भारत की ऋषि संस्था के आधुनिक प्रतिनिधि दत्तोपंतजी
   Date07-Oct-2020

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माधव गोविंद वैद्य
'का र्यकर्ताÓ को प्रस्तावना लिखने का सद्भाग्य मुझे प्राप्त हुआ था। उसमें मैंने जो लिखा है, उसका ही थोड़ा अंश मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ- ''यह विचारधन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में है। इसमें अधिष्ठान, कार्य पद्धति और कार्यकर्ता इन तीनों दृष्टियों से संघ की चर्चा की गई है। वैसे ये तीनों विषय हम लोगों के सामान्य परिचय के हैं। इनके साधारण अर्थ भी सभी को ज्ञात हैं, किन्तु इन सर्वविदित सामान्य विषयों को मा. दत्तोपंत की सर्वस्पर्शी प्रतिभा का स्पर्श होते ही वे एक नई प्रखरता, नया तेज और नया रुपलावण्य लेकर अपने सामने आते हैं। लोहे को सवर्ण में परिणित करने वाली यह प्रतिभा जितनी अभिजात है, उतनी ही दत्तोपंत के प्रचंड अध्ययन और प्रगाढ़ चिंतन से वह विभूषित है। सुप्रसिद्ध कश्मीरी साहित्य-मर्मज्ञ मम्मट ने उत्तम काव्य की निर्मिति के तीन 'हेतुÓ बताये हैं। मम्मट की भाषा में वे हैं- शक्ति, निपुणता और अभ्यास। 'शक्तिÓ माने स्वयंभू प्रतिभा। 'निपुणताÓ आती है लोक-व्यवहारों, काव्यों तथा शास्त्रों के निरीक्षण से और अभ्यास होना चाहिए काव्य मर्मज्ञों की शिक्षा का, किन्तु ये तीन अलग-अलग नहीं हैं। ऊपर की कारिका लिखने के तुरंत बाद स्पष्टीकरण देते हुए, मम्मट लिखते हैं ''इति हेतु: न हेतव:ÓÓ मतलब है, तीनों मिलकर एक ही 'हेतुÓ बनता है। दत्तोपंत के इस सम्पूर्ण विवेचन में भी, अभिजात प्रतिभा (शक्ति), लोक व्यवहारों के सम्यक् निरीक्षण से आई 'निपुणताÓ और संघ कार्य का स्वयं का समृद्ध अनुभव तथा प.पू. गुरुजी के निकट सम्पर्क से प्राप्त ज्ञान सम्पन्नता और शिक्षा की उच्च कोटि की उपलब्धि, इन तीनों का एक संपृक्त रसायन भरा है। इस विवेचन में क्या नहीं है। सामान्य बुद्धि को चकित करने वाले सारे संदर्भ हैं। संदर्भों की व्याप्ति तथा विविधता अलौकिक है। अथर्व वेद से लेकर बाईबिल तक, संत ज्ञानेश्वर से लेकर उमर खैय्याम तक, डायोजेनिस डेमोक्रॅटिस से लेकर कार्ल माक्र्स तक, पातञ्जल योग से लेकर इमर्सन-कार्लाइल तक, कालिदास से लेकर टेनिसन तक, ईसा-मसीह से लेकर मोहम्मद साहब तक, संत रामदास से लेकर जोसेफ मॅझिनी तक, नारद भक्ति सूत्र से लेकर विश्वगुणादर्श चम्पू तक, गोस्पेल ऑफ जॉन से लेकर शरु रांगणेकर के वंडरलैंड ऑफ इंडियन मैनेजमेंट तक, अनेक व्यक्तियों के संस्मरणों तथा कई ग्रंथों के उद्धरणों का रत्न भंडार इस करीब तीन सौ पृष्ठों के ग्रंथ में विद्यमान है। दत्तोपंत आराम कुर्सी पर बैठकर विद्वत्ता की उपासना करने वाले पढ़ाकू पंडित नहीं हैं। सक्रिय कार्यकर्ता हैं। संघ के प्रचारक, जनसंघ के संगठक, मजदूर संघ के संस्थापक, किसान संघ-स्वदेशी जागरण मंच, प्रज्ञा प्रवाह आदि मोर्चों एवं मंचों के सक्रिय मार्गदर्शक-इन सब भूमिकाओं को एक व्यक्ति द्वारा निभाना- यही एक महान आश्चर्य की बात है। यह सब करते हुए, वे कब पढ़ते होंगे, पढ़ा हुआ कैसे ध्यान में रखते होंगे और यथा समय उसकी उपस्थिति कैसी होती होगी, इन सब भूमिकाओं को एक व्यक्ति ने निभाना- यही एक महान आश्चर्य है। इन सब प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास करेंगे तो अलौकिकता की परिधि में प्रवेश किए बिना चारा नहीं।ÓÓ
स्वयं दत्तोपंत बताते थे कि किसी भी कार्य की सफलता के लिए पांच कारण होते हैं, वे इस सम्बन्ध में श्रीमद् भगवद् गीता के 18वें अध्याय का एक श्लोक बताते हैं। श्लोक है-
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक् चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्छमम्॥
(अ. 18, श्लोक 14)
तो प्रधान है 'अधिष्ठानÓ। यानी आधारभूत सिद्धांत। बाद में कर्ता, करण तथा विविध चेष्टाएं आती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अधिष्ठान है हिंदुत्व। हिंदू यह किसी संप्रदाय का, मजहब का या रिलिजन का नाम नहीं है। यह एक संस्कृति का यानी मूल्य-व्यवस्था का नाम है। यह संस्कृति, जिनको दुनिया, हिंदू इस नाम से जानती है, उन्होंने विकसित की, इसलिए इसे हिंदू संस्कृति या हिंदुत्व कहा जाता है। हमारी राष्ट्र-अवधारणा इसी सिद्धांत पर आधारित है। इसलिए हम कहते हैं कि यह हिंदू राष्ट्र है। एक जमाना था कि जब राष्ट्रभाव, अंतरराष्ट्रीय सोच का विरोधी माना जाता था। दत्तोपंतजी ने 'पं. दीनदयाल उपाध्याय - विचार दर्शनÓ की विस्तृत प्रस्तावना में इस भ्रांति को दूर किया है। अनेक उद्धरण दत्तोपंतजी ने इस विषय की चर्चा करते हुए दिए हैं।
बिपिनचंद्र पाल कहते हैं- ''राष्ट्रीयता वैश्विक मानवता से अलग नहीं की जा सकतीÓÓ और वे आगे कहते हैं ''हिंदुत्व यह एक फेडरल संघात्मक संकल्पना नहीं है, वह उसके इतनी आगे बढ़ गई है कि भारत वैश्विक ऐक्य का, वैश्विक संघ राज्य का प्रतीक बन गया है।
कम्युनिस्ट नेता अच्युत मेनन को दत्तोपंत उद्धृत करते हैं, मेनन कहते हैं- ऐसा प्रतीत होता है कि सांस्कृतिक एकता को बनाने के लिए हिंदू जीवन श्रद्धाओं का बहुत योगदान रहा है। मैं हिंदू जीवन श्रद्धा की बात कर रहा हूँ। हिंदू रिलिजन की नहीं, इसका कारण यह है कि सामान्य अर्थ में हिंदू रिलिजन नहीं है। यह सर्वसमावेशक, विविधताओं का आदर करने वाला, मानव से लेकर चराचर सृष्टि तक को अपनेपन की भावना में समाविष्ट करने वाला तत्व हिंदुत्व है, वहीं हमारे राष्ट्रभाव का आधार है। संघ जब हिंदू राष्ट्र की बात करता है, तब यही उदारता को वह अधोरेखित करता है। इस बुनियाद पर वह सम्पूर्ण हिंदू समाज को संगठित करने के कार्य में जुटा है। 'सम्पूर्ण समाज का संगठनÓ यह ध्यान में रखना चाहिए। 'समाजें का एक संगठनÓ नहीं 'ऑफ्Ó और 'इन्Ó का अर्थ भेद हमें ध्यान में रखना चाहिए।
समाज का स्वरूप व्यामिश्र रहता है। समाज जितना अधिक प्रगत और प्रगल्भ, उतनी व्यामिश्रता अधिक रहेगी, ऐसे समाज-जीवन के अनेक क्षेत्र और उपक्षेत्र बनना अत्यंत स्वाभाविक है। राजनीति एक क्षेत्र है। धर्म, शिक्षा, उद्योग, कृषि जैसे ऐसे अनेक क्षेत्र होते हैं। मजदूर उद्योग क्षेत्र का उपक्षेत्र है। इन सभी क्षेत्रों का 'अधिष्ठानÓ हिंदुत्व की विचारधारा होनी चाहिए। दत्तोपंतजी ने यह मूलभूत सिद्धांत को कभी अपनी आँखों से ओझल नहीं होने दिया। भारतीय मजदूर संघ के बाद, दत्तोपंतजी की प्रेरणा से भारतीय किसान संघ आया, सामाजिक समरसता मंच आया, सर्वपंथ समादर मंच का निर्माण किया गया। इन सभी में अधिष्ठान, सर्वव्यापक, सर्वसमावेशक हिंदुत्व रहा। प्रतिबंध के बावजूद जब संघ में भी एक वैचारिक तूफान खड़ा हुआ था, तब श्री गुरुजी ने सबसे पहले सन् 1954 में सिन्दी, उसके बाद सन् 1960 में इंदौर में और अंत में सन् 1972 में ठाणे में संघ की सम्पूर्ण समाज के संगठन की भूमिका कार्यकर्ताओं के सामने स्पष्ट की थी। उन्होंने कहा था कि ''सम्पूर्ण समाज का संगठन का अर्थ है, समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का संगठन।ÓÓ इसी हेतु से संघ के कार्यकर्ता विभिन्न क्षेत्रों में गए। कुछ अपनी रुचि और प्रतिभा से, तो और कुछ संघ की प्रेरणा से। धर्म के क्षेत्र में तो स्वयं श्री गुरुजी ने पहल की थी। सिन्दी में उन्होंने बताया था कि विभिन्न क्षेत्रों में गए अपने कार्यकर्ता अपने राजदूत हैं। राजदूत किसी भी देश में जाएं, अपने देश के हित की चिंता करता है। इंदौर में या ठाणे में उन्होंने कहा, ''वे अपने सेनापति हैं, विभिन्न क्षेत्रों में विजय पाने के लिए गए हैं।ÓÓ श्री गुरुजी के देहावसान के बाद तो संघ प्रभावित क्षेत्रों का एक विशाल परिवार ही बना है। विभिन्न क्षेत्रों में गए राजदूत हो या सेनापति, वे संघ के हित का ध्यान रखेंगे, किन्तु संघ के हित का यानी किसके हित का? 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघÓ नामक एक संस्था का हित नहीं, संघ की जो विचारधारा है, उसका हित। उस हिंदुत्व या हिंदू राष्ट्र की अधिष्ठान की विजय, उस सिद्धांत से उस क्षेत्र को प्रभावित करने का कार्य।
दत्तोपंत ठेंगड़ी की विशेषता यह है कि वे इस अधिष्ठान को भूले नहीं। गंगा गए गंगादास नहीं बने। पं. दीनदयालजी उपाध्याय के बारे में ठेंगड़ीजी ने जो लिखा, वह शत-प्रतिशत उनके बारे में भी सही है। ठेंगड़ीजी लिखते हैं -''राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले स्वयंसेवकों की ओर से संघ की जो अपेक्षाएं होती हैं, वे उन्होंने (दीनदयालजी ने) शत-प्रतिशत पूर्ण की। अपने कार्य की रचना और विकास, संघ सिद्धांतों के प्रकाश में किया। अपने क्षेत्र में जल्दी सफलता मिले, इस हेतु से उस क्षेत्र की गलत धारणाएं या गलत रीति-नीतियों का मोह उनको नहीं हुआ। संघ संस्कारों के अनुकूल रीति-नीति का सूत्रपात उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में किया। इस कारण तात्कालिक सफलता पाने में बाधा आएगी, यह वे जानते थे, किन्तु वे यह भी जानते थे कि औरों ने गंदे किए हुए कार्य क्षेत्र को स्वच्छ और परिष्कृत करने का दायित्व अपने ऊपर है, इस कारण, कार्य- सिद्धि में विलम्ब हुआ तो भी चलेगा, यह उन्हें मान्य था।ÓÓ ऐसा लगता है कि ठेंगड़ीजी, मानो, अपनी ही बात कह रहे हैं। संघ के जो कार्यकर्ता भिन्न-भिन्न क्षेत्र में गए हैं और वहाँ पर कई वर्षों से काम कर रहे हैं, उन्हेें उपरिलिखित संदर्भ में अपने-अपने कर्तत्व का अंत:परीक्षण करना चाहिए और मूल्यांकन करना चाहिए कि वे अपने मौलिक अधिष्ठान से कितने प्रामाणिक रहे हैं।
अपने भारत के इतिहास में ऋषि संस्था का उल्लेख आता है। ऋषि स्वयं के लिए कुछ भी नहीं चाहते थे, किन्तु समाज ठीक चले, सब सामाजिक व्यवस्थाएं ठीक चले, इसका भान रखते थे। मैं कहता हूँ कि दत्तोपंत भारत के प्राचीन ऋषि संस्था के आधुनिक प्रतिनिधि थे। 'कार्यकर्ताÓ के प्रस्तावना के अंत में मैंने लिखा था ''मुझे यह सम्पूर्ण पुस्तक (कार्यकर्ता) एक उपनिषद की भाँति, प्रत्यक्ष अनुभूति से प्राप्त मौलिक ज्ञान से ओत-प्रोत लगती है। मानो राष्ट्र उपनिषद जैसी। हां उपनिषद। संघोपनिषद्।ÓÓ और उपनिषद, ऋषि के द्वारा नहीं प्रकट होगी तो और किस के द्वारा।
(लेखक वरिष्ठ चिंतक एवं रा. स्व. संघ के अ.भा. प्रचार प्रमुख रहे हैं)
(समाप्त)