रावण मार्गी होने से बचाएगी संस्कारों की पाठशाला...
   Date25-Oct-2020

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
ली जिए एक और विजयादशमी सामने है और तैयार है दशानन अर्थात् दस सिरों वाले विशालकाय राक्षस राज रावण के बड़े-बड़े पुतले...इस बुराई के प्रतीक रावण के पुतलों के साथ नत्थी होंगे कुंभकर्ण और मेघनाद भी...मन मोहने वाले बालस्वरूप राम-लक्ष्मण द्वारा प्रतीकात्मक रूप से चलाए गए अग्निबाणों से रावण-कुंभकर्ण-मेघनाद का पुतला धूं-धूं कर जलने लगेगा और गूंजने लगेगी आतिशबाजी की आवाज व चौंधिया देने वाली सतरंगी रोशनी...इन सबके बीच जय-जय श्रीराम के नारों की गूंज के बीच बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक स्वरूप हर कोई गले और बधाई-शुभकामनाएं देता नजर आएगा...इस तरह से हम एक बार फिर प्रतीकात्मक रूप से बुराइयों को परास्त करने के दिशाभ्रम के साथ आगे बढ़ते चले जाएंगे...उन्हीं बुराइयों के मार्ग पर जो कभी रावण के अंत का कारण बनी थी...जरा ठहरें और विचार करें कि आखिर इस प्रतीकात्मक पुतला जलाने और भावों के मान से बुराई पर अच्छाई को विजय दिलाने वाले इस खेल में वास्तविकताएं कहां खड़ी हैं..?
क्या हम जाने-अनजाने और तमाम तरह की अनभिज्ञताओं के बीच बुराइयों के पहाड़ को इस तरह से निर्मित नहीं कर रहे हैं..,जिसको भविष्य में ध्वस्त करने के लिए हमें अनंत श्रीराम की आवश्यकता पड़ेगी...तब उसकी भरपाई क्या हमारे बीच में से ही मनुष्य रूप में कोई नया राम बनकर कर पाएगा..? अगर इसका हाँ में जवाब है तो ही हम दशानन के पुतलों को फूंकने के अधिकारी हैं...वरना हमें इस प्रथा पर पुन: विचार करना चाहिए कि आखिर हमारे परिवार, समाज, राष्ट्र और चौतरफा रूप से घर कर रही हर तरह की सामाजिक बुराइयों, दुराशक्तियों, पूरे तंत्र को खोखला कर रही भांति-भांति की व्याधियों और नासूर बन चुके भ्रष्टाचार, घृणित कृत्यों, घटनाक्रमों का संहार कौन और कैसे करेगा..? क्योंकि रावण मार्गी होना ही हर तरह की बुराई का कारण है...और इसे पुतला जलाकर खत्म नहीं किया जा सकता...ऐसी अनेक बुराइयां जो हमें रावण के पुतले के अंत के साथ ध्यान में आना चाहिए...सामाजिक स्तर पर ऐसी अनेक कुप्रथाएं या बेजा व्यवस्थाएं हैं, जिनको हम ढोने के आदी होकर केवल अपने समय-श्रम और धन की बर्बादी कर रहे हैं...सरकारी स्तर पर निर्णय लेने और काम न करने की अकर्मण्यता भी किसी लाइलाज बीमारी से कम नहीं है...क्या इस बुराई का दहन भी चरणबद्ध तरीके से संभव नहीं..? नीतिगत व नीयत के स्तर पर भी ऐसे कई विषय आते हैं, जो परिवार, कुटुंब, समाज, राष्ट्र, सरकार और शासन के लिए यक्ष प्रश्न बनकर रावणी अट्टहास करते नजर आते हैं...और हम हैं कि रावण का पुतला दहन करके बुराइयों के अंत का प्रपंच भर करते नजर आते हैं...
करीब दो दशक पहले आई चाइना गेट फिल्म में खलनायक मुकेश तिवारी का वह संवाद आज ही गूंज रहा है कि हमारे जैसा साहस तो जुटा लोगे..,लेकिन कमीनापन कहां से लाओगे..? संभवत: रावण की तमाम बुराइयों को जानकर, समझकर उसके पुतले को जलाने की प्रथा को तो हमने ऐसे ओढ़-बिछा लिया कि अब वह महानगरों, बड़े शहरों से निकलकर कस्बों-गांवों यहां तक कि गली-मोहल्लों में बड़े उत्साह के साथ जलाया जाता है...लेकिन इस बुराई को जलाने के नाम पर भी आयोजन में जो चंदाखोरी होती है..,क्या वह किसी रावणी प्रवृत्ति से कम है..? सही मायने में हमने रावण को आज तक समझा ही नहीं...उसे पहचाना भी नहीं..,तभी तो उसके कद की ऊंचाइयों या कहें उसका नियमों-सिद्धांतों-संकल्पों के प्रति प्रतिबद्धता को भी नजरअंदाज करते चले गए..!
रावण माँ जानकी के हरण के लिए बहरूपिया बना..,लेकिन तुरंत ही अपनी सच्चाई भी सीताहरण के साथ माँ जानकी के सामने प्रकट कर दी...आज के दौर में जो कुछ भी छीना-झपटी होती है, क्या उसमें इस रावण नीति-नीयत का अंशमात्र भी समावेश रहता है..? रावण ने नारी सुरक्षा का वैश्विक मापदंड रखा..,सीताजी को लंका के बजाय अशोक वाटिका में कैद किया...त्रिजटा जैसी स्वामी भक्त..,लेकिन नियमों में संकल्पित महिला पुलिस की वो मिसाल बनी...क्या आज पुलिस थानों तो छोड़ो, महिला थानों में त्रिजटा जैसे पात्र और चरित्र देखने-सुनने को मिलते हैं..? रावण का मार्ग हर तरह से बुरा था..,लेकिन उसका अंतिम समय तक बेटों-भाइयों, परिवार-पत्नी, कुटुंब, समाज सभी ने भय के कारण साथ तो दिया...लेकिन समय-समय पर उसे सलाह, समझाइश और सतर्क करने से कोई नहीं चूका...क्या आज ऐसे परिवार और परिजनों की जरूरत नहीं है, जो रावण मार्गी होने वालों को जागृत कर सके..? मेघनाद का पिता को सच बताना, सीताजी को लौटाकर श्रीराम के चरणों में जाने की सलाह देना.., विभीषण की राक्षस कुल को बचाने वाली नियम, संकल्प वाली नीति और कुंभकर्ण का भाई को नीति-अनीति की कड़वी घुट्टी पिलाने के बाद भी हर तरह के संकट में भाई के साथ खड़े रहने का उदाहरण वैश्विक और आत्मसात करने वाला नहीं है..?
मनुष्य रूप में श्रीराम और राक्षस राजा रावण ने अनेक मान्यताओं, विचारों को सत्य करने वाले पात्रों की भूमिका का निर्वाह किया...रावण जैसी वृत्ति अगर ना हुई होती तो वस्तुत: श्रीराम मानव रूप में अवतरित ही नहीं होते...हम सभी के भीतर श्रीराम विराजमान हैं..,तो कुछ अंशमात्र में हर किसी के अंदर रावण भी विद्यमान है...जब ये एक-दूसरे के खिलाफ मुखरित होते हैं और हमारा तन-मन-वचन-कर्म जैसे हावी होने देता है, उसी के रूप को हम प्रकट करते नजर आते हैं...अंतत: हमारी नियति भी वही हो जाती है...श्रीराम होने का अर्थ है धैर्य, सत्य, तप, ध्यान, लोकरक्षा, लोकमंगल, मर्यादा, अनुशासन और सबसे बड़ा नारी मात्र के सम्मान की रक्षार्थ खड़े होने..,जबकि रावण होने का अर्थ है कामवासना, मोह, लोभ, अज्ञान, अहंकार से स्वयं के समूल नाश का विधान रचना...क्योंकि काम, क्रोध, मद, मोह, माया और ईष्र्या एक साथ रावण के लिए भी षडरिपु साबित हुए...चोरी, झूठ, कपट और परपीड़ा में जब उसे आनंद आता तो उसका सर्वनाश निश्चित था...वह भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के हाथों...रावण को इस स्थिति में लाकर खड़ा करने के लिए उसके परिवार, कुटुंब के लोग भी उतने ही दोषी हैं..,जितना कि वह स्वयं...क्योंकि रावण को लगातार बचपन से ही उसकी माता कैकसी, नाना सुमाली, मामा प्रहस्त ने अनीति पर आगे बढ़कर वैभववान बनने, अहंकारी बनने, बलशाली बनने और परपीड़ा दे-देकर अट्टहास करने वाले के रूप में तैयार किया...यही सब उसके विनाश का कारण भी बनी...
समाज-राष्ट्र में व्याप्त रावणरूपी बुराइयों का अगर वर्ष-प्रतिवर्ष दहन करना है तो उसके लिए रावण के बड़े-बड़े पुतले जलाने से काम नहीं चलेगा...सही मायने में व्यक्ति को स्वयं के स्तर पर परिवार, कुटुंब, समाज और राष्ट्र के स्तर पर संस्कारों की एक ऐसी ज्योत जलानी होगी, जो व्यक्ति को गलत मार्गों से रोकने और बुराइयों से बचने का पाठ पढ़ा सके...इस संस्कारित करने वाली पाठशाला के लिए हमें शुरुआत परिवार प्रबोधन या कहें कुटुंब प्रबोधन से करनी होगी...जिस तरह से रा.स्व.संघ एक कुटुंब प्रबोधन अभियान के जरिए आमजन में संस्कारों, धर्म के प्रति समर्पण और विचारों-कार्यों के प्रति शुद्धता की सीख देता है, वैसे ही घर से ही सत्य के मार्ग और बुराई के खिलाफ आवाज उठाने के गुणों का विकास करना होगा...परिवार प्रबोधन और संस्कारों की पाठशाला ही व्यक्ति को रावण मार्गी होने से बचा सकती है...इसी से राज व्यवस्था, प्रशासनिक तंत्र एवं नीतिगत रूप से लिए जाने वाले गलत निर्णयों पर भी अंकुश लगेगा...यानी बुराई के प्रतीक को जलाने के साथ व्यक्ति के अंदर घर कर गई बुराइयां भी खाक होना चाहिए...