सत्-चित्-आनंद का बोध ही ब्रह्म की अनुभूति
   Date22-Oct-2020

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धर्मधारा
ए क छोटे से बीज में एक विशाल वटवृक्ष समाया हुआ होता है। वह छोटा सा बीज ही एक विशाल वटवृक्ष को धारण किए रहता है, पर उस छोटे से बीज से वह विराट वृक्ष तभी प्रकट होता है, जब उस बीज को अनुकूल जमीन में, भूमि में बोया जाता है, रखा जाता है। अनुकूल जलवायु पाते ही वही बीज अंकुरित होता है और देखते ही देखते एक विशाल वृक्ष के रूप में खड़ा हो जाता है, प्रकट हो जाता है।
उसी प्रकार हर जीव में ब्रह्म का बीज है, ब्रह्म का अंश है और जप, तप, योग, ध्यान, ज्ञान की उर्वर भूमि-अनुकूल जलवायु पाते ही वहीं जीव-नर से नारायण व मानव से माधव बनने के उच्चतम शिखर तक पहुंच जाता है। उस शिखर को पाकर ही, छूकर ही जीव को शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है। ब्रह्म को पाकर ही जीव को ब्रह्मानंद की अनुभूति होती है। ब्रह्म को पाकर ही जीव को ब्रह्मानंद की अनुभूति होती है। ब्रह्म को वेदों ने 'रसो वै स:Ó कहा है अर्थात् ईश्वर या ब्रह्म, रस यानी आनंद का स्वरूप है। ईश्वर सुख का सागर है और इसी सुख के सागर से हमारी उत्पत्ति हुई है, जिस वस्तु की जहां से उत्पत्ति होती है, उसे पाकर, उससे मिलकर, उस उद्गम स्थल को पाकर छूकर, मिलकर, उसे अपार सुख का अनुभव होता है। दीपक की लौ में जो अग्नि है, जो प्रकाश है वह सूरज का ही अंश है।