सदैव रत्नदीप के समान रहे मामाजी
   Date08-Oct-2020

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माणिकचन्द्र वाजपेयी जन्म शताब्दी समापन समारोह : सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कहा- बीज की भांति मामाजी समर्पण की मिसाल बन गए
इंदौर द्य 7 अक्टूबर (स्वदेश समाचार)
बीज की ताकत है उसका समर्पण, बीज को मिट्टी में मिलना पड़ता है तब वृक्ष बनता है। डॉ. हेडगेवार ने प्रतिभाशाली तरुणों की पहचान कर उन्हें समर्पण सिखाया। मातृभूमि पर सर्वस्व अर्पण करना जब चारों ओर घनघोर अंधेरा हो तब समर्पण करना यही सार्थकता है,मामाजी का जीवन ऐसा ही था, उनका सम्पूर्ण आत्मविलोपी व्यक्तित्व था जिन्होंने अपना बीजस्व कायम रखा। वे मामाजी रत्नों के दीप थे उन्हें स्नेह, स्टेटस की अपेक्षा नहीं थी, उन्होंने दशांतर व भाग्य खुलने की राह नहीं देखी वे सदा लोक रत्नों (रत्नदीप) से युक्त रहे। उनके सम्पर्क में जो भी आया उसे मामाजी से प्रेम व प्रकाश ही मिला। सबके लिए सज्जन थे मामाजी वे मन में असीम स्नेह लेकर जीवनभर कर्तव्य पथ पर रहे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी मामाजी ने उच्च आदर्श स्थापित किए। उन आदर्शों को आज सबको अपने पत्रकारीय जीवन में उतारना चाहिए। मामाजी के विचारों के अनुसरण से पत्रकारिता के समूचे वातावरण में बदलाव आ सकता है।
उक्त विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प.पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने विख्यात राष्ट्रवादी पत्रकार एवं साहित्यकार माणिकचंद वाजपेयी 'मामाजीÓ जन्मशताब्दी समापन समारोह में बुधवार को व्यक्त किए। कार्यक्रम दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सभागृह में आयोजित था। कार्यक्रम के आयोजक पाञ्चजन्य व इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र एवं सह-आयोजक स्वदेश इंदौर, ग्वालियर, भोपाल व विश्व संवाद केंद्र म.प्र. थे। डॉ. भागवत ने कहा मामाजी जैसे लोगों के कारण ही देश में परिवर्तन आए। ऐसे व्यक्तियों ने अपने को गला कर देश व समाज के लिए कार्य किया। ऐसे लोग अपना बीजत्व हमेशा कायम रखते हैं। ऐसे व्यक्तियों का देश जीवन में महत्व होता है वे अपने कार्यों -कृतत्व से यशस्वी बनें उनमें सार्थकता थी। उन्होंने कहा मामाजी जैसे लोगों के कारण संघ चल रहा है जो दिखते नहीं, होते हैं उनके होने से ही संघ चलता है। उन्होंने कहा आदमी ने क्या किया और क्या बना, दुनिया इसको गिनती है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि आदमी क्या है? यश और सार्थकता दोनों अलग बातें है। जीवन सार्थक होना चाहिए मामाजी का जीवन सार्थक था। मामाजी किसी भी विकट परिस्थिति से नहीं डरे उन्होंने परिस्थितियों को बदला उनकी 'काहु से न दोस्ती काहु से न बैरÓ था वे जानते थे यदि विश्व को बनाना है तो पहले भारत को अपना बनाना होगा। अपने जीवन में भारत झलकना चाहिए। विश्व गुरु भारत या महाशक्ति भारत यानि डंडा चलाने वाला भारत नहीं, भू-भाग नहीं शत-शत मानवता हृदय जीतने वाला भारत। ऐसा भारत बनाना है तो ऐसे भारतीयों को खड़ा करना होगा जो आत्मीय भाव से समर्पित होकर कार्य करें। मामाजी ने इसी आत्मीय भाव से कार्य किया और उन्होंने शत-शत लोगों को अपना बनाया वे हिंदू संगठन के आधार थे। दुनिया को जैसा बनाना है वैसा स्वयं बनों उन्होंने ऐसा किया। जीवन में जो खड़े हैं उनके प्रति कृतघ्न होना चाहिए। मामाजी थे इस 'थेÓ में सबकुछ आ गया।
उन्होंने विश्वास अर्जित किया- उन्होंने कहा कि भारत विभाजन के समय देशभर में दंगे चल रहे थे। तब मामाजी भिंड के जिला प्रचारक थे और वे यह चिंता कर रहे थे कि भिंड जिले के एक भी गांव में दंगा नहीं होना चाहिए। दंगे के डर से जब मुस्लिम परिवारों ने भिंड छोड़ा तो वे अपने घरों की चाबियां मामाजी को सौंप कर गए। अपने व्यवहार और कार्य से मामाजी ने यह विश्वास अर्जित किया। जब संघ पर प्रतिबंध लगा और पुलिस मामाजी को ढूंढ रही थी, तब वे मुस्लिम परिवारों में ठहरे। यह आत्मीयता मामाजी ने अपने संघ कार्य से बनाई थी।
जो संपर्क में आया, उसे स्नेह व प्रकाश मिला-डॉ. भागवत ने कहा मामाजी रत्नों के दीप थे उन्हें स्नेह, स्टेटस की अपेक्षा नहीं थी, उन्होंने दशांतर व भाग्य खुलने की राह नहीं देखी वे सदा अपने कार्य को करते रहे वे सदा लोकरत्नों से युक्त रहे उनके संपर्क में जो भी आया उसे मामाजी से प्रेम व प्रकाश ही मिला। भारत की भारतीयता व हिंदुत्व की विचारधारा का पूर्ण सार अपनत्व है और उन्होंने ऐसे ही जिया सबको अपनत्व दिया सबके लिए सज्जन थे। मामाजी वे जीवनभर कर्तव्य पथ पर रहे। उन्होंने समर्पण सिखा था ध्येय के लिए और वह उन्होंने किया। सेल्फ रेग्युलेशन मामाजी के जीवन से प्रेरणा लेकर आएगा। मामाजी के जीवन से प्रेरणा मिलती है। उन्होंने जो देश व पत्रकारिता को दिया है पत्रकारिता के धर्म को उन्होंने जैसे निभाया उससे प्रेरणा ले इससे पत्रकारिता में भी परिवर्तन आएगा उसको हम ग्रहण करें।
यह थे मौजूद-कार्यक्रम का संचालन सच्चितानंद जोशी ने किया आभार अरुण गोयल (पाञ्चजन्य के प्र. निदेशक) ने माना। इस अवसर पर पाञ्चजन्य का मामाजी पर निकाले विशेषांक व शब्द पुरुष माणिकचंद वाजपेयी इन दो पुस्तकों का अतिथियों ने विमोचन किया। डॉ. गायत्री ने एकल गीत व वंदे मातरम् गान गाया। इस मौके पर सहसरकार्यवाह मनमोहन वैद्य, दत्तात्रेय होसबाले, अरुण कुमार, डॉ. वेदप्रताप वैदिक, नरेन्द्र जैन, सुनील आम्बेकर सहित बड़ी संख्या में बंधु भगिनी उपस्थित थे।