अध्यात्म यात्रा का राजमार्ग-आत्मज्ञान
   Date06-Nov-2020

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धर्मधारा
रा जकुमार सिद्धार्थ को जीवन दु:खस्वरूप समझ आया तो वे इसके आत्यांतिक समाधान में जीवन की पहेली को सुलझाने अपना सारा राजपाट त्यागकर निकल पड़े और स्वयं को पाकर उन्होंने फिर जीवन-विद्या का अष्टांगमार्ग दिया।
इसी तरह राजकुमार महावीर अपना राजपाट पीछे छोड़कर आत्मज्ञान के पथ पर निकल पड़े और कैवल्यज्ञान के रूप में मानवता को जीवन-विद्या का शिक्षण दिया। राजा भर्तृहरि इसी खोज में अपना राजपाट भाई विक्रमादित्य को सौंपकर स्वयं को जानने के लिए आत्मानुसंधान की प्रक्रिाय में जुटे व जीवन के समग्र दर्शन की अनमोल निधि देकर गए।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में उस एक तत्व को पाने की चेष्टा जीवन का सर्वोच्च आदर्श रहा है, जिसको पाने के बाद फिर कुछ जानना शेष नहीं रह जाता। यह एक तत्व हृदयगुहा में निहित, अंतरात्मा के केन्द्र में स्थित दैवी तत्व है, कण-कण व्यापी ईश्वरीय सत्ता का दिव्य अंश है, जो अपने मूल रूप में वही सब गुण लिए हुए है। सोऽहम, शिवोऽहम, सच्चिदानंदोऽहम्, तत्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म- जैसे महावाक्यों में यही सत्य प्रतिध्वनित होता है। वस्तुत: आत्मज्ञान ही सांसारिक ज्ञान की सार्थकता का आधार है व आत्मज्ञान के बिना सांसारिक ज्ञान भारतीय परंपरा में अधूरा माना जाता रहा है।
इस संसार में जानने योग्य अनेक बातें हैं। विद्या के अनेक सूत्र हैं, खोज के लिए, जानकारी प्राप्त करने के लिए अपरिमित मार्ग है। जानकारी की एक अनेक वस्तुओं में से अपने आप की जानकारी सर्वोपरि है। हम बाहरी अनेक बातों को जानते हैं या जानने का प्रयत्न करते हैं, पर भूल जाते हैं कि हम स्वयं क्या हैं? अपने आप का ज्ञान प्राप्त किए बिना जीवन क्रम बड़ा डाँवाडोल, अनिश्चित और कंटकाकीर्ण हो जाता है। अपने वास्तविक स्वरूप की जानकारी न होने के कारण मनुष्य न सोचने लायक बातें सोचता है और न करने लायक कार्य करता है। सच्ची सुख-शांति का राजमार्ग एक ही है और वह है-आत्मज्ञान।