राष्ट्रीय शिक्षा नीति सरकार की परिवर्तनकारी पहल
   Date09-Oct-2020

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डॉ. सत्येन्द्र किशोर मिश्र
ल गभग बीस वर्ष पहले जब भारत में सर्वशिक्षा अभियान का आगाज हुआ, तो देश के हर पांच बच्चे में से एक प्राथमिक विद्यालयं में दाखिले से महरूम था, परन्तु आज करीब 98 प्रतिशत बच्चों को स्कूल में दाखिला प्राप्त है। दुर्भाग्यवश स्कूलों में दाखिले के एकांगी नजरिए ने गुणवत्ता को बिल्कुल ही नजरअंदाज कर दिया। शिक्षा का वार्षिक सरकारी सर्वेक्षण 2018 मानता है कि कक्षा 5 में आधे से भी कम छात्र कक्षा 2 का पाठ पढ़ पाते हैं। कक्षा 3 के 28 प्रतिशत छात्र ही जोड़-घटाना कर पाते हैं। जो छात्र सामान्य बुनियादी साक्षरता तथा संख्याज्ञान नहीं सीख पाते, वे अंतत: स्कूलों से बाहर हो जाते हैं। एनएसएसओ 2017-18 के 75वें राउंड के सर्वेक्षण के अनुसार 6 से 17 वर्ष के बीच की उम्र के स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या करीब सवा तीन करोड़ है। ऐसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की अपनी अहमियत है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति न केवल भारत में शिक्षा के संकट एवं चुनौतियों को स्वीकार करता है, बल्कि बुनियादी शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन एवं सुधार हेतु प्रतिबद्ध है।
पिछली शिक्षा नीतियों में समग्र दृष्टि और दर्शन के अभाव की आलोचनाएं होती रही हैं। करीब 34 साल बाद आई राष्ट्रीय शिक्षा नीति देश में शिक्षा प्रणाली में बुनियादी बदलाव को संकल्पित है। इसमें स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक, शैक्षणिक ढांचे एवं पाठ्यक्रम से लेकर शिक्षणविधि एवं मूल्यांकन तक कई बड़े अहम बदलाव सुझाए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति स्कूली शिक्षा को समग्रता में पुनर्गठित करने पर केंद्रित करती है। इसमें वर्ष 2030 तक प्री-प्राइमरी से लेकर उच्चतर माध्यमिक तक 100 फीसदी जीईआर हासिल करने तथा शिक्षा पर सरकारी खर्च 4.43 फीसदी से बढ़ाकर जीडीपी का छह फीसदी तक करने का लक्ष्य रखा है। पिछली 1986 की शिक्षा नीति की 10$2 संरचना में 3 से 6 वर्ष की उम्र के बच्चे शामिल नहीं थे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव कर स्कूली शिक्षा व्यवस्था में 3 से 18 वर्ष के सभी बच्चों को शामिल करते हुए पाठ्यचर्या तथा शिक्षण शास्त्रीय आधार पर 5$3$34 की एक नई व्यवस्था में पुनर्गठित करती है। इस ढांचे में 3 से 6 वर्ष के बच्चों को शामिल कर प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ईसीसीई) की एक मजबूत बुनियाद रखने की कोशिश है। इसके पीछे वैज्ञानिक तथ्य है कि बच्चों के मस्तिष्क का 85 प्रतिशत विकास 6 वर्ष की उम्र तक हो जाता है। ईसीसीई में बहुआयामी, बहु-स्तरीय, मूल्यपरक, खेल एवं गतिविधि आधारित शिक्षा शामिल होगी। इसके लिए उत्कृष्ट पाठ्यक्रम एवं शैक्षणिक ढांचा विकसित किया जाएगा। प्रारम्भिक बाल्यावस्था विकास देखभाल की संकल्पना राष्ट्रीय शिक्षा नीति की दूरगामी एवं परिवर्तनकारी सोच है।
देशभर में चरणबद्ध तरीके से उच्चतर गुणवत्ता वाले ईसीसीई संस्थानों की सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित कर आंगनवाडिय़ों, प्राथमिक तथा प्री-स्कूल के माध्यम वर्ष 2030 के पूर्व ही अवश्य प्राप्त करने का लक्ष्य है। ईसीसीई के पाठ्यक्रम तथा शिक्षण में प्रशिक्षित शिक्षकों की व्यवस्था करेंगे। स्कूल शिक्षा में पहले पांच साल 3 से 8 साल के बच्चों के लिए फाउंडेशन स्टेज, उसके बाद के तीन साल 8 से 11 साल के बच्चों के लिए प्रिपरेटरी स्टेज, उसके बाद के तीन साल 11 से 14 साल के बच्चों के लिए मिडिल स्टेज तथा स्कूल में सबसे आखिर के 4 साल 14 से 18 साल के बच्चों के लिए सेकंडरी स्टेज निर्धारित किए गए हैं। अभी तक स्कूली शिक्षा पहली कक्षा से शुरू होती है, लेकिन अब बच्चों को पांच साल फाउंडेशन स्टेज से गुजरना ही होगा।
बच्चे अपनी मातृभाषा में आसानी से तथा बेहतर ढंग से सीखते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पांचवीं तक और जहां तक संभव हो सके, आठवीं तक मातृभाषा में ही शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। संवैधानिक प्रावधानों, नागरिकों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं, बहुभाषावाद तथा राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए त्रि-भाषा फॉर्मूला जारी रहेगा। विद्यार्थियों को 'एक भारत श्रेष्ठ भारतÓ पहल के तहत 6-8 कक्षा के दौरान किसी समय भारत की भाषाओं पर एक आनंददायक गतिविधियों में भाग लेना होगा। प्रत्येक विद्यार्थी कक्षा 6 से 8 के दौरान स्थानीय कौशल की जानकारी हेतु बस्ता रहित पीरिएड में भाग लेंगे। किसी भी विद्यार्थी पर कोई भी भाषा नहीं थोपी जाएगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति केवल संज्ञानात्मक समझ ही विकसित नहीं करेगी अपितु चरित्र निर्माण एवं कौशल ज्ञान देकर भविष्य की चुनौतियों के लिए सक्षम भी सक्षम बनाएगी। इसमें प्रयोग आधारित अधिगम कला-समन्वय तथा खेल-समन्वय शैक्षणिक दृष्टिकोण को अपनाया जाएगा। राष्ट्रीय आकलन केन्द्र रिपोर्ट कार्ड में पूरी तरह से बदलाव होकर तीन स्तर पर आकलन की व्यवस्था होगी। एक स्वयं छात्र करेगा, दूसरा सहपाठी और तीसरा उसका शिक्षक। नेशनल एसेसमेंट सेंटर-परख बनाया जाएगा, जो बच्चों के सीखने की क्षमता का समय-समय पर परीक्षण करेगा। सौ फीसदी नामांकन के जरिए पढ़ाई छोड़ चुके करीब दो करोड़ बच्चों को फिर दाखिला दिलाया जाएगा। स्कूल में प्री-प्राइमरी लेवल पर स्पेशल सिलेबस तैयार होगा। प्री-प्राइमरी शिक्षा के लिए एक विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया जाएगा। इसके तहत तीन से छह वर्ष तक की आयु के बच्चे आएंगे। 2025 तक कक्षा तीन तक के छात्रों को मूलभूत साक्षरता तथा अंकज्ञान सुनिश्चित किया जाएगा। मिडिल कक्षाओं की पढ़ाई पूरी तरह बदल जाएगी। कक्षा छह से आठ के बीच मूल विषयों के साथ ही कला, संगीत, शिल्प, खेल, योग, सामुदायिक सेवा जैसे सभी विषयों को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा। इन्हें सह पाठ्यक्रम नहीं माना जाएगा।
डब्ल्यूएचओ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2017-19 में दुनियाभर में 673 मिलियन आबादी कुपोषित थी, जिसमें से 189.2 मिलियन अर्थात 28 प्रतिशत भारत की है। वर्ष 2019 में भारत के पांच वर्ष से कम उम्र के कुल बच्चों में 28 प्रतिशत अर्थात 40.3 मिलियन कम ऊंचाई वाले कुपोषित बच्चे तथा 43 प्रतिशत अर्थात 20.1 मिलियन कम वजन के कुपोषित बच्चे हैं, जो दुनियाभर में सबसे अधिक तथा शर्मनाक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति इसकी जड़ पर प्रहार करती है। सभी स्कूलों के बच्चों की नियमित स्वास्थ्य जांच, सौ फीसदी टीकाकरण तथा स्वास्थ्य कार्ड की व्यवस्था बनाई जाएगी। मध्याह्न भोजन कार्यक्रम को प्री-स्कूल बच्चों तक बढ़ाया जाएगा, साथ ही सुबह का पौष्टिक नाश्ता भी प्रदान किया जाएगा। शारीरिक विकास ही तो मानसिक विकास का आधार है। वंचित तथा गरीब वर्ग के विद्यार्थियों के लिए नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल को बढ़ाया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत स्कूल से दूर रह रहे लगभग सवा तीन करोड़ बच्चों को कक्षाओं में न केवल वापस लाना है, बल्कि उन्हें स्कूलों में बनाए रखना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ऐसे अनेकों ठोस तथा दूरगामी उपायों की संकल्पना रखती है। इसका मकसद देश के भविष्य की तस्वीर तथा तकदीर बदलने वाले भविष्य के युवा तैयार करना है।
वस्तुत: राष्ट्रीय शिक्षा नीति की यह सबसे महत्वपूर्ण तथा परिवर्तनकारी पहल है। देश के सक्षम तथा जिम्मेदार नागरिक बनाने में बच्चों के समग्र विकास पर जोर अपरिहार्य है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति स्कूलों के माध्यम से बच्चों को मानसिक, शारीरिक, चरित्र निर्माण तथा बेहतर नागरिक बनाने का जरिया बनने जा रही है। बच्चे ही तो भविष्य के भारत की बुनियाद हैं, इसीलिए तो मुख्य जोर 3 से 6 वर्ष के बच्चों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से औपचारिक शिक्षा व्यवस्था के भीतर लाकर देश की सूरत बदलने की कोशिश है। अकसर नीतियों का मूल्यांकन उनके क्रियान्वयन पर होता रहा है। अनेकों बढिय़ा नीतियां सही ढंग से लागू न होने के कारण बदहाली की भेंट चढ़ती रही हैं। देशभर में कहीं पर भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति का बड़ा तथा मौलिक विरोध भी सामने नहीं आया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति तो समय सीमा में क्रियान्वयन का नक्शा भी प्रस्तुत कर रही है। बस जरूरत है इसकी मूल भावना को जमीन पर उतारने की। यदि इसे लागू करने का जज्बा ईमानदारी से दिखाया गया तो देश की तस्वीर तथा तकदीर यकीनन बदलेगी। (लेखक विक्रम विवि में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर हैं)