओं पर यकीन नहीं था और इसलिए भी उन्होंने यह विकल्प चुना... जाहिर है कि ऐसे मतदाताओं के ज्यादातर वोट ट्रंप के खिलाफ ही पडऩे थे... डाक से आए मतपत्रों को गिनने में ज्यादा समय लगता है, इसलिए इस बार अमेरिका की मतगणना प्रक्रिया काफी लंबी हो गई है। ट्रंप को भी अपनी खीझ दिखाने के लिए लंबा समय मिल गया है... अमेरिकी बागडोर बाइडेन के हाथों में आने के बाद उम्मीद की जा सकती है कि भारत के साथ अमेरिका के संबंध और बेहतर आयाम लेंगे...
दृष्टिकोण
करतारपुर में पाक की साजिश...
पाकिस्तान की सरकार, सेना, आईएसआई और कट्टरपंथी धड़े अपना पूरा ध्यान एवं शक्ति सिर्फ भारत के खिलाफ आग उगलने, षड्यंत्र रचने में ही खर्च कर रहे हैं... यह किसी षड्यंत्र और साजिश से कम नहीं है कि गुरुद्वारे में गैर सिख लोगों को तैनात किया जाए... करतारपुर गलियारा खुले अभी एक साल पूरा भी नहीं हुआ कि पाकिस्तान ने फिर ऐसा कदम उठाया, जो सिख समुदाय की भावनाओं आहत करने और भारत को चिढ़ाने वाला है... इस बार पाकिस्तान ने करतारपुर साहिब की बाहरी जमीन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया... इस जमीन की देखभाल का जिम्मा एक परियोजना प्रबंधन इकाई (पीएमयू) करेगी और यह इवैक्यू ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) के अधीन काम करेगी... जाहिर है, इस सारी कवायद का मकसद बाहरी जमीन की देखभाल की आड़ में गुरुद्वारे के प्रबंधन में दखल देना और किसी बहाने उस पर नियंत्रण रखना है... सवाल है कि आखिर पाकिस्तान को इस तरह का विवादास्पद कदम उठाने की जरूरत ही क्यों पड़ी... क्या वह इस हकीकत से अनजान है कि करतारपुर साहिब सिखों का एक पवित्र धार्मिक स्थल है और उसे लेकर उठाया गया कोई भी विवादास्पद कदम सिख समुदाय को बर्दाश्त नहीं होगा..? और वह भी एक ऐसे मौके पर जब करतारपुर गलियारा खुलने को एक साल होने जा रहा है। ऐसे मौके पर तो बेहतर यह होता कि पाकिस्तान करतारपुर साहिब के लिए कोई ऐसा काम या ऐलान करता, जिसकी भारत और सिख समुदाय दोनों तारीफ करते और सौहार्दपूर्ण माहौल बनता...