भाजपा के प्रतिबद्ध मतदाता...
   Date13-Nov-2020

vishesh lekh_1  
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम भाजपा की उम्मीद के अनुरूप ही रहे हैं... यही नहीं, मध्यप्रदेश में भी चुनाव जैसे उपचुनाव के नतीजे भाजपा के लिए नई ऊर्जा देने वाले माने जा सकते हैं... जबकि उत्तरप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, ओडिसा व पूर्वोत्तर के राज्यों में जिस तरह से उपचुनाव में भाजपा को एकतरफा रूप से जीत हासिल हुई, यह सही मायने में कोरोनाकाल में किसी राजनीतिक दल के लिए नई संभावनाओं के संकेत के साथ ही मतदाताओं का भाजपा के प्रति लगातार बढ़ता विश्वास है, जो उसे केन्द्र से लेकर राज्यों तक में सत्तारूढ़ देखना चाहते हैं... बुधवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार की जीत व उपचुनाव के नतीजों को लेकर भाजपा कार्यालय में पार्टी कार्यकर्ताओं एवं देशवासियों को संबोधित करते हुए जो बातें कहीं, उसका सार यही है कि भाजपा कभी अपनी ऐतिहासिक जीत का उन्मादरूपी प्रदर्शन करने का विचार नहीं करती... और हार मिलने पर किसी तरह के अवसाद से भी सदैव अछूती रहती है... इसके पीछे का तार्किक पक्ष देखा जाए तो यही है कि भाजपा ने विचारधारा के साथ ही विकास कार्यों, वर्ग-विशेष की समस्याओं के समाधान की एक रणनीति आगे बढ़ाई, तभी तो उज्ज्वला जैसी रसोई गैस योजना ने करोड़ों महिलाओं को भाजपा का मुरीद बना दिया... यही नहीं, आवास योजना से भी बड़ी संख्या में महिला मतदाताएं भाजपा के लिए एक प्रतिबद्ध मतदाता के रूप में सामने आईं... तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं के खात्मे से मुस्लिम समुदायों में भी भाजपा का एक बड़ा वोट तैयार हुआ... अगर ऐसे में प्रधानमंत्री यह कहते हैं कि भाजपा के पास एक मौन (साइलेंट) मतदाता हैं, जो भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाता हैं... तो उस विचार से हर किसी को सहमत होना चाहिए, क्योंकि देश में 10 करोड़ से अधिक उज्ज्वला योजना के कनेक्शन मुफ्त वितरित किए गए हैं... इनमें अगर दो महिलाएं भी भाजपा के साथ जुड़ी होंगी, तो यह वोट 20 करोड़ के करीब होता है... क्योंकि दशकों से धुएं और तमाम तरह की तकलीफें उठाकर चूल्हे पर बारिश-ठंड में भोजन बनाने वाली उन महिलाओं को रसोई गैस से एक नया जीवन मिला है... कहने का तात्पर्य यही है कि कोई भी पार्टी प्रतिबद्ध मतदाताओं की एक बड़ी फौज अपने पक्ष में आसानी से खड़ी नहीं कर सकती... इसके लिए उसे सरकारी तंत्र, नीति-नियंताओं और योजनाओं पर अमल करने वाले प्रत्येक पहलू को देखना होता है... तभी उसके परिणाम भी सामने आते हैं... बिहार तो एक उदाहरणभर है... इसके पहले उत्तरप्रदेश व अन्य राज्यों के परिणाम भी भाजपा के लिए महिला शक्ति के निर्णायक वोटबैंक के जरिये अपना संदेश सुना चुके हैं... यहां अब यह बात भी ध्यान रखनी होगी कि परिवारवादी पार्टियों के दिन लदने लगे हैं, क्योंकि मतदाता काम करने वाले और बदलाव का खांका खींचने वाले दलों-नेताओं को चुनना प्राथमिकता में रखता है...
दृष्टिकोण
उर्वरक मूल्यों में कमी...
किसानों को बेहतर फसल उत्पादन के लिए खाद (उर्वरक) की विशेष रूप से आवश्यकता होती है... एक समय था, जब किसान पशुओं के गोबर से बनी जैविक खाद का ही खेतों में उपयोग करता था, इसके लिए बकायदा खाद बनाने की एक प्रक्रिया भी थी... गोबर के साथ भूसा एवं अन्य सडऩे-गलने वाली सामग्री को लंबे घेरे गड्ढे (घूरे) में डाला जाता था... बारिश के बाद समय-समय पर इसमें पानी भी दिया जाता था, ताकि गोबर के साथ भूसा व अन्य सामग्री उचित तरीके से मिश्रित होकर जैविक खाद का रूप ले सके... लेकिन जब से रासायनिक उर्वरकों का फसलों के लिए उपयोग होने लगा और उसके जरिये किसान आवश्यकता से अधिक उर्वरकों का उपयोग करने लगा, तभी से कृषि क्षेत्र में भूमि के बंजर होने या अफलन की शिकायत या फिर फसलों में लगातार नए-नए रोगों का प्रकोप बढ़ता गया... इसलिए एक बार फिर जैविक खाद की तरफ कृषकों का रुझान बढ़ा है... लेकिन यह मांग के अनुसार उपलब्ध नहीं हो सकता... इसलिए इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर को-आपरेटिव्ह लिमिटेड (इफको) ने अलग-अलग समय पर उपयोग में आने वाले रासायनिक उर्वरकों की एक लंबी श्रृंखला का निर्माण किया है, जो दलहन-तिलहन के साथ ही रबी-खरीफ की उन सभी फसलों को लाभ देते हैं... इफको ने उर्वरक मूल्य में 50 रु. प्रति बोरी की कमी करके किसानों के हित में निर्णय लिया है... जो बोरी एनपी का मूल्य 950 प्रति बोरी था, अब वह घटकर 925 रुपए में मिलेगी... नीम कोडिंग के बाद उर्वरकों की गुणवत्ता में भी सुधार आया है... क्योंकि मिलावटखोरी रुकी है...