भगवान धन्वन्तरि का प्राकट्य धनतेरस
   Date13-Nov-2020

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धर्मधारा
भ गवान धन्वन्तरि का जन्मोत्सव मनाया जाता है। समुद्र मंथन के समय भगवान धन्वन्तरि का प्राकट्य माना जाता है। देव-दानवों द्वारा क्षीर सागर का मंथन करते समय भगवान धन्वन्तरि संसार के समस्त रोगों की औषधियों को कलश में भरकर प्रकट हुए थे। उस दिन त्रयोदशी तिथि थी। इसलिए उक्त तिथि में संपूर्ण भारत में तथा अन्य देशों में (जहां हिन्दुओं का निवास है) भगवान धन्वन्तरि का जयंती-महोत्सव मनाया जाता है। विशेषकर आयुर्वेद के विद्वान तथा वैद्य समाज की ओर से सर्वत्र भगवान धन्वन्तरि की प्रतिमा प्रतिष्ठित की जाती है और उनका पूजन श्रद्धाभक्तिपूर्वक किया जाता है एवं प्रसाद वितरण करके लोगों के दीर्घ जीवन तथा आरोग्य लाभ के लिए मंगल कामना की जाती है। दूसरे दिन संध्या समय जलाशयों में प्रतिमाओं का विसर्जन-कीर्तन करते हुए किया जाता है। इस प्रकार भगवान धन्वन्तरि प्राणियों को रोग-मुक्त करने के लिए भव-भेषजावतार के रूप में प्रकट हुए थे।
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी 'धनतेरसÓ कहलाती है। इस दिन चांदी का बर्तन खरीदना अत्यंत शुभ माना गया है, परन्तु वस्तुत: यह यमराज से संबंध रखने वाला व्रत है। इस दिन सायंकाल घर के बाहर मुख्य दरवाजे पर एक पात्र में अन्न रखकर उसके ऊपर यमराज के निमित्त दक्षिणाभिमुख दीपदान करना चाहिए तथा उसका गन्धादि से पूजन करना चाहिए। दीपदान करते समय निम्नलिखित प्रार्थना करनी चाहिए -
मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात्र्सूयज: प्रीयतामिति।।
यमुनाजी यमराज की बहन हैं, इसलिए धनतेरस के दिन यमुना-स्नान का भी विशेष माहात्म्य है। यदि पूरे दिन का व्रत रखा जा सके तो अत्युत्तम है, किन्तु संध्या के समय दीपदान अवश्य करना चाहिए -
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनस्यति।।
कथा - एक बार यमराज ने अपने दूतों से कहा कि तुम लोग मेरी आज्ञा से मृत्यु लोक के प्राणियों के प्राण हरण करते हो, क्या तुम्हें ऐसा करते समय कभी दु:ख भी हुआ है या कभी दया भी आई है? इस पर यमदूतों ने कहा - महाराज! हम लोगों का कर्म अत्यंत क्रूर है, परन्तु किसी युवा प्राणी की असामयिक मृत्यु पर उसका प्राण हरण करते समय वहां का करुण क्रंदन सुनकर हम लोगों का पाषाण हृदय भी विगलित हो जाता है। एक बार हम लोगों को एक राजकुमार के प्राण उसके विवाह के चौथे दिन ही हरण करने पड़े। उस समय वहां का करुण क्रंदन, चीत्कार और हाहाकार देख-सुनकर हमें अपने कृत्य से अत्यंत घृणा हो गई। उस मंगलमय उत्सव के बीच हम लोगों का यह कृत्य अत्यंत घृणित था, इससे हम लोगों का हृदय अत्यंत दु:खी हो गया। अत: हे स्वामिन्! कृपा करके कोई ऐसी युक्ति बताइये, जिससे ऐसी असामयिक मृत्यु न हो। इस पर यमराज ने कहा कि जो धनतेरस के पर्व पर मेरे उद्देश्य से दीपदान करेगा, उसकी असामयिक मृत्यु नहीं होगी।