सात्विक कर्म ही तुष्टि का कारक
   Date08-Oct-2020

dharmdhara_1  H
धर्मधारा
(गतांक से आगे)
सं त ने उनसे पूछा- 'राजा ने उनको, उनके पास क्यों भेजा है?Ó महामंत्री ने उत्तर दिया- 'कुछ सीखने के लिए।Ó इतना कहने के बाद महामंत्री बोले - 'वैसे तो मैं सभी कुछ जानता हूं, फिर भी राजा का आदेश था तो आना पड़ा।Ó महामंत्री का उत्तर सुनकर संत मुस्कराए और बोले - 'यदि ऐसी बात है तो चाय ग्रहण कर लें, ताकि बाद में कुछ ज्ञान की बातें हो सकें।Ó ऐसा कहते हुए उन्होंने एक चाय से भरा हुआ प्याला लिया और उसमें और चाय डालना शुरू किया। स्वाभाविक था कि चाय प्याले से बाहर निकल कर फैलती। महामंत्री ने संत को टोका और बोले - 'ये आप क्या कर रहे हैं? राजा ने तो कहा था कि आप ज्ञानी व्यक्ति हैं, फिर एक भरे हुए प्याले में और चाय डालने का प्रयत्न क्यों कर रहे हैं? यह चाय तो बाहर फैल जाएगी।Ó संत बोले - 'महामंत्री यही कार्य तो आप भी कर रहे हैं। आप पहले ही अपने ज्ञान के अहंकार से भरे हुए हैं कि उसमें कुछ नया समाहित होने की संभावना ही खत्म हो गई है। यदि ज्ञान प्राप्त करना है तो अहंकार शून्य होना जरूरी है।Ó स्पष्ट है कि जहां कर्म पर अहंकार का बोझ नहीं है, वह कर्म सात्विक ही होगा और सात्विक कर्म सुख, ज्ञान और प्रकाश ही दे सकता है। इसी प्रकार राजसिक कर्म, मात्र लोभ को जन्म देता है, क्योंकि वहां कर्म को करने की प्रेरणा, अहंकार से उपज रही है। जहां अहंकार है, वहां महत्वाकांक्षाएं है, वहां अधिक की चाहत है और जहां अधिक की चाहत है, वहां राजसिक कर्म है। ऐसा कर्म, कभी किसी को तुष्ट नहीं कर पाता है। सिकंदर के जीवन की भी कुछ ऐसी ही घटना है, जब वह भारत की सीमा से परास्त होकर और अपनी आधी से ज्यादा सेना को गंवाकर वापस लौट रहा था, तब उसकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी। कई दिनों तक सैनिकों को भोजन नहीं मिलता था। भूखे-प्यासे कई सैनिक मृत्यु का शिकार हो रहे थे। एक दिन मार्ग में उसे एक वृद्ध महिला का निवास मिला। सिकंदर के सैनिकों ने उस वद्धा से भोजन की मांग की। उनकी स्थिति देखकर उसको उन पर दया आ गई और उसने उनके लिए भोजन तैयार कर दिया। भोजन परोसते समय जब उसे पता चला कि उनमें से बीच में बैठा हुआ व्यक्ति सिकंदर है तो उसने उसकी थाली में से रोटियां हटाकर वहां पर कुछ सिक्के डाल दिए। सिकंदर ने वृद्धा से प्रश्न किया- 'मां! मुझे रोटियां क्यों नहीं दीं? मैं भी तो भूखा हूं।Ó वह महिला बोली - 'बेटा! यदि रोटियों से तेरा पेट भर जाता तो पैसों के इन टुकड़ों के लिए इतना मारा-मारा क्यों घूमता? यह जो दौड़ है, यह कभी किसी को तुष्टि नहीं दे पाती। मनुष्य अपने अहंकार की पूर्ति के लिए मारा-मारा घूमता है, परन्तु अंत में जाता खाली हाथ ही है। (समाप्त)