अर्थव्यवस्था से जुड़ी उम्मीदें...
   Date06-Nov-2020

vishesh lekh_1  
कोरोनाकाल को पस्त करके भारतीय अर्थव्यवस्था उम्मीद जगाने वाले संकेत करने लगी है... क्योंकि जिस तरह से जीएसटी संग्रह में बढ़ोतरी वह भी रिकार्ड रूप में दर्ज की गई है, वह बहुत मायने रखती है... जबकि राज्यों के लिए जीएसटी क्षतिपूर्ति की राशि भी एकमुश्त में केन्द्र सरकार ने जारी करके राज्यों की आर्थिक स्थिति को गति देने का बड़ा निर्णय लिया है... त्योहारों का समय चल रहा है, दीप पर्व पर जिस तरह से बाजार में रौनक लौट रही है, कारोबारी गतिविधियां बढ़ रही हैं और उस मान से यह कहना स्वाभाविक है कि आने वाले वित्तीय वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था एक नए आयाम के लिए अपनी यात्रा प्रारंभ कर देगी... क्योंकि ऑटो मोबाइल सेक्टर से लेकर अधोसंरचनात्मक गतिविधियां तेजी से बढऩे लगी हैं... निर्माण कार्यों ने भी रफ्तार पकड़ ली है.., जिसका रोजगार की दृष्टि से व्यापक असर देखने को आने वाले समय में मिलेगा... बिहार से मजदूरों को बड़ी कंपनियां, उद्योग स्वयं का खर्च वहन करके बुलाने लगे हैं... यानी उत्पादन के साथ ही उसकी खपत का भी ग्राफ बढऩे लगा है, तभी तो कोरोनाकाल में मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, लखनऊ व अन्य बड़े शहरों से पलायन करके बिहार गए मजदूरों को बिना काम के कौन बुलाता..? ये ऐसे कुछ पहलू हैं, जिनको सकारात्मक दृष्टि से देखें और आने वाली फसलों, मौसम को ध्यान में रखें तो आर्थिक स्थितियां तेजी से सुधार का संकेत कर रही हैं... पिछले दिनों ऐसे कई संकेत अर्थव्यवस्था से जुड़े मिले, जिनसे यह पता चलता है कि कोरोनाकाल में भी भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षा से अधिक गति से पटरी पर लौट रही है... इसकी एक झलक के रूप में यह कह सकते हैं कि पहली छमाही में सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़े पिछले साल की इसी अवधि की जीडीपी की तुलना में 1.05 लाख करोड़ रुपए से अधिक है... बिजली की मांग देशभर में 12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, यानी कोरोनाकाल में जो उद्योग या इकाइयां बंद हो चुकी थीं, उनमें निर्माण गतिविधियां प्रारंभ हो चुकी हैं... दलहन-तिलहन फसलों के मान से अधिक बारिश के चलते यह फसल चक्र तो नुकसानदायक रहा, लेकिन आने वाली फसलों के लिए पर्याप्त वर्षा के चलते बेहतर संकेत अभी से मिल रहे हैं... यानी गेहूं, चना, राई, मसूर व अन्य फसलों से आर्थिक स्थिति ग्रामीण व कस्बाई क्षेत्रों में मजबूत हो सकेगी... कहने का तात्पर्य यह है कि जीएसटी संग्रह का बढऩा अपने आप में अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत है... क्योंकि जब कंपनियों, औद्योगिक संगठन, उत्पादन इकाइयों को कुछ लाभ दिखा या उनके उत्पादन-निर्माण को गति मिली, तभी तो जीएसटी के रूप में उन्होंने अपना हिस्सा वहन किया... ठीक उसी तरह से सरकार ने भी राज्यों के हिस्से की क्षतिपूर्ति हेतु वह राशि जारी करने में देर नहीं लगाई... ऐसे में आने वाला समय कोरोना से लड़कर भी हम आर्थिक रूप से मजबूती से खड़े होंगे...
दृष्टिकोण
पटाखों पर प्रतिबंध का निर्णय...
किसी भी उत्सव, उत्साह की अभिव्यक्ति के लिए पटाखों का उपयोग परंपरागत रूप से किया ही जाता है... कुल मिलाकर आवाज के साथ खुशियों का इजहार हमारी परंपरा का एक प्रतीक है... लेकिन इसके साथ यह भी ध्यान रखना होगा कि जब हम कोई उत्सव मनाएं या आतिशबाजी का आनंद लें तो उसका विपरीत असर नहीं होना चाहिए... इसलिए कम आवाज वाले या फिर पर्यावरण को हानि न पहुंचाने वाले या कहें कि सबके अनुकूल रहे, ऐसी आतिशबाजी जरूरी भी है... अगर प्रदेश की शिवराजसिंह सरकार ने दीपोत्सव के एक सप्ताह पूर्व यह निर्णय लिया है कि प्रदेश में चीनी पटाखों को विशेष रूप से देवी-देवताओं की छाप वाले आतिशबाजी का बेचना-खरीदना पूर्ण प्रतिबंधित है... अगर ऐसा कोई करता है तो उसके लिए बकायदा सजा का प्रावधान है... यह निर्णय सवालों के घेरे वाला भी नहीं है और ऐसा सरकार ने किन कारणों से किया, यह भी चर्चा का विषय नहीं है... हर किसी के लिए स्पष्ट है कि किसी भी धर्म के देवी-देवता का अपमान अक्षम्य अपराध है... फिर लक्ष्मीजी व अन्य देवी-देवताओं की छाप वाले पटाखों की बिक्री अनुमति नहीं होना चाहिए... साथ ही विदेशी पटाखे विशेष रूप से जब चीन के साथ भारत का लंबे समय से तनाव चल रहा है, तब चीनी उत्पाद भारत के किसी भी राज्य में क्यों और किसलिए बेचे जाए..? इसका भी ध्यान रखना होगा... इन दोनों निर्णयों के पूर्व सरकार को यह विचार करना था कि जिन व्यापारियों और ग्रामीण क्षेत्र के कारोबारियों ने ऐसे पटाखे, आतिशबाजी निर्णय से पूर्व खरीद लिए हैं, कारोबारी की दृष्टि से उन्होंने क्या गुनाह किया..? क्या यह निर्णय और पहले नहीं लिया जा सकता था..?