अब प्रशासनिक सख्ती जरूरी...
   Date24-Nov-2020

vishesh lekh_1  
वैश्विक महामारी कोरोना वायरस को लेकर स्थिति विकटपूर्ण होती जा रही है... जिस तरह से संक्रमण के आंकड़े तेजी से बढ़ रहे हैं, उससे इस बात का तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि त्योहारों के समय लोगों द्वारा की गई लापरवाही के नतीजे अब सामने आने लगे हैं... इसमें उस बदलते मौसम का भी असर है, जो लंबे समय से चेतावनी के रूप में सामने आ रहा था कि ठंड का असर दिखते ही कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ेंगे... विश्व स्वास्थ्य संगठन तो अब यहां तक दावा कर रहा है कि अगर दिसंबर के महीने में हमने कोरोना को लेकर सतर्कता नहीं बरती, लापरवाही का त्याग नहीं किया तो आने वाली तीसरी लहर दुनिया के लिए बहुत ज्यादा भयावह हो सकती है... इसका उदाहरण के रूप में आंकलन करें तो मध्यप्रदेश में पहले इंदौर, भोपाल समेत पांच जिलों में ही रात का कफ्र्यू लागू किया गया था, लेकिन अब धार, शिवपुरी जैसे छोटे जिलों में रात्रिकालीन कफ्र्यू लागू करना पड़ा है... इसके साथ ही प्रशासनिक स्तर पर क्राइसेस मैनेजमेंट की लगातार बैठक हो रही है... मुख्यमंत्री भी स्वयं स्वास्थ्य विभाग के साथ समीक्षा कर रहे हैं... लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी आम जनता की है, जो नियमित रूप से मास्क लगाने, दो गज दूरी का पालन करने और बिना मतलब के बाजार में न घूमने के नियमों का लगातार उल्लंघन कर रही है... जब तक इन नियमों का पालन नहीं होगा, तब तक स्थिति में सुधार वाली बात सामने नहीं आएगी... क्योंकि जब तक शासन-प्रशासन के स्तर पर सख्ती नहीं बरती जाएगी, जिस तरह से दीपावली बाद दिल्ली में मास्क न लगाने पर 2 हजार का जुर्माना लगाया जा रहा है और मध्यप्रदेश में विवाह में उपस्थित लोगों की संख्या 200 से घटाकर 100 की जा रही है... अंतिम संस्कार में 50 लोगों की संख्या का हवाला दिया जा रहा है, यहां तक कि मास्क न लगाने पर 100 से 500 रु. तक के जुर्माने के नियम को प्रदेश में अमल में लाया जा रहा है... उस स्थिति में सवाल यह है कि दीपावली की बढ़ती भीड़ को कोरोना से बचाने के लिए उस समय मास्क की अनिवार्यता को किसके कहने पर शिथिल किया गया था..? क्या शासन-प्रशासन के लिए सिर्फ दुकान-बाजार खोलना ही जरूरी था..? लोगों को मास्क के लिए प्रेरित करने या फिर जुर्माने का भय उसी समय दिखाने के लिए किसने रोका था..? अगर दीपोत्सव की भीड़ के समय दो गज की दूरी के पालन हेतु पुलिस को सक्रिय रखा जाता और हर हाल में मास्क का नियम लागू रहता तो बिना वजह बाजार में बिना मास्क के दौड़ रही उस भीड़ पर नियंत्रण रहता, जो बिना भय के नियमों के पालन की आदी नहीं है... अभी भी स्थिति बिगड़ी नहीं है... क्योंकि दिल्ली में लगातार अधिकृत रूप से 100-150 मौतों के बावजूद मध्यप्रदेश, गुजरात व अन्य राज्यों में मास्क को लेकर लोगों में पूर्ण गंभीरता का अभाव है... अगर ऐसे में देश का सर्वोच्च न्याय मंदिर राज्य सरकारों से कोरोना नियंत्रण के प्रावधानों को लेकर सवाल-जवाब कर रहा है तो इस पर विचार करना चाहिए कि आने वाले समय में स्थिति कितनी विकट होने वाली है...?
दृष्टिकोण
आफत के बीच राहत...
कोरोना के खिलाफ हमारी सतर्कता ही सबसे बड़ी दवाई या कहें समाधान है... क्योंकि जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं... इस सूत्र वाक्य से ही इस समस्या से फिलहाल लड़ा जा सकता है... लेकिन नियमों के पालन करने हेतु इस आफत से लडऩे के लिए यह भी राहत का ही बिन्दु है कि आने वाले एक माह में कोरोना वैक्सीन के वितरण की शुरुआत हो जाएगी... यानी तब तक अगर हम मास्क के नियम को या फिर दो गज की दूरी को अमल में लाते हैं तो एक बड़ी आबादी को इस रोग से बचाया जा सकता है... क्योंकि कोरोना वैक्सीन के अलग-अलग चरणों में हुए परीक्षणों के सकारात्मक नतीजों से इतना तो तय है कि दिसंबर अंत न सही तो 2021 में जनवरी-फरवरी में वैक्सीन वितरण की व्यवस्था कायम हो जाएगी... क्योंकि प्रधानमंत्री स्वयं राज्य के मुख्यमंत्रियों से इस कोरोना वैक्सीन की वितरण व्यवस्था व तैयारियों को लेकर समीक्षा व चर्चा करने वाले हैं... इधर कोरोना वायरस के एक साल पूरे होने के बाद भी विभिन्न कंपनियों की वैक्सीन ट्रायल के परिणाम से इस आफत के बीच कुछ राहत के संकेत मिले हैं... क्योंकि आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन एस्ट्राजेनेका एझेडडी 1222 को कोरोना के खिलाफ 70 फीसदी प्रभावी बताया गया है... यानी यह वैक्सीन जिन लोगों की लगाई जाएगी, वे कोरोना से 70 फीसदी सुरक्षित रहेंगे... इस वैक्सीन के दो डोज होंगे... उधर रशियन वैक्सीन का भी ट्रायल अंतिम चरण में है... कुल मिलाकर कोरोना आफत के बीच वैक्सीन के आने का इंतजार छोटा होना किसी राहत से कम नहीं.., लेकिन सतर्कता जरूरी है...