भक्ति योग ईश्वरीय अनुभूति का सरल मार्ग
   Date24-Nov-2020

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धर्मधारा
भ क्ति योग भावना प्रधान और प्रेमी प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए उपयोगी है। वह ईश्वर के साकार, सगुण रूप से प्यार करता है, प्रेम करता है अथवा वह ईश्वर के निर्गुण, निराकार रूप से प्रेम करता है। वह ईश्वर के साकार, सगुण रूप, मूर्ति आदि का आश्रय लेता है। विभिन्न क्रिया-अनुष्ठान, जल, पुष्प, गंध, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से ईश्वर की पूजा करता है। साधक ईश्वर की अभ्र्यथना, आराधना करता है, तो दूसरी ओर वह निर्गुण, निराकार ब्रह्म को ब्रह्मांड के कण-कण में संव्याप्त देखता है। वह इस विश्व-ब्रह्मांड को उसी निर्गुण-निराकार ब्रह्म की अभिव्यक्ति मानता है। वह संपूर्ण जगत् में ईश्वर की उपस्थिति की अनुभूति करता है। वह सूर्य, चंद्र, तारे, सिंधु, नदियाँ सब में ईश्वर को अभिव्यक्त होते हुए देखता है। वह सभी जीवों में ईश्वर को देखता है। वह स्वयं में सबको और सबको स्वयं में देखने लगता है। वह प्रत्येक श्वास के साथ भक्ति में लीन होने लगता है और उसका यही प्रेम उसमें उल्लास, उमंग भरता है और उसके अस्तित्व की गहराइयों को छूने लगता है। यह भगवत् प्रेम हमें संसार के उन समस्त बंधनों से मुक्त करता है, जिनसे बँधकर हम अब तक स्वयं से दूर थे, क्योंकि यह भक्ति हमारे भीतर अनंत के द्वार खोलती है।
यही भक्ति हमारे नेत्रों से दिव्य प्रेम के रूप में अभिव्यक्त होती है। यह प्रेम हमारे चिंतन, चरित्र और व्यवहार में पल-पल प्रतिबिंबित होने लगता है। भक्ति स्वयं में साधन भी है और साध्य भी। साधन के रूप में यह हमारी चित्तशुद्धि करती है और साध्य के रूप में स्वयं भक्ति ही प्रेम व परमेश्वर का रूप धारण कर लेती है। प्रेम एक सार्वभौम संवेग है। यह जब भक्त के हृदय में प्रवाहित होता है तो भक्त भी उस प्रेम-प्रवाह में बहता हुआ, प्रेम के अथाह सागर परमेश्वर की ओर प्रवाहित होने लगता है, वैसे ही जैसे नदियाँ समुद्र की ओर, सरिताएँ सिंधु की ओर प्रवाहमान हो उठती हैं। भक्त-भक्ति के प्रवाह में, प्रेम के प्रवाह में बहता हुआ आगे बढ़ता जाता है। रास्ते में चुनौतियाँ भी आती हैं, मुश्किलें भी आती हैं। कर्म-संस्कारों के विशाल वनक्षेत्र भी आते हैं। कामनाओं, वासनाओं की एक से बढ़कर एक पर्वत-शृंखलाएँ भी आती हैं।