मानवता का दम घोंट रही इस्लामिक धर्मांधता...
   Date08-Nov-2020

parmar shakti_1 &nbs
ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
आ ज पूरा विश्व एक पुरानी, लेकिन नए स्वरूप वाली भयावह समस्या से जूझता नजर आ रहा है... कट्टरपंथी, चरमपंथी या कहें मजहबी कट्टरवाद का एक ऐसा दुष्चक्र पूरे विश्व को अपने शिकंजे में लेने को आक्रामकता के साथ थोपा जा रहा है, जिसका समाधान बहुत आसान नहीं है... फ्रांस के नीस शहर में चर्च में जिस तरह से आतंकवादियों ने चाकू-छुरे के द्वारा निर्दोष लोगों के गले रेतते हुए वीभत्स-घृणित माहौल में 'अल्लाह-हू-अकबरÓ की अट्टहासभरी ध्वनि निकाली, यह वास्तविकता में इस्लाम की पवित्रता और प्रेरणा पर एक ऐसा दाग है, जो पांचों समय की नमाज अता करने के बाद भी मिटने वाला नहीं है... आखिर वह कौन-सा धर्म है, जो निर्दोषों के खून के साथ हिंसक-रक्तपात वाले खूनी खेल को मजहब के लिए अनिवार्य अंग के रूप में देखने का आदी हो चुका है... क्या इसे हम मजहबी धर्मांधता या कहें कि ऐसी वीभत्स कट्टरता नहीं मान सकते, जो सिर्फ लोगों पर प्रासंगिकता खो चुके अपने बेहूदा विचार थोपने का दमनचक्र चल रहा है..?
याद करें 2008-09 का वह दौर, जब सीरिया व इराक में दुर्दांत आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) ने खून-खराबे का एक ऐसा दौर चलाया कि पूरा विश्व सिहर उठा... उस समय अलबगदादी और उसके इस्लामिक स्टेट ने आतंकवादियों के चेहरों पर काले नकाब डालकर निर्दोष लोगों के सामूहिक नरसंहार के लगातार जो वीडियो जारी किए थे, उसके बाद पूरी दुनिया अपने अस्तित्व पर खुला खतरा मंडराते हुए देखकर इस घृणित आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता की बात करने लगी थी... उस समय पढ़े-लिखे मुस्लिम नौजवानों की भी एक बड़ी फौज इस्लामिक स्टेट के दुष्चक्र में फंसकर सीरिया का रुख करती नजर आई थी... अलबगदादी ने इस्लामिक स्टेट के ऐसे असंख्य आतंकवादी लड़ाके की फौज बनाना भी शुरू कर दी थी... अपनी ही पैदा किए इस जिन्न के साथ इस्लामिक स्टेट तो खत्म हो गया, लेकिन उसके घृणित विचार आज भी देश-दुनिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर बार-बार अट्टहास कर रहे हैं... फ्रांस में कुछ वर्षों पूर्व व्यंग्य पत्रिका चार्ली हेब्डो पर आतंकवादियों ने इसलिए हमला किया था कि उन्होंने मोहम्मद पैगंबर का कार्टून बनाया था... इस घृणित हमले में 12 से अधिक पत्रकार और रचनाकार मारे गए थे... अब फ्रांस की चर्च में हमला, उसके बाद काबुल के विश्वविद्यालय में बुक मेले में आतंकवादियों का कायरना कृत्य, फिर आस्ट्रिया में 26/11 जैसे आतंकी हमले की करतूतें और फिर बांग्लादेश में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों और मंदिरों को ध्वस्त करने जैसे घृणित कृत्य... सवाल खड़े करता है कि आखिर कौन-सा धर्म इसकी पैरवी करता है या सीख देता है..?
विश्व की पूरी मानवता के लिए खतरा बन चुके इस चरमपंथी, कट्टरपंथी और मजहबी धर्मांधता का एक स्याह पक्ष यह भी है कि आखिर दुनिया के तमाम धर्मों, पंथों, समुदायों और उपासना पद्धतियों से इतर हर किसी पर हावी होने और उन सबमें अपने को सर्वश्रेष्ठ बताने या कहें थोपने की यह घृणित मानसिकता आखिर इस्लाम को क्या, पूरे विश्व की आंखों की किरकिरी बनाने का कारण नहीं बन रही है..? वह भी उन कुछ मुट्ठीभर कट्टरपंथी धड़ों के कारण जो अपने मजहब की, अपनी सुविधा, स्वार्थ के लिए अलग-अलग ढंग से या कहें मौकापरस्ती के मान से परिभाषा गढ़ते हैं... फ्रांस में आतंकवादी हमला होता है, उस हमले में शामिल आतंकियों को अगर कोई उनके धर्म की या उसके धर्म प्रमुख की नसीहत देकर सुधरने का सवाल करता है तो उसमें गुनाह क्या है..?
फ्रांस के राष्ट्रपति एमेनुएल मैक्रोन ने जब चर्च के आतंकी हमले के बाद घोषणा की कि उनका देश आतंकवाद के आगे झुकेगा नहीं.., ऐसा स्पष्ट व दृढ़ भाव उन प्रत्येक देशों का होना चाहिए, जो इस्लामिक स्टेट जैसी बर्बर मानसिकता के लगातार शिकार हुए हैं... क्या हर बार आतंकवादी हमलों में अपने सैकड़ों निर्दोष लोगों की लाशें गिरने के बाद भी ऐसे बर्बर आतताइयों को मजहब की ढाल लगाकर बचने का मौका देना अपने ही अस्तित्व पर सवाल खड़े करने जैसा है... फ्रांस की घोषणा का हाथों-हाथ भारत ने समर्थन किया... वैसे भारत हमेशा से किसी भी देश में आतंकवाद के खिलाफ हमेशा से खड़ा रहा है.., लेकिन अब सवाल यह उठता है कि जब-जब भारत ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक मंचों पर आतंकवाद के पोषणकर्ताओं, उनके पनाहगारों को घेरने की रणनीति आगे बढ़ाई, तब कितने देश भारत के स्वर को दृढ़ता से मजबूत करते नजर आए..? फ्रांस के आतंकवादी हमले के बाद भारत का रुख पहले दिन से स्पष्ट है, लेकिन अमेरिका, चीन से लेकर अन्य देशों की मजहबी आतंकवाद और इससे भी बढ़कर इसकी कट्टरता को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है... तभी तो पुर्तगाल, सूडान या फिर फ्रांस ने मोहम्मद पैगंबर के विवादित कार्टून बनते हैं और विरोध-प्रदर्शन वह भी हिंसक-अराजक भारत की सड़कों पर ताबड़तोड़ क्यों होता है..?
आखिर भारत में बड़ी संख्या में रहने वाले उन तथाकथित अल्पसंख्यकों को उस समय सांप क्यों सूंघ गया, जब पाकिस्तान के मंत्री ने अपनी संसद में टेबल ठोंककर दम भरा था कि पुलवामा हमला पाकिस्तान की इमरान सरकार की सफलता है... तब भारतीय मुसलमानों को क्या एकजुटता के साथ पाक दूतावास के समक्ष ही नहीं, पूरे देश में पाकिस्तान के झंडे जलाकर इमरान खान के पुतले को जूते नहीं लगाना था..? लेकिन तब एक भी मुस्लिम पाकिस्तान के इस कृत्य पर शोक, क्षोभ या आक्रोश प्रकट करता नजर नहीं आया... लेकिन फ्रांस के राष्ट्रपति के खिलाफ भोपाल से लेकर सुदूर वनवासी जोबट तक में अपशब्द लिखे पोस्टर लगाने में किसी को तनिक भी शर्म नहीं आई... क्या इससे बड़ा कोई राष्ट्रघात हो सकता है..? इसमें भी मौकापरस्ती कितनी खूब है कि भारत में फ्रांस के खिलाफ तो बड़ा प्रदर्शन करने में देर नहीं लगाई... क्योंकि उन्होंने इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ हुंकार भरी थी... लेकिन चीनी उइगर मुस्लिमों का कत्लेआम पर आज तक किसी भी मुस्लिम संगठन ने चीन का विरोध नहीं किया...
किसी भी धर्म के देवी-देवता या आराध्यों के व्यंग्यात्मक, उपहास करने वाले चित्र, कार्टून बनाना या इस तरह के भद्दी टीका-टिप्पणी मान्य नहीं है... क्योंकि सभी धर्म का समान रूप से सभी देशों व देशवासियों को आदर करना चाहिए... लेकिन भारत में रहकर, भारत का ही खाकर, भारत के हितों के खिलाफ बोलने वालों को क्या समय रहते सबक सिखाने की जरूरत नहीं है..? जब देश की संसद कानूनी तरीके से और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के जरिये जम्मू-कश्मीर अनुच्छेद 370 एवं 35ए का सर्वमान्य रूप से खात्मा कर चुकी है, तब उसके पक्ष में बार-बार बेहूदे तर्क रखना फारुख अब्दुल्ला या मेहबूबा मुफ्ती के राष्ट्रीय चरित्र को बेनकाब नहीं कर रहा है..? तिरंगे का अपमान करना और सार्वजनिक मंच से इसकी घोषणा क्या एक वर्ग-विशेष को हिंसा-अराजकता के लिए भड़काने जैसा नहीं है..? आखिर भारत में रहकर और भारत की खाकर कोई पाकिस्तान की भाषा में भारत के साथ कैसे पेश आ सकता है..? आखिर भारतीय मुस्लिमों ने फ्रांस के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए यह भोंडी मांग किसकी शह पर रखी कि भारत सरकार फ्रांस से संबंध तोड़े..? क्या ऐसे लोगों ने कभी तुर्की के भारत विरोधी बयानों पर ऐसी बात कही कि भारत सरकार तुर्की के खिलाफ सख्त कदम उठाए..? कहने का तात्पर्य यही है कि अपने धर्म को राष्ट्र से ऊपर रखने की घृणित मानसिकता या थोपने वाला घृणित विचार ही मानवता का दम घोंटने का कारण बनती है... क्योंकि मजहब को अपनी स्वार्थी सुविधा के हिसाब से जो देखा जा रहा है...