स्वार्थ का फल
   Date24-Nov-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
प्या सा मनुष्य अथाह समुद्र की ओर यह सोचकर दौड़ा कि महासागर से जी भर अपनी प्यास बुझाऊँगा। वह किनारे पहुँचा और अंजलि भरकर जल मुँह में डाला, किंतु तत्काल ही बाहर निकाल दिया। प्यासा मनुष्य असमंजस में पड़कर सोचने लगा कि सरिता सागर से छोटी है, किंतु उसका पानी मीठा है; जबकि सागर सरिता से बहुत बड़ा है, पर उसका पानी खारा है। कुछ देर बाद उसे समुद्र पार से आती एक आवाज सुनाई दी- 'सरिता जो पाती है, उसका अधिकांश बाँटती रहती है, किंतु सागर सब कुछ अपने में ही भरे रखता है। दूसरों के काम न आने वाले स्वार्थी का सार यों ही निस्सार होकर निष्फल चला जाता है।Ó आदमी समुद्र के तट से प्यासा लौटने के साथ एक बहुमूल्य ज्ञान भी लेता गया, जिसने उसकी आत्मा को तृप्त कर दिया।