ज्ञान की गहराई
   Date21-Oct-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
भ गवान बुद्ध एक बार आनंद के साथ एक सघन वन में से होकर गुजर रहे थे। रास्ते में ज्ञानचर्चा भी चल रही थी। आनंद ने पूछा - 'देव! आप तो ज्ञान के भंडार हैं। आपने जो जाना, क्या आपने वह सब हमें बता दिया?Ó बुद्ध ने उलटकर पूछा- 'इस जंगल में भूमि पर कितने सूखे पत्ते पड़े होंगे?Ó फिर हम जिस वृक्ष के नीचे खड़े हैं, उस पर चिपके सूखे पत्तों की संख्या कितनी होगी? इसके बाद अपने पैरोंतले जो अभी पड़े हैं, वे कितने हो सकते हैं? आनंद इन प्रश्नों का उत्तर देने की स्थिति में नहीं थे। मौन तोड़ते हुए तथागत ने स्वयं ही कहा - 'ज्ञान का विस्तार इतना है, जितना इस वन प्रदेश में बिछे हुए सूखे पत्तों का परिवार। मैंने इतना जाना, जितना ऊपर वाले वृक्ष का पतझड़। इसमें भी तुम लोगों को इतना ही बताया जा सका, जितना कि अपने पैरों के नीचे कुछेक पत्तों का समूह पड़ा है।Ó वास्तव में ज्ञान का समुद्र अत्यंत विशाल है। उसकी थाह कोई ले नहीं सकता। यह मान बैठना कि थोड़े ही प्रयासों से ज्ञानार्जन हो सकेगा, एक आत्मप्रवंचना भर है, किन्तु प्रयास इसी दिशा में होते रहना चाहिए।