सात्विक कर्म ही तुष्टि का कारक
   Date07-Oct-2020

dharmdhara_1  H
धर्मधारा
स त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से लोभ उत्पन्न होता है तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं, साथ ही अज्ञान भी होता है। श्री भगवान कहते हैं कि सात्विक कार्य, चित्त के निर्मल होने से व व्यक्तित्व के प्रकाशित होने से ही संभव हो पाते हैं और स्वाभाविक है कि ऐसे कर्म के फल सुख, ज्ञान व प्रकाश ही होंगे। जो कर्म निरासक्ति के भाव से उत्पन्न होता है, जहां पर कर्तापन का अधिकार, 'मैंÓ भाव का पागलपन इत्यादि शेष नहीं रह जाते, वहीं पर सात्विक कर्म के हो पाने की संभावना होती है। अहंकार से लिप्त कर्म सात्विक नहीं रह जाता, वरन निरासक्ति, करुणा व निरहंकारिता से उत्प्रेरित कर्म सात्विक कहलाता है। इसे ऐसे समझें कि जैसे फूल है, जो यह सोचकर नहीं खिलता कि कोई मेरी प्रशंसा करेगा या नहीं, वायु यह सोचकर नहीं बहती कि कोई मेरे साथ चलेगा या नहीं, पर्वत यह सोचकर नहीं बढ़ता कि कोई मेरे आगे झुकेगा या नहीं? उनका होना ही, उनके अस्तित्व का प्रमाण है। एक फूल चाहे निर्जन घाटियों में उगे या किसी सुंदर उपवन में, उसकी सुंदरता समान रहती है। सात्विक कर्म भी एक ऐसा ही कर्म है, जो अहंकार की पुष्टि के लिए नहीं होता, बल्कि वह सभी अवस्थाओं में समान ही रहता है। सात्विक कर्म का आधार ही निरहंकारिता है। जहां अहंकार शून्य हो जाए, वहां पर झुका कर्म सात्विक कर्म है। जो पहले ही करने के अहंकार से भरे हुए हैं, वे निर्मल व पवित्र कर्म नहीं कर पाते हैं।
इस संदर्भ में एक प्यारी झेन कथा है। जापान में एक प्रसिद्ध संत रहा करते थे। जापान के राजा ने अपने महामंत्री को उनके पास कुछ सीखने के लिए भेजा। महामंत्री स्वअर्जित जानकारियों से भरे ज्ञान के अहंकार से ग्रस्त थे। वे जब संत के पास मिलने के लिए पहुंचे तो उन्होंने एक लंबा समय मात्र अपनी उपलब्धियों को गिनाने में लगाया। (क्रमश:)