संकट की पीड़ा को धता बताते परिणाम...
   Date11-Nov-2020

parmar shakti_1 &nbs
त्वरित टिप्पणी
शक्तिसिंह परमार
किसीभी सत्ता व व्यवस्था की पहचान या परीक्षा संकटकाल में ही होती है...फिर चाहे वह प्राकृतिक आपदा हो या बीमारी-महामारी की विकटपूर्ण परिस्थितियां...कोरोनाकाल के मध्य में बिहार, मध्यप्रदेश एवं अन्य 10 राज्यों के चुनाव परिणामों ने मंगलवार को अपना संदेश सुना दिया है...कोरोना जैसी महामारियां किसी के आमंत्रण पर दस्तक नहीं देतीं..,मगर सत्तासीन सरकारों को उसके जरिए घेरने या उन्हें जिम्मेदार ठहराने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी जाती हैं...लेकिन कोरोनाकाल में केंद्र से लेकर राज्यों द्वारा किए गए प्रयासों पर ये ताजा चुनावी नतीजे किसी प्रायोगिक परीक्षण से कम नहीं हैं...रसायन शा की शोध प्रक्रिया में 'लिटमस टेस्टÓ की अहम भूमिका होती है...क्योंकि किसी भी क्रिया (एक्शन) और प्रतिक्रिया (रिएक्शन) के पूर्व इसी लिटमस टेस्ट के जरिए 'अम्ल-क्षारÓ के पूर्व अनुमान घोषित होते हैं...राजनीति में भी चुनाव परिणामों को लिटमस टेस्ट के रूप में देखा जाता है...यही कि मुद्दों पर, व्यवस्था पर और सरकार के लिए क्या जनादेश है..? कुल मिलाकर 'लिटमस टेस्टÓ एक सूचक है कि वह अम्लीय है या क्षारीय..? दोनों नहीं.., तभी वह बैंगनी रंग देता है...बिहार विधानसभा के जनादेश एवं मप्र में 28 विधानसभा सीटों के नतीजों ने भविष्य की राजनीति की धुरी का निर्धारण करके 'लिटमस टेस्टÓ की भूमिका तय कर दी है...
कोरोनाकाल में हुए इन चुनावों ने केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार की नीति-नीयत पर ही मुहर नहीं लगाई..., बल्कि संगठन के स्तर पर भाजपा ने जनता की अदालत में संकटपूर्ण स्थितियों से एकजुट होकर लडऩे-भिडऩे और जीतने का वह आत्मविश्वास पैदा किया है..,जो आने वाले समय में कोरोना जैसे संकटों का राजनीतिक फायदा उठाने की 'साजिश-षड्यंत्रोंÓ और 'कुमंशाओंÓ को भी ध्वस्त कर रहा है...बिहार के नतीजों ने भाजपा के उस विकास के मुद्दे को नया आयाम दिया है, जिसकी वह सदैव पैरवी करती नजर आती है...अत: बिहार में नीतीश से बड़ा मुद्दा केंद्र सरकार की 'कोरोना संकटÓ में दिखाई गई उस तत्परता-प्रयासों पर मुहर है...जिसको विकृत रूप में प्रस्तुत करके तथाकथित संपूर्ण विपक्ष मजदूरों-श्रमिकों के पलायन के नाम पर पूरे चुनाव प्रचार में 'महागठबंधनÓ की जीत की संजीवनी तलाशता नजर आया...लेकिन 'मजदूरों, श्रमिकों, गरीबोंÓ ने अपना संदेश सुना दिया है...यह विपक्ष के उस तुष्टिकरण की पराकाष्ठा 'एमवाय समीकरणÓ (मुस्लिम-यादव) को भी ठेंगा है...जो मतदाताओं को भ्रमित करके सत्ता हथियाने का षड्यंत्र रचता रहा है...बिहार, मप्र के नतीजों से एक विचारणीय बिंदु निकलकर यह भी आया है कि अगर कोरोना संकटकाल नहीं होता तो संपूर्ण विपक्ष चुनावी मैदान में किस मुंह और मुद्दे के साथ जाता..? क्योंकि उस स्थिति में भाजपा के पास विकास के साथ, अनुच्छेद 370, 35 ए और सैकड़ों वर्षों से प्रतीक्षारत श्रीराम मंदिर निर्माण का साहसिक निर्णय व उपलब्धि थी...उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में 7 सीटों, गुजरात में 8 सीटों पर एकतरफा प्रदर्शन करते हुए कर्नाटक, हरियाणा, तेलंगाना, ओडिसा व पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा ने मतदाताओं के उस राष्ट्रीय रुझान का संदेश भी सुनाया है...जिसमें वे देश की एकता-अखंडता को पहले पायदान पर रखते हैं...
मध्यप्रदेश के इतिहास में संभवत: यह पहला और अंतिम अवसर है, जब इतनी बड़ी संख्या में उपचुनाव (28 विधानसभा सीटों) की स्थितियों का सामना मतदाताओं को करना पड़ा...इसके पीछे के कारणों पर हर किसी की निगाहें रही हैं...तभी तो आज के नतीजे उन लोगों को आईना दिखा रहे हैं...जिन्होंने सत्ता के मद में चूर होकर उपचुनाव की स्थितियां पैदा की...सही मायने में 15 माह शासन कर चुकी कांग्रेस की कमल नाथ सरकार की कारगुजारियों पर नतीजे तमाचा हैं... उन्हीं के बल पर वह पुन: सत्ता के ख्वाब संजो रही थी...मालवा-निमाड़ और ग्वालियर की सीटों पर मतदाताओं ने सत्तासीन भाजपा के पक्ष में अपना बहुमत सुनाया है...जबकि इन सीटों पर कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा सरकार गिराने को 'गद्दारी-वफादारीÓ का मुद्दा बनाकर खूब ताव दिया... लेकिन भाजपा के पाले से चुनाव लड़कर कमल खिलाने वाले सिंधिया खेमे के प्रत्याशियों ने भी कांग्रेस के हमलों का नतीजों के जरिए जवाब दे दिया है...चंबल में जरूर कांग्रेस के लिए कुछ राहत वाली बात रही..,लेकिन इन नतीजों का अगर व्यक्तिश: विश्लेषण किया जाए तो शिवराजसिंह चौहान की मुख्यमंत्री के रूप में लोकप्रियता विशुद्ध रूप से कायम है... सिंधिया के लिए ये नतीजे भाजपा सरकार व संगठन के साथ और बेहतर तालमेल के साथ आगे बढऩे का संदेश सुना रहे हैं...कमल नाथ के लिए ये परिणाम उनकी उस हठधर्मिता को रेखांकित करते हैं, जिसमें उन्होंने सत्ता व संगठन में रहते हुए विधायकों का कोई मूल्य नहीं समझा...तभी तो बीच चुनाव में लोधी जैसे कांग्रेस विधायक का पाला बदलना कमल नाथ को संभावित हार की चेतावनी थी... जिसे वे समझ नहीं सके...दिग्विजय सिंह ने तो इन चुनाव में कांग्रेस की 15 माह वाली सरकार को गिराने वाली रणनीति का ही पूर्व दर्शन कराया है...जिसमें वे कमल नाथ, सिंधिया को ठिकाने लगाने के एवज में अपने बेटे के लिए कांग्रेस संगठन में मुख्य भूमिका बुहारते नजर आए हैं..!
कोरोनाकाल में मंगलवार को आए बिहार के साथ ही अन्य राज्यों के उपचुनाव के नतीजों ने केंद्र से लेकर राज्यों की भाजपा सरकारों एवं संगठन स्तर पर निर्णायक भूमिका में खड़े लोगों को भी एक बड़ा व कड़ा संदेश सुनाया है...वह यही कि अगर श्रमिकों-मजदूरों, किसानों के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक अप्रैल-मई-जून के बीच 'सेवा-सहायता-सहयोगÓ के लिए कठोर परिश्रम करते हुए पसीना नहीं बहाते तो आज नतीजे कुछ और होते...इसलिए भाजपा के सत्ता-संगठन को अपने समविचारी संगठनों के कार्यकर्ताओं के प्रयासों को भी ध्यान में रखना होगा...सत्ता-संगठन और सहयोगियों का संतुलन ही भविष्य में विकास के साथ चुनावी विजय का आधार भी बनेगा... -