एकाग्रता
   Date13-Nov-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
भा रतीय धर्म और संस्कृति को विदेशों में गौरवान्वित करने वाले स्वामी विवेकानंदजी शिकागो की विश्वधर्म संसद के बाद अमेरिका में जगह-जगह प्रवचन कर रहे थे। एक बार वे एक ऐसे ही नदी के पास से गुजर रहे थे कि कुछ धनवान घरों के किशोर उसी नदी में बेलून गोली से उसे भेदने का प्रयास कर रहे थे, पर हर बार उन्हें असफलता ही हाथ लगती थी। उसी समय गेरूआ व पहने स्वामी विवेकानंदजी वहाँ पहुंचे और खड़े होकर सारा तमाशा देखने लगे। जब किशोर लक्ष्य भेदने में असफल और निराश हो गए तो उन्होंने लक्ष्य भेदने के लिए उनसे बंदूक मांगी। सभी सोचने लगे, भला जिन्होंने कभी बंदूक ही नहीं पकड़ी वे निशाना कैसे साधेंगे? विवेकानंदजी ने एक ही बार में स्वयं लक्ष्य भेद दिया। सभी लड़कों के मन में प्रश्न उठा कि इन्होंने बिना अभ्यास के कैसे लक्ष्य भेदन कर दिया, जबकि हम लोगों को बार-बार अभ्यास करने पर भी असफलता ही हाथ लग रही है। सभी के प्रश्नों को सुनकर स्वामी विवेकानंदजी ने कहा- 'मन की एकाग्रता ही लक्ष्य की प्राप्ति है।Ó एकाग्र मन से कठिन से कठिन कार्य भी हो सकता है।