राजनीतिक द्वेष की पराकाष्ठा...
   Date07-Oct-2020

vishesh lekh_1  
पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव की एक तरह से उलटी गिनतियां शुरू होने वाली हैं... बिहार के बाद पश्चिम बंगाल का ही अगले साल नंबर रहेगा... लेकिन इस बीच जिस तरह का राजनीतिक परिदृश्य पूरे पश्चिम बंगाल में हिंसा व अराजकता की पराकाष्ठा को पार करता नजर आता है, उससे इतना तो साफ है कि राजनीतिक द्वेष इतना भी नहीं उबाल खाना चाहिए कि सत्ता स्वार्थ के लिए विपक्ष व विरोधी दल के नेताओं के प्राण ही छीन लिए जाएं... करीब डेढ़ साल से पश्चिम बंगाल में लगातार भाजपा संगठन के नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है... राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों और वरिष्ठ पदाधिकारियों पर भी लगातार हमले हो रहे हैं... क्या इन हमलों को पूर्व नियोजित साजिश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए..? इससे भी बढ़कर आखिर सत्तासीन सरकार को ऐसा कौन-सा आंतरिक भय खाए जा रहा है कि वे लगातार भाजपा नेताओं की हत्या का सिलसिला जारी रखे हुए हैं..? सोमवार को भाजपा के मनीष शुक्ला की हत्या की जांच ममता सरकार द्वारा सीआईडी से कराने का आदेश दिया गया था... जबकि भाजपा सीबीआई जांच पर अड़ी हुई है... इसी के सिलसिले में 12 घंटे का बैरकपुर बंद भी भाजपा ने बुलाया था... यह मामला सुलझा नहीं कि इसी क्षेत्र में एक और भाजपा नेता की हत्या मंगलवार को हो चुकी है... यह ऐसी स्थिति में जिसमें राजनीतिक द्वेष के कारण सारी हदें सत्तापक्ष लगातार पार कर रहा है... कितना वीभत्स घटनाक्रम है कि भाजपा कार्यकर्ताओं के शव पश्चिम बंगाल में पेड़ों पर फांसी के फंदों पर लटके हुए मिल रहे हैं... लेकिन जब उनकी पोस्टमार्टम जांच और पुलिस कार्रवाई के बाद जो तथ्य सामने आते हैं, उसमें उन्हें प्रताडि़त करके मारने, उनके शरीर पर गहरे घाव होने जैसी बातें स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी हैं... ममता बनर्जी एक आंतरिक भय से लगातार घिरती जा रही हैं, क्योंकि वामपंथी नेता ही नहीं, बल्कि अब तो कुछ कांग्रेस के नेता भी ममता के खिलाफ बिगुल फूंक चुके हैं... भाजपा के नेता ममता की आँखों की किरकिरी इसलिए बने हुए हैं, क्योंकि वर्तमान सत्तासीन तृणमूल की सरकार व संगठन से जुड़े लोग ही भाजपा का तेजी से दामन थाम रहे हैं... इस तरह से अपने पैरोंतले की जमीन खिसकती देख ममता बनर्जी भाजपा के नेताओं पर ही नहीं, बल्कि तृणमूल कार्यकर्ताओं पर भी एक आंतरिक भय का माहौल निर्मित करने का खेल खेल रही हैं.., लेकिन ममता बनर्जी को ध्यान रखना चाहिए कि लोकतंत्र में अराजक एवं हिंसक व्यवहार का जवाब अनेकों बार वोट की करारी चोट से दिया जाता रहा है... ममता के लिए भी वे दिन अब दूर नहीं रहे...
दृष्टिकोण
शर्तों के साथ स्कूल खुलने के मायने...
वैश्विक महामारी कोरोना के कारण पूरी दुनिया में हड़कंप मचा हुआ है... इस बीच हर तरह की शैक्षणिक व अन्य स्कूल-कॉलेज वाली गतिविधियां ऑनलाइन संचालित हो रही हैं... सही मायने में कोरोना ने शैक्षणिक जगत में एक नए बदलाव का खांका खींच दिया... लेकिन इस ऑनलाइन तकनीक के जरिये अध्ययनरत छात्र-छात्राओं, अध्यापक और स्कूल प्रबंधन से लेकर पालकों के बीच जो खाई बनती जा रही है, उसको भी ध्यान रखा जाना चाहिए... क्योंकि आज शहर से लेकर गांव तक हर व्यक्ति के पास इसकी पूर्ण उपलब्धता नहीं है... ऐसे में जो संसाधन सम्पन्न है, वही ऑनलाइन शिक्षा में कदमताल कर पा रहा है... अगर केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय ने आगामी 15 अक्टूबर से क्रमबद्ध तरीके से शर्तों के साथ स्कूल खोलने के दिशा-निर्देश जारी किए हैं, तो इसके स्पष्ट मायने यही हैं कि बहुत ही सजगता, सतर्कता एवं कोरोना से बचाव के हर तरह के उपायों को अमल में लाते हुए स्कूल प्रबंधन, शिक्षकों, पालकों और विद्यार्थियों को कदम बढ़ाना होगा... हर किसी के सामने एक लक्ष्मण रेखा रहेगी और स्वयं की जिम्मेदारी भी... यही कि आप अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहते हैं तो क्या उस जोखिम को उठाने को तैयार हैं, जो अदृश्य है... क्योंकि स्कूल प्रबंधन एवं शिक्षकों के लाख सतर्कता उपायों के बावजूद वायरस से बचाव आसान नहीं है... इसलिए 15 अक्टूबर से 15 नियमों के साथ कितने पालक संतुष्ट होकर बच्चों को स्कूल पहुंचाएंगे..? कहना मुश्किल है... क्योंकि अभी तो 10-12वीं के बच्चों को ही अनुमति मिलेगी... यही स्थिति स्कूल प्रबंधन एवं उन स्कूल संचालकों के सामने भी रहेगी, जो कोरोनाकाल में फीस न मिलने के कारण ऑनलाइन कक्षाओं के बाद अब नियमित स्कूल खोलने को आतुर नजर आते हैं... क्या वे भी हर तरह की गाइडलाइन के पालन हेतु सभी संसाधनों को उपलब्ध करवाने हेतु तैयार हैं...