पीएफआई की राष्ट्रघाती साजिश...
   Date09-Oct-2020

vishesh lekh_1  
हमेशा देश में अराजकता एवं हिंसा फैलाने की पैरोकार रहे कट्टरपंथी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के घातक मंसूबे रह-रहकर हमारे सामने बेनकाब होते रहे हैं... केरल से लेकर असम व पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में जिस तरह से पीएफआई की संदिग्ध गतिविधियां संचालित होती रही हैं, उनसे इस बात का दावा तो पुख्ता हो जाता है कि इस संगठन की राष्ट्रद्रोही कृत्यों में संलिप्तता हमेशा रही है... क्योंकि इस संगठन का संचालन करने वाले और इसे आर्थिक मदद पहुंचाने वाले विदेशी एनजीओ व कट्टरपंथी आतंकवादी संगठनों की मिलीभगत उजागर होती रही है... उत्तरप्रदेश के हाथरस मामले में जिस तरह से अचानक दिल्ली से उप्र तक सियासी उबाल आया, उसी से इस बात का अंदेशा शुरुआत में ही हो गया था कि हो ना हो, इस घटनाक्रम को पूर्व नियोजित साजिश के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है... जातिगत हिंसा फैलाने के लिए पीएफआई ने 100 करोड़ रुपए एकत्रित किए थे, अगर समय रहते देश की जांच एजेंसियां सख्ती न दिखाती तो इस मामले को नियंत्रित करने में तत्परता दिखाने से थोड़ी-सी भी चुक हो जाती तो अब तक उप्र के साथ देश के अन्य हिस्सों में किस तरह से जाति हिंसा का तांडव होने लगता... विचार किया जा सकता है... उस भयावह दृश्य की कल्पना से ही हर किसी के रोंगटे खड़े हो सकते हैं... क्योंकि जब एक दुष्कर्म के मामले को जातीय हिंसा का विषय बनाकर 100 करोड़ से अधिक रुपए एकत्रित किए जाएं और उसमें भी 50 करोड़ रुपए अकेले मॉरिशस से भारत में पीएफआई के जरिये पहुंच जाएं, तब सवाल यह उठता है कि आखिर इन देशद्रोही, राष्ट्रघाती और हिंसा की दुकान चलाने वाले खुराफाती तत्वों की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं कि वे हर हाल में देश को कैसे भी अस्थिर करने का मौका नहीं गंवा रहे... जातीय हिंसा की मंशा से दिल्ली से हाथरस जा रहे पीएफआई के चार कार्यकर्ताओं को मथुरा में पकड़े जाने के बाद उनके पास से 6 स्मार्ट फोन, लैपटाप, जस्टिस फॉर हाथरस विक्टिम और आईएम नॉट इंडियाज डॉटर नेड विथ कारिड जैसे पेंपलेट भी मिलना इस बात को पुष्ट करते हैं कि यह बहुत ही भयावह साजिश थी... अगर देश में जातीय हिंसा फैल जाती तो इसे रोकना सरकार या किसी तंत्र के लिए आसान नहीं था... इससे भी बड़ा सवाल यह है कि ये लोग देश में रहकर, देश के खिलाफ किस तरह से सुनियोजित साजिशों का लंबा दौर चला रहे हैं... यह पीएफआई के घातक मंसूबों के जरिये सबके सामने आ चुका है... हाथरस के घटनाक्रम को जातीय हिंसा की भेंट चढ़ाने की साजिश तो विफल हो चुकी है, लेकिन इस खेल में जो लोग पूरे देश को झोंकने पर आतुर दिख रहे थे, वे अब क्यों मौन हैं..?
दृष्टिकोण
शाहीन बाग पर दिखाया आईना...
नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध में देश में किस तरह से वर्ग विशेष के लोगों ने सार्वजनिक स्थलों पर महीनों तक जमावड़ा लगाकर देश की शांत आबोहवा को दूषित करने का खेल रचा था, उसको लेकर अगर देश का सर्वोच्च न्याय मंदिर स्पष्ट शब्दों में यह कह रहा है कि धरना-प्रदर्शन के नाम पर देश में सार्वजनिक स्थानों पर जबरिया कब्जा करने या हिंसा फैलाना स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब यह उन हिंसक-अराजक तत्वों को खुली चेतावनी है, जो अभिव्यक्ति की आजादी और तमाम तरह के अधिकारों के बहाने जब चाहे, जहां चाहे अपना झंडा लेकर विरोध-प्रदर्शन, आगजनी एवं राष्ट्रद्रोही घृणित अभिव्यक्ति वाले नारों की झड़ी लगाने लगते हैं... दिल्ली के शाहीन बाग में जिस तरह से एक सार्वजनिक मार्ग जिस पर दो शहरों का सर्वाधिक यातायात गुजरता है, उसी पर दिन-रात पारी बदल-बदलकर वर्ग-विशेष के महिला-पुरुषों ने धरना-प्रदर्शन करके रास्ता बंद करने के मंसूबों के साथ आम जनता को परेशानी में डालने का सुनियोजित षड्यंत्र रचा... उस पर, उस समय तो केन्द्र-राज्य सरकारें अभिव्यक्ति की आजादी की ढाल बनाए बैठे लोगों को उठाने में नाकाम रही थी... क्योंकि यह प्रचारित किया जा रहा था कि लोगों को अपने अधिकारों, कानूनों की रक्षा के लिए प्रदर्शन भी नहीं करने दिया जा रहा... लेकिन जब शाहीन बाग के हिंसक प्रदर्शनकारी उठने पर राजी नहीं हुए तो उन्हें प्राकृतिक चाबुक यानी कोरोना की मार ने उठने को मजबूर किया था... दिल्ली के शाहीन बाग की तर्ज पर देशभर में रास्ता रोकने या सार्वजनिक स्थलों पर महीनों तक अतिक्रमण करने की बेढंगी परिपाटी शुरू हो चुकी थी... दिल्ली में दंगे भी इसी तरह के प्रदर्शन एवं इसमें उकसाने वाली भाषणबाजी के कारण हुए थे... अगर न्याय मंदिर अब शाहीन बाग के हिंसक मंसूबों को लेकर उनके प्रदर्शनकारियों को आईना दिखा रहा है, तो यह समय की जरूरत है...