संत की सीख
   Date09-Oct-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
ए क संत प्रव्रज्या पर निकले व चतुर्मास के दिनों में एक गाँव में ठहर गए। वहाँ वे नित्यप्रति व्याख्यान देते और उन्हें सुनने के लिए अनेकों गाँववासी एकत्रित हुआ करते थे। उन्हें सुनने वालों में एक भक्त ऐसा था, जो नित्य उनकी सभा में उपस्थित होता था। एक दिन उसने संत से कहा- 'महाराज! मैं नित्य आपका उद्बोधन सुनता हूँ, फिर भी बदल क्यों नहीं पाता हूँ?Ó प्रत्युत्तर में संत ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोले- 'वत्स! तुम्हारा घर यहाँ से कितनी दूर है?Ó वह व्यक्ति बोला- 'करीब दस कोस दूर।Ó संत ने पुन: प्रश्न किया। 'तुम वहाँ कैसे जाते हो?Ó उसने उत्तर दिया- 'महाराज! पैदल जाता हूँ।Ó संत ने पूछा-'क्या ऐसा संभव है कि तुम बिना चले, यहीं बैठे-बैठे अपने गाँव पहुँच जाओ?Ó वह व्यक्ति बोला-'महाराज! ऐसा कैसे संभव है। घर जाना है तो उतनी यात्रा करनी पड़ेगी। 'संत बोले-'पुत्र! यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है।Ó यदि तुम्हें तुम्हारे घर का मार्ग पता है, उसका पता भी तुम्हें याद है तो भी इस जानकारी को व्यवहार में लाए बिना तुम्हारे लिए घर तक पहुँच पाना संभव नहीं है। इसी प्रकार यदि तुम्हारे पास ज्ञान है तो इसको जीवन में उतारे बिना तुम अच्छे इनसान नहीं बन सकते। यदि तुम्हें स्वयं के भीतर परिवर्तन को अनुभव करना है तो उसके लिए सीखी गई बातों को जीवन में उतारने का प्रयत्न करना होगा, तभी तुम कोई बड़ा परिवर्तन स्वयं के भीतर अनुभव कर सकोगे। उस व्यक्ति को संत की दी गई सीख समझ में आ गई।