चुनाव आयोग की चुनौती कोविड काल में बिहार चुनाव
   Date08-Oct-2020

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प्रभुनाथ शुुक्ल
बि हार देश का पहला ऐसा राज्य है जहां कोरोना संक्रमण के दौर में पहला चुनाव होने जा रहा है। चुनाव आयोग के लिए यह बड़ी चुनौती और अनुभव की बात है। वहीं चुनाव से जुडऩे वाले राजनीतिक दल, मतदाता और राजनेताओं के लिए भी यह चुनाव एक नया प्रयोग होगा। अब आयोग इन चुनौतियों से कैसे निपटता यह देखने की बात होगी। लेकिन चुनावी खर्च के लिहाज से यह बेहद महंगा चुनाव साबित होगा। 'कोविड- 19Ó की वजह से आयोग ने विशेष तरह की गाइड लाइन जारी की है। उसके अनुपालन पर काफी खर्च भी आएगा। जिसका सीधा प्रभाव आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।
बिहार चुनाव की वजह से अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त भार पड़ेगा। जिसकी वसूली आम आदमी से टैक्स के रूप में की जाएगी। कोविड संक्रमण और बढ़ते खर्च को देखते हुए आयोग को 'ऑनलाइन वोटिंगÓ सरीखी व्यवस्था पर अमल करना चाहिए था। इस प्रयोग को अमल में लाकर जहां चुनावी खर्च को कम किया जा सकता था वहीं 'कोरोना संक्रमणÓ से भी बचा जा सकता था। क्योंकि देशभर में कोविड संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। इस हालात में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बहाल करने के साथ- साथ आम की सुरक्षा का भी ख्याल लाजमी होता।
'कोविडÓ संक्रमण को देखते हुए आयोग ने आम आदमी और उसकी सुरक्षा का फिलहाल विशेष ख्याल रखा है। आयोग ने वोटिंग का समय बढ़ा दिया है। अब शाम छह बजे तक वोट डाले जाएंगे। मतदान केंद्र पर सभी कर्मचारी किट में होंगे। वोटिंग के लिए 'पोलिंग बूथÓ पर आने वाले मतदाताओं की 'थर्मल स्क्रीनिंगÓ यानी उनके शरीर का तापमान मापा जाएगा। 'वोटिंग मशीनÓ पर अपने मन पसंद उम्मीदवार पर वोट करने से पहले 'दस्तानाÓ पहनना अनिवार्य होगा। अंतिम एक घंटे 'कोविड संक्रमितÓ मरीजों के लिए होंगे जो अपना वोट इत्मीनान से डाल सकते हैं। इसके अलावा वह अपने मताधिकार का प्रयोग 'पोस्टल बैलेटÓ से भी कर सकते हैं। लेकिन यह सुविधा सिर्फ उन्हीं के लिए होगी जो आयोग के दिशा- निर्देश की श्रेणी में आएंगे।
मतदान स्थल पर सभी को 'सामाजिक दूरीÓ का पालन करना जरूरी होगा। 'पोलिंग बूथÓ पर हाथ धोने के लिए सेनिटाइजर, साबुन और पानी की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध होगी। आयोग ने नामांकन में भी बदलाव किया है। नामांकन स्थलों पर भीड़ और जुलूस से बचने के लिए उम्मीदवार अपना नामांकन परम्परागत तरीके से करने के बजाय 'ऑनलाइनÓ भी कर सकता है। चुनावी रैली में अधिक भीड़ जमा करना भी गुनाह होगा। सिर्फ पांच गाडिय़ों की अनुमति होगी। जनसम्पर्क में पांच आदमियों से अधिक लोग नहीं होंगे। हर बूथ पर अधिकतम एक हजार वोटर ही होंगे। बूथ को 72 घंटे पहले से सेनिटाइज किया जाएगा। इस तरह के एतिहाद बरतने के निर्देश दिए गए हैं। अब अनुपालन कितना होगा यह तो वक्त बताएगा।
बिहार चुनाव राजनीति दलों की अग्नि परीक्षा के साथ आयोग की भी परीक्षा होगी। 'कोविड- 19Ó संक्रमण की वजह से चुनाव पर खर्च होने वाली राशि में कई गुना इजाफा होगा। क्योंकि 'कोरोना संक्रमणÓ के लिए जो निर्देश दिए गए हैं उसके अनुपालन में परंपरागत चुनावी खर्च स्वभाविक रूप से बढ़ जाएगा। इस बार वोटरों और मतदान कर्मियों के लिए 'कोरोना किट्सÓ दस्ताने, सेनिटाइज, साबुन, थर्मल मीटर समेत कई अतिरिक्त वस्तुओं और सुविधाओं के साथ ट्रांसपोर्ट पर अधिक खर्च करना पड़ेगा। चुनाव वैसे भी महंगे होते जा रहे हैं, संक्रमण की वजह से यह और महंगा हो जाएगा। जिसका सबसे अधिक प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर पड़ेगा। जबकि राजनीति इसे लेकर बेफ्रिक है।
कोरोना की वजह से देश आर्थिक मंदी से गुजर रहा है। लगातार जीडीपी गिर रहीं है। 'वैश्विक मंदीÓ का दौर है। उस हालत में आयोग के लिए सबसे बेहतर विकल्प 'ऑनलाइन वोटिंगÓ की सुविधा होती। आयोग को 'बिहार चुनावÓ में विकल्प के तौर पर इसका प्रयोग करना चाहिए था। चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव में खर्च की सीमा बढ़ा दिया था। पूर्व की व्यवस्था में एक उम्मीदवार 40 लाख रुपए तक खर्च कर सकता था लेकिन आयोग ने इसे बढ़ा कर 70 लाख और छोटे राज्यों में 22 से बढ़ा 54 लाख कर दिया है। जबकि विधानसभा में बड़े राज्यों में अधिकतम 28 लाख रुपए कर दिया है। हालांकि कोई भी उम्मीदवार कुल मतों का छठा हिस्सा नहीं प्राप्त करता है तो उसकी जमानत राशि जब्त हो जाएगी। चुनावी खर्च लगातार बढ़ रहा है। जबकि यह पैसा आम आदमी की जेब से जाता है। अगर इसे कम कर दिया जाए तो अर्थव्यवस्था को नई उड़ान मिलेगी, लेकिन यह मसला हमारी अंधी- बहरी राजनीति का कभी हिस्सा नहीं बन पाया। एक आंकड़े के मुताबिक 1952 में हर एक वोटर पर जहां सरकार को 62 पैसे का खर्च करना पड़ता था वहीं 2004 में यह 17 रुपए और 2009 में 12 रुपए प्रति वोटर पर जा पहुंचा। 2009 के लोकसभा चुनावों में यह खर्च 1,483 करोड़ था जो कि 2014 में तीन गुना बढ़कर 3,870 करोड़ रुपए हो गया। जबकि 2019 के आम चुनाव में यह राशि सारे आंकड़े ध्वस्त करते हुए 80 अरब यानी 8 हजार करोड़ रुपए पहुंच गया। आयोग के निर्धारित खर्च से कई गुना चुनावों में अधिक खर्च होता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक एक सीट पर एक प्रत्याशी न्यूनतम 15 करोड़ रुपए खर्च करता है। लेकिन संसद और राजनीति इस पर कभी गम्भीर नहीं दिखी।
बिहार विधानसभा के 2015 में हुए चुनाव में सरकार के खजाने पर लगभग 300 करोड़ रुपए का भार आया था। यह सिर्फ सरकारी खर्च था इसमें राजनीतिक दलों का खर्च नहीं शामिल नहीं है। यह 2010 के विधानसभा चुनाव से डेढ़ गुना अधिक था। अब सोचिये चुनावों पर हम इतनी राशि क्यों खर्च कर रहे हैं। जब देश 'कोरोना संक्रमणÓ की वजह से आर्थिक मंदी से गुजर रहा है। जीडीपी की रेटिंग और रैंकिंग दोनों गिर रहीं है। फिर चुनावी खर्च कम करने के लिए हम विचार क्यों नहीं करते। जब हम 'ऑनलाइनÓ नामांकन कर सकते हैं फिर 'ऑनलाइन वोटिंगÓ क्यों नहीं ? स्वच्छ और पारदर्शी चुनाव संपन्न कराना आयोग का नैतिक दायित्व है। लेकिन भारी भरकम के बाजाय संतुलित और तकनीकी सुविधायुक्त चुनाव कराना भी आयोग की नैतिक जिम्मेदारी है। आयोग को 'ऑनलाइन वोटिंगÓ की शुरुआत बिहार से करनी चाहिए। क्योंकि यह कोरोना संक्रमण से बचाव का सबसे अच्छा तरीका साबित हो सकता है। आयोग को इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)