सामूहिक चेतना का संकल्प पत्र राष्ट्रीय शिक्षा नीति
   Date06-Nov-2020

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डॉ. सत्येन्द्र किशोर मिश्र
रा ष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत के शैक्षणिक परिदृश्य में आमूलचूल बदलाव का नजरिया रखती है। इसके सफल क्रियान्वयन हेतु नीति की भावना और प्रयोजन सबसे अहम पहलू हैं, जिसके लिए सभी हितधारकों से सच्ची प्रतिबद्धता की दरकार है। सफल क्रियान्वयन हेतु मानव, संरचनागत और वित्तीय संसाधनों को समय से जुटाना होगा। अकसर अनेक बेहतर नीतियां कतिपय वजहों जैसे अत्यधिक आशावादी अपेक्षाएं, बिखरी प्रशासकीय व्यवस्था, कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति तथा नीति निर्धारण में भटकाव के कारण क्रियान्वयन में असफल होती रही हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति सोच में दूरदर्शी के साथ लक्ष्य, उद्देश्यों तथा तरीकों में अत्यंत व्यापक है। ऐसी उम्मीद रखना कि मौजूदा प्रशासन तंत्र एवं प्रक्रियाएं उन्हें प्राप्त करने में सक्षम होंगे, उचित नहीं होगा। इसे लागू करने में किन प्रक्रियाओं की आवश्यकता होगी तथा कैसे, सिलसिलेवार ढंग से इसे समग्रता में लागू किया जा सकता है, इसे समझना होगा।
किसी भी नीति की प्रभावशीलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। अकसर सरकारें बेहतर नीतियों के बावजूद क्रियान्वयन में विफल होती रही हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की पूर्व तैयारी, क्रियान्वयन पर नजर रखने के साथ-साथ इसके प्रत्येक कदम पर अपेक्षित सहयोग एवं समय-समय पर समीक्षा करनी होगी। किसी भी नीति के सफल कार्यान्वयन के आवश्यक तत्व होते हैं - प्रोत्साहन, साधन, सूचना, अनुकूलता, विश्वसनीयता और प्रबंधन। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बेहतर क्रियान्वयन के लिए इसे हितधारक प्रोत्साहन बनाने की आवश्यकता होगी। कानून, नियामक तंत्र एवं संस्थानों, सरकारी एजेंसियों के साथ ही विश्वसनीय सूचना भंडार की स्थापना एवं उनमें अनुकूलन क्षमता विकसित करना होगा। पारदर्शी तरीकों से सभी हितधारकों की भागीदारी के माध्यम से विश्वसनीयता विकसित करते हुए प्रबंधन के बेहतर तरीकों को विकसित करना होगा। इसके नीतिगत पहलों को चरणबद्ध तरीके से क्रियान्वित करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके हर बिंदु में कई कदम हैं और प्रत्येक चरण इस दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है कि वह अगले चरण के क्रियान्वयन का आधार बनता है। इसे ऐसे क्रमबद्ध तरीके से लागू करना होगा कि सबसे महत्वपूर्ण एवं आवश्यक कार्य पहले किए जाएं ताकि एक मजबूत नींव तैयार हो सके। यह नीति एक व्यापक नज़रिया, समग्रता रखती है, जिसके अवयव आपस में जुड़े हुए हैं, अत: टुकड़ों में प्रयास करने के बजाय समग्र दृष्टि को रखते हुए क्रियान्वयन करने से ही वांछित उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित होगी।
शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, अत: इसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच सावधानीपूर्वक योजना निर्माण, संयुक्त निगरानी और समन्वयपूर्ण क्रियान्वयन की जरूरत होगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के सफल क्रियान्वयन हेतु अनेक निकायों द्वारा सम्मिलित एवं व्यवस्थित पहल करने तथा जरूरी कदम उठाने हैं। इस नीति के क्रियान्वयन को कई निकायों, जिनमें एमएचआरडी, केब, केंद्र एवं राज्य सरकारें, शिक्षा सम्बन्धी मंत्रालय, राज्यों के शिक्षा विभाग, बोडर््स, एनटीए, स्कूल एवं उच्चतर शिक्षा के नियामक निकाय, एनसीईआरटी, एससीईआरटी, स्कूल एवं उच्चतर शिक्षण संस्थान शामिल हैं। इन निकायों द्वारा योजना को आपसी समन्वय तथा तालमेल के माध्यम से इसके भाव एवं प्रयोजन अनुसार सुनिश्चित करना होगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति बौद्धिक और सामाजिक पूंजी के निर्माण के माध्यम से सामूहिक चेतना विकसित करने का संकल्प पत्र है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के सफल कार्यान्वयन हेतु विविध प्रकार के गम्भीर प्रयास एवं हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी। इसमें केंद्र और राज्यों के मध्य समन्वय एवं सहयोग; नए या मौजूदा कानूनों, अध्यादेशों, नियमों तथा परिनियमों में संशोधन सहित विधायी तैयारी; बजटीय प्रावधानों में वृद्धि और अंतर-मंत्रालयी सहयोग के साथ वित्तीय संसाधनों की वृद्धि, जरूरी नियामक सुधार तथा नियामकों की स्थापना जैसे कदम तय समय सीमा में शिद्दत से उठाने हैं।
इस नीति के सफल क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय, राज्य, संस्थागत और व्यक्तिगत स्तर पर एक दीर्घकालिक विजऩ, विषेज्ञता की निरंतर उपलब्धता और संबंधित लोगों द्वारा ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। नीति केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (केब) के सशक्तिकरण की अनुसंशा करती है, जो कि ना केवल शैक्षिक एवं सांस्कृतिक विकास से जुड़े मुद्दों पर व्यापक परामर्श और समीक्षा के लिए एक फोरम प्रदान करता है, बल्कि इसके कहीं अधिक वृहद् उद्देश्य हैं। एक पुनर्कल्पित और पुनर्जीवित केब केन्द्र एवं राज्य स्तर पर समरूप निकायों के साथ मिलकर देश में शिक्षा के विजऩ को अनवरत रूप से विकसित करने, स्पष्टता लाने, उसके मूल्यांकन और उसको संशोधित करने के लिए जिम्मेदार होगा। यह ऐसी संस्थागत रूपरेखाओं को भी लगातार तैयार एवं उनकी समीक्षा करेगा, जो इस विजऩ को प्राप्त करने में सहायक होगी। साथ ही संघ सरकार के केंद्रीय शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता में सभी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों की समिति गठित की जाए, जो राज्यों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के कार्यान्वयन की निगरानी करने के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थागत तंत्र हो सकता है। यह समिति राज्य सरकारों के विविध दृष्टिकोणों के माध्यम से कार्यान्वयन मुद्दों पर चर्चा करने तथा लागू करने में मदद करे। चुनिंदा प्रतिष्ठित शिक्षाविदों एवं सभी प्रमुख नियामक निकायों के पदेन सदस्यों की एक कार्यान्वयन स्थायी समिति स्थापित की जा सकती है, जो कार्यान्वयन योजना को चरणबद्ध बनाने और निगरानी करने का काम करे। इसकी विशिष्ट शक्तियाँ और कार्य हो, जिनमें विषयगत उपसमितियाँ और क्षेत्रीय समितियाँ भी शामिल हो सकती हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारत में विश्वस्तरीय शैक्षणिक संस्थानों को विकसित करने की मंशा रखती है। भारत के शैक्षणिक संस्थानों को वैश्विक स्तर पर उभारने के लिए इन्हें अधिक स्वतंत्रता, लचीलापन, स्वायत्तता और संसाधनों के साथ सशक्त बनाने की आवश्यकता है। यह, निश्चित रूप से, शैक्षणिक संस्थानों को वैश्विक रैंकिंग में स्थान बनाने में मदद करेगा। कायदे-कानून तथा प्रशासकीय व्यवस्थाओं के साथ जमीनी कोशिशें जल्द ही करनी होंगी। जैसे प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ईसीसीई) हेतु संस्थानों, उत्कृष्ट पाठ्यक्रमों, अध्ययन सामग्री, शैक्षणिक ढांचों तथा प्रशिक्षित अध्यापकों के साथ ही अन्य व्यवस्थाएं जमानी होगी। कमोबेश ऐसी ही व्यवस्थाएं एवं तैयारियां सभी स्टेजों फाउंडेशन, प्रेपरेटरी, मिडिल, सेकंडरी तथा उच्चतर शिक्षा की प्रारम्भिक कक्षाओं के लिए भी करने की जरूरत है। पाठ्यचर्या, स्थानीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकें एवं शिक्षण सामग्री, मूल्यांकन प्रणाली तथा प्रशिक्षित शिक्षकों की व्यवस्था हेतु निकायों की स्थापना की ओर कदम बढ़ाना होगा। समर्थन संस्थानों या निकायों जैसे प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ईसीसीई), राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफ), राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक परिषद् (एनएचआरसी), राज्य स्कूल मानक प्राधिकरण (एसएसएसए), उच्चतर शिक्षा अनुदान परिषद् (एचईजीसी) जैसे तमाम संस्थानों को स्थापित करने की ओर बढऩा होगा।
शैक्षणिक सत्र 2017-18 के अनुसार, निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूल भारत में 25 करोड़ स्कूल जाने वाले बच्चों के 35 प्रतिशत (लगभग नौ करोड़) को शिक्षित करते हैं। इन स्कूलों में नामांकन में पिछले 25 वर्षों में 6 गुना वृद्धि देखी गई है। भारत में लगभग 70 प्रतिशत उच्चतर शिक्षा संस्थान निजी हैं और 70 प्रतिशत से अधिक भारतीय छात्र निजी उच्चतर शिक्षा संस्थानों में अध्ययन करते हैं। इसी वास्तविकता को स्वीकार कर अधिक निजी शिक्षा संस्थान की स्थापना के साथ ही समाज पोषित शिक्षा संस्थानों लिए संसाधन जुटाने के प्रयास करने होंगे। जिसके लिए व्यक्तिगत और भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए संस्थागत तंत्र एवं कर प्रोत्साहन जैसे उपाय अपनाने होंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति देश की जड़ों तथा सांस्कृतिक विरासत से जुड़ते हुए इक्कीसवीं सदी के वैभवशाली भारत का स्वप्न संजोये है। इसे गंभीरता से लागू करने के लिए मजबूत क्रियान्वयन कार्यक्रम एवं रूपरेखा बनानी होगी। जरूरत है संघीय व्यवस्था के समस्त अंगों को मिलकर इसे ईमानदारी से लागू करने की। यह नीति यदि धरातल पर अपने मूलभावना के साथ उतरने में कामयाब रही तो यह भारत की अनगिनत चुनौतियों से उबरने का महत्वपूर्ण जरिया बन सकती है।
(लेखक विक्रम विवि में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर हैं)