युगों तक बिना तेल के प्रज्ज्वलित अद्भुत दीये
   Date14-Nov-2020

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स्वदेश संकलन
वि द्युत के आविष्कार के पहले मानव जाति अपनी रात्रि अंधेरे में व्यतीत करती थी। रात्रि में कुछ कार्य करने के लिए, रोशनी फैलाने के लिए लोग तेल-बाती का प्रयोग करते थे। तेल-बाती का यह दीया तभी तक जलता था, जब तक दीये में तेल होता था। लेकिन कुछ ऐसे रहस्य सामने आए हैं, जो यह बताते हैं कि बिना तेल के भी लगातार जलने वाले दीयों का अस्तित्व दुनिया में रहा है। दुनिया में कुछ ऐसे रहस्यमय दीपकों की हानियां प्रचलित हैं, जो अपनी आवश्यकतानुसार बिना तेल के ही जलते रहे। दुनिया के विभिन्न हिस्सों के लेखकों ने अपने साहित्य में हमेशा जलते रहने वाले दीपकों का जिक्र किया है, इन देशों में एशिया, दक्षिण अमेरिका, उत्तरी अमेरिका, इटली, ग्रेट ब्रिटेन और फ्रांस आदि शामिल हैं।
एक घटना है, जिसमें सन् 1600 में स्विट्जरलैंड से फ्रांस में आए सैनिकों का लिखित दस्तावेज एक प्रमाण रूप में मौजूद है, जिसमें उन्होंने एक छिपे हुए मकबरे की खोज की थी। इस मकबरे के अंदर उन्हें केवल एक जलता हुआ दीपक मिला था। उन सैनिकों ने उस दीपक को मकबरे से उठा लिया, फिर भी वह दीपक बिना किसी ईंधन के कई महीने तक जलता रहा, तब तक कि दुर्घटनावश वह दीपक टूट नहीं गया। टूटने के बाद ही उसकी लौ बुझी।
इन पहेलीनुमा दीपकों की सबसे रहस्यमयी घटना 13वीं शताब्दी के रब्बाई, जिसका नाम जेशिले था, से भी संबंधित है। इससे जुड़े लिखित दस्तावेजों के अनुसार उसके घर के बाहर एक दीपक बिना तेल के लगातार जलता रहा। जेशिले से जब तक दीपक के जलने का रहस्य पूछा गया, तो उसने उस दीपक की कार्यप्रणाली के विषय में बोलने से इनकार कर दिया, लेकिन समकालीन साक्ष्यों के अनुसार इसमें एक रहस्य यह भी जुड़ा था कि अगर कोई अनचाहा व्यक्ति उनके घर पर आकर दरवाजा खटखटाता था, तो उनके घर के मुख्य द्वार की कुंडी से बिजली के झटके निकलते थे। आधुनिक मत इस बारे में यह विश्वास करता है कि जेशिले के पास किसी तरह की बिजली का अग्रिम रूप रहा होगा। इसी तरह इतिहास में एक घटना है, जिसमें जस्टीनिया के शासनकाल के दौरान, सैनिकों की एक टुकड़ी एक दीपक के स्पर्श मात्र से लडख़ड़ाने लगी। इसके शिलालेख के अनुसार - यह दीपक लगभग 550 साल पहले से जल रहा था। सैनिक इस बात का पता नहीं लगा पाए कि यह कैसे जल रहा था, लेकिन हो सकता है कि यह भी विद्युत शक्ति सेजुड़ा दीपक रहा होगा, जिसके संपर्क मात्र में आने से सैनिकों की टुकड़ी को झटका लगा। यहूदियों में एक त्योहार 'हानुक्काहÓ को एक चमत्कारिक दीये की याद में मनाया जाता है। मान्यता है कि वहां एक ऐसा दीपक था, जिसमें केवल एक दिन जलने लायक तेल था, लेकिन वह पूरे आठ दिन तक जलता रहा। इस चमत्कारिक घटना की स्मृति में यह त्योहार मनाने की परंपरा शुरू हुई।
जलते रहने वाले दीपकों की दास्तान का उल्लेख साहित्य में भी मिलता है। एक ग्रीक लेखक पाउसोनियास ने एथेंस के मिनरेवा पोलिअस मंदिर में रखे एक सोने के दीपक के बारे में लिखा है। यह दीपक जिसे कालीमकस ने बनाया था, के बारे में कहा जाता है कि यह बिना ईंधन के, लौ को तेजी के साथ जलाए रखने में सक्षम था। इसके बारे में यह माना जाता है कि रोम के द्वितीय शासक महान न्यूमा पोंपीलियस में सीधे ईश्वर से संपर्क करने की योग्यता थी। इसीलिए उन्होंने एक ऐसा दीपक बनाया, जो मंदिर में सदैव जलता रहता था। इस बारे में कुछ लोगों का यह मानना था कि न्यूमा को विद्युत की जानकारी थी और उसका वारिस तुल्लुस होस्टीलियस तब मारा गया होगा, जब वह बिजली बना रहा था और उससे कुछ गलती हो गई थी।
आमतौर पर कई ऐसी घटनाएं हैं, जिनमें जलते हुए रहस्यमय दीपक तब मिले, जब किसी मकबरे को या इससे संबंधित स्थानों को खोला गया। उदाहरण के लिए वर्ष 140 में पालास का मकबरा, जो कि एक इटेलियन राजा का बेटा था, जब उसके मकबरे को खोला गया तो उसके शव के पास रखा हुआ एक दीपक जल रहा था। सबसे अद्भुत बात यह थी कि जब लोगों ने उस दीपक को बाहर लाना चाहा तो देखा कि वह खाली है और जब उसे उठाने का प्रयास किया गया, तब भी वह बुझा नहीं। अंतत: जब उसे वहां से उठाने में सफलता मिली, तो दीपक के नीचे तेल जैसा एक द्रव्य मिला, जिसकी पहचान सामान्य तेल जैसी नहीं थी और वह द्रव्य किस चीज से बना था, यह रहस्य ही बना रहा।
इसी प्रकार सन् 1550 में इटली के निसिदा टापू, जिसे पहले कभी नेसिस कहते थे, नागदौन (ऐस्पेरेगस) के एक खेत में काम कर रहे किसी किसान का फावड़ा अचानक एक बड़े पत्थर से टकराया। उसे लगा कि उसका फावड़ा किसी खजाने से टकराया है, क्योंकि वहां अकसर खुदाई के दौरान खजाने मिलते थे। खजाने की चाह में सारे किसान खुदाई में जुट गए और थोड़ी ही देर में एक मकबरा खोद निकाला। उत्सुक किसानों ने मकबरे का दरवाजा तोड़ दिया।
जब किसानों ने टूटे दरवाजे से भीतर झांका, तब वे आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि भीतर संभावित अंधकार के बजाय उन्हें तेज रोशनी दिखाई दी, जो मृतक की कब्र के पास रखे दीये से निकल रही थी। भय और संशय से ग्रसित किसान उस दीये को उठाकर बाहर लाए तो देखा कि उसकी बत्ती एकदम साफ और नई लग रही थी और वह दीपक शीशे के एक मर्तबान में बंद था। किसान लोग आपस में ही इस बारे में तर्क करने लगे, कोई उसे दैवी क्रिया बताता तो किसी की राय में वह मृतक व्यक्ति की अशांत आत्मा थी। अंतत: उन्होंने उस मर्तबान को जमीन पर पटक दिया, जिससे वह टूट-फूट गया, लेकिन दीये की लौ जलती रही।
इस बारे में प्राचीन रोमवासियों का यह परंपरागत विश्वास था कि जब इहलोक की एक रात जीवित प्राणी के लिए कष्टप्रद व भयंकर हो सकती है तो परलोक की अनंतकालीन रातें मृतक के लिए कितनी कष्टप्रद होती होंगी। इसीलिए ऐसे प्रावधान का उल्लेख मिलता है कि हर मकबरे में एक दीया अवश्य जलाया जाए, लेकिन ऐसा दीया जो शीशे के बंद बरतन में बिना किसी तेल के अखंड रूप से एक हजार साल तक जलता रहे।
एक प्राचीन इतिहासकार लिसेटस की पुस्तक दे ल्यूसरनिस एंटीक्यूरम रिकाइंडाइटिस में भी ऐसा उल्लेख है कि पादुआ से 17 मील दूर एस्टे नामक एक प्राचीन शहर में मैक्सिमस के मकबरे में भी अखंड रूप से जलता हुआ एक दीया पाया गया। इसी के साथ उन्होंने ओलिबियस मकबरे से प्राप्त दीये का भी उल्लेख किया है. उनके अनुसार - यह दीया मिट्टी द्वारा आपस में जुड़े हुए दो बरतनों में बंद था। दीये को दो हौजों, जिनमें से एक सोने का और दूसरा चांदी का था, जोड़ा गया था। उन हौजों में एक प्रकार का अज्ञात तरल पदार्थ भरा था। उन बरतनों के बाहर खुदे लेख के अनुसार - यह दीया प्लेटो! अर्थात् पौराणिक ग्रीक देवता को समर्पित है।
साथ ही यह भी चेतावनी उसमें खुदी थी कि - सावधान! इस दीये के सात कोई छेडख़ानी न करे और न ही छूने का दुस्साहस करे, क्योंकि इसके भीतर के सभी तत्वों को गुप्त रूप से अभिमंत्रित कर दिया गया है और इस दीये को युगों तक निरंतर जलते रहने की क्षमता प्रदान की गई है। लिसेटस इस दीये की उम्र 500 वर्ष बताते हैं। अनुमान है कि यह दीया चौथी शताब्दी में कभी जलाया गया होगा।
अंग्रेज इतिहासकार विलियम कैमडन ने सन् 1582 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ब्रितानिया में यह लिखा है कि पिछले युग (1536-1539) में जब बहुत से पुराने मठों को ध्वस्त किया जा रहा था, तब एक गुप्त मकबरे पर एक ऐसे दीपक को पाया गया, जो युगों से निरंतर जलता आ रहा था। जनश्रुतियों के अनुसार - उस मकबरे में सम्राट कांस्टेंटियस को दफनाया गया था। पुस्तक में यह विवरण है कि उस दीपक में तेल के स्थान पर तरल सोना था। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन वैज्ञानिक, सोने को ऐसी तरलता में परिणत करने की कला जानते थे, जिससे दीपक को युगों तक जलाया जा सके। इसी तरह प्राचीनकाल के एक लेखक प्लूटार्क ने अपने लिखे लेख डी डिफेक्टऊ ओराकोलोरम में यह जिक्र किया है कि मिस्र में ज्यूपिटर एम्मॉन के मंदिर के दरवाजे पर एक दीपक जलता था। प्लूटार्क के अनुसार - उस मंदिर के पुजारी का दावा था कि यह दीपक खुली हवा में रखा है और इस दीपक को किसी भी प्रकार की हवा या बरसात कभी बुझा न सकेगी। कुछ इस तरह की बात आर्मीनिया के ग्रेट एड्रेबेन टेम्पल और कायरेने के अपोलो कारनेस टेम्पल की वेदी पर रखे दीपकों की भी है, जो लगातार जलते रहे। जूडो पैंसीरोलिस अपने समय का एक सुप्रसिद्ध कानूनी विशेषज्ञ और पुरातत्ववेत्ता था। अपने इतिहास संबंधी एक ग्रंथ 'रेरूम मैमोरेबिलियम लिबरी दुओÓ में उसने प्राचीनकाल में प्रयोग में लाई जाने वाली वस्तुओं का उल्लेख किया है, जैसे - कभी न मिटने वाली बैंगनी स्याही, एस्बेस्टस, सूत के कपड़े, प्रकाशधर्मी धातु और विभिन्न प्रकार के मसाले। उसने दो अन्य वस्तुओं का भी इसमें उल्लेख किया है- कभी न नष्ट होने वाली दीये की बत्तियां और जलकर भी न चुकने वाला तेल।
पैंसीरोलिस ने अपने ग्रंथ में सम्राट कांस्टेंटियस क्लोरस की एक राजाज्ञा को भी उद्धृत किया है, जिसे उसने अखंड दीयों में एस्बेस्टस की बत्तियों के प्रयोग के समर्थन में इस प्रकार कहा है - इस पत्थर से कभी न नष्ट होने वाला कपड़ा तैयार करवाया जाए, जो दीयों में प्रयुक्त हो सके, विशेषकर गुसलखानों के दीयों में। पैंसीरोलिस इस पत्थर को एस्बेस्ट कहता था। उसके अनुसार- सम्राट कांस्टेंटियस इस प्रकार अखंड दीयों द्वारा रोम के 4,40,000 वर्ग गर्ज क्षेत्र में फैले अजायबघर को रात-दिन प्रकाशित रखता था। पैंसीरोलिस की इस बात की सत्यता प्लीनी के वृहद ग्रंथ 'नेचुरल हिस्ट्रीÓ से भी सही प्रमाणित होती है। इस बारे में वह अपने ग्रंथ में जिक्र करता है कि रोमवासी एस्बेस्टस से परिचित थे।
यद्यपि इन दीपकों के लगातार जलने का रहस्य अभी तक पूरी तरह उजागर नहीं हुआ है, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि उस युग में शायद लोगों ने ऐसे ज्वलनशील पदार्थ खोज लिए थे, जिनसे उजाला फैलाया जा सके और दीये के रूप में उसका इस्तेमाल किया जा सके। दुनिया में रहस्यमयी घटनाओं की कमी नहीं है, लेकिन हर रहस्य के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। यह भी हो सकता है कि इन दीयों के जलने के पीछे का एक कारण विद्युत ऊर्जा के निर्माण की जानकारी हो, जिसे उस समय किसी अन्य नाम से जाना जाता हो। आज हम सभी विद्युत शक्ति का प्रयोग करके अपने घरों-गलियारों को रोशन करते हैं, लेकिन उस समय इस विद्युत शक्ति का एक भी प्रयोग महान आश्चर्य कराने वाला व किंवदंतियों के प्रसार का कारण रहा होगा।