साधना मार्ग पर मोह बड़ा अवरोधक
   Date09-Nov-2020

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धर्मधारा
इ स संसार में जिसे भी हम अपना मानने लगते हैं, उससे हमें मोह हो जाता है, फिर उसे हम छोडऩा नहीं चाहते। हमें किसी से ज्यादा तो किसी से कम मोह हो सकता है। मोह किसी से भी हो सकता है-व्यक्ति, वस्तु, जगह या परिस्थिति से और मोहवश हम उसे छोडऩा नहीं चाहते। उसके छूटने पर हम दु:खी हो जाते हैं, रोते हैं और उसके मिलने पर सुख अनुभव करते हैं, लेकिन कुछ समय साथ रहने पर सब कुछ सामान्य-सा लगता है-यही तो माया है। साधना के प्रगति मार्ग पर मोह एक बहुत बड़ा अवरोधक है और इसे मनोविकार की संज्ञा दी गई है; क्योंकि मोह जड़ता का प्रतीक है, जो विवेक को जाग्रत नहीं होने देता। जब तक कोई भी साधक किसी भी प्रकार के विकार से ग्रस्त है, तब तक वह साधना के क्षेत्र में नहीं उतर सकता। साधना निर्विकार की परिणति है। जब विचार गिर जाएँ, मोह और ममता की दीवार ढह जाए, तभी साधक को साधना की अनुभूति हो पाती है। परमात्मा ने मनुष्य को निर्विकार, सरल और सौम्य जीवन जीने के लिए उत्पन्न किया, लेकिन मनुष्य ने अपने चारों ओर मोह और ममता का मायाजाल निर्मित करके स्वयं को फँसा लिया। जितने दु:ख, चिंता और भय को आमंत्रण देकर हमने अपने जीवन में बुलाया है, वे सब हमारी कल्पना के फल हैं। ईश्वर ने हमारे लिए कोई जाल नहीं बनाया, हमने स्वयं अपने हाथों से जालों को बनाया है और स्वयं उनमें फँसते गए हैं। मोह का मायाजाल व्यक्ति की अपनी मानसिक रुग्णता का परिणाम है। जिस प्रकार रस्सी को सांप समझकर हम भागने लगते हैं और बाद में वस्तुस्थिति समझकर अपनी ही मूर्खता पर मुस्कराने लगते हैं, ठीक वही स्थिति उन मनुष्यों की भी होती है, जो अकारण किसी वस्तु से मोहग्रस्त हो जाते हैं और फिर पछताते हैं। मोह के कारण जिस वस्तु से पहले लगाव महसूस होता है, बाद में वही वस्तु काँटे की तरह चुभने लगती है। वस्तुओं का संग्रह और उनसे लगाव मोह की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। वस्तुओं का संग्रह कर हम तृप्त होना चाहते हैं और जब संग्रहकर्ता को उससे संतोष नहीं होता और मोह के कारण और अधिक संग्रह की लिप्सा बढ़ती जाती है, तब पता चलता है कि इस संग्रह की प्रवृत्ति का मायाजाल कितना बढ़ता जा रहा है। मोह के कारण जिन वस्तुओं का अधिक से अधिक संग्रह हम करना चाहते हैं, अगर उन वस्तुओं से मन से संतोष और आनंद को अनुभूति न हो तो बड़ी निराशा होती है।