संबंधों की सिकुडऩ का कारक बदलती जीवन पद्धति
   Date21-Oct-2020

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ववेक सिंह
जी वन पद्धति के बदलने से जीवन बदल गया है, संबंध बदल रहे हैं। जीवन से जीवंतता और संबंधों से मधुरता मानो खो सी गई है। तनाव, अवसाद, अनिद्रा और दिल की बीमारियों की मुख्य वजह बदलती जीवन पद्धति है। खाने, सोने का समय बदल गया है। पाश्चात्य संस्कृति भारतीय संस्कृति पर हावी ही चुकी है। आज ना किसी के पास कुछ कहने की फुर्सत है और ना ही किसी के पास कुछ सुनने की फुर्सत। जीवन को बस कैसे भी व्यतीत करने की जद्दोजहद चल रही है। आज कितने अभागे लोग ऐसे हैं, जिन्होंने जीवन में कभी भोर नहीं देखा, उगते सूर्य की लालिमा नहीं निहार सके, ढलते हुए सूरज की विहंगम सूर्य रश्मियों का दृश्य अपने आंखों में नहीं समेट सके। उनको नहीं पता पूर्णिमा के चांद की चांदनी कैसी होती है, अमावस्या का अंधेरा कैसा दिखता है, तारों का टिमटिमाना क्या होता है? दादी और नानी की लंबी कहानी क्या होती है? यकीन मानिए उन्होंने कुछ नहीं देखा। उन्होंने अर्थ तो कमा लिया, लेकिन सब अर्थ का अनर्थ हो गया। उन्होंने बहुत कुछ खो दिया। आज की भाषा में कहा जाए तो 'बहुत मिस कर दियाÓ।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) का अपने तरह का इकलौता सर्वे टाइम यूज़ सर्वे जनवरी 2019 से दिसम्बर 2019 के बीच किया गया। इस सर्वे में यह जानने का प्रयास किया गया कि भारतीय 24 घंटे में कितना समय विभिन्न कार्यों जैसे खाने-पीने, सोने, धार्मिक, पारिवारिक और सामाजिक कार्यों के लिए देते हैं। टाइम यूज सर्वे में 5947 गांवों और 3998 शहरी क्षेत्रों को शामिल किया गया था। ग्रामीण क्षेत्र के 82,997 घरों को जबकि शहरी क्षेत्र के 55,902 घरों को इस सर्वे के लिए सम्मिलित किया गया। 6 से अधिक उम्र के 4,47,250 लोगों को इस सर्वे में सम्मिलित करके उनकी राय ली गई, जिसमें 2,73,195 ग्रामीण और 1,74,055 शहरी लोग शामिल थे। अंडमान और निकोबार को छोड़कर देश के सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को इस सर्वे में शामिल किया गया था।
सोने के लिए भारतीय महिलाएं ज्यादा लेती हैं समय: ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष 24 घंटे में औसतन 554 मिनट, जबकि महिलाएं 557 मिनट सोने के लिए खर्च करते हैं। शहरी क्षेत्रों में पुरुष 534 मिनट, जबकि महिलाएं 552 मिनट सोने में व्यतीत करते हैं।
खाने-पीने में पुरुष लेते हैं अधिक समय : खाने-पीने के लिए ग्रामीण पुरुषों को औसतन 103 मिनट लगते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र के महिलाएं 24 घंटे में 94 मिनट खाने-पीने के लिए देती हैं। शहरी क्षेत्र में खाने-पीने के लिए पुरुष 101 मिनट और महिलाएं 97 मिनट का समय देती हैं।
घरेलू कार्यों के लिए महिलाएं देती हैं 3 गुना अधिक समय : बिना किसी पारिश्रमिक के घरेलू कार्यों के लिए ग्रामीण महिलाओं को 301 मिनट देने पड़ते हैं, जबकि शहरी महिलाएं 293 मिनट का समय देती हैं। जहां तक घरेलू कार्य के लिए पुरुषों का संबंध है, शहरी पुरुष 94 मिनट, जबकि ग्रामीण पुरुष 98 मिनट घरेलू कार्य के लिए समय देते हैं।
पुरुषों के मुकाबले महिलाएं पारिवारिक सदस्यों की देखभाल में देती हैं दोगुना समय : पारिवारिक सदस्यों की देखभाल करने के लिए ग्रामीण महिलाएं 132 मिनट, जबकि ग्रामीण पुरुष 77 मिनट का समय देते हैं। शहर में रहने वाले पुरुष 75 मिनट, जबकि शहर की महिलाएं 138 मिनट पारिवारिक सदस्यों की देखभाल के लिए देती हैं।
स्वकेंद्रित मानसिकता : सर्वे के अनुसार 1 दिन में एक भारतीय औसतन 726 मिनट अपनी देखभाल पर खर्च करता है। मजेदार बात यह है कि ग्रामीण पुरुष 737 मिनट अपनी देखभाल के लिए खर्च करता है। यहां देखभाल से आशय खाना-पीना, सोना और सेहत पर ध्यान से है।
पुरुषों को रोजगार संबंधित कार्यों पर देना पड़ता है अधिक समय : रोजगार से जुड़े कार्यों पर एक भारतीय औसतन 429 मिनट देता है। शहर के लोगों को 485 मिनट अपने रोजगार से जुड़े कार्यों पर समय देना पड़ता है। शहरी पुरुष 514 मिनट रोजगार से जुड़े कार्यों पर देते हैं, जबकि शहरी महिलाएं 375 मिनट इस कार्य के लिए देती हैं। ग्रामीण पुरुष रोजगार से जुड़े कार्यों पर 334 मिनट, जबकि ग्रामीण महिलाएं 317 मिनट का समय 24 घंटे में देती हैं।
प्रत्येक भारतीय औसत रूप से खेल, संस्कृति पर दिन में 165 मिनट का समय देते हैं। प्रत्येक देशवासी औसतन सामाजिक कार्यों, ईमेल चैट से आपस में बातचीत एवं धार्मिक गतिविधियों में 143 मिनट का समय देता है। इस सर्वे से यह तो स्पष्ट हो गया कि हमारी जीवनशैली बिलकुल बदल गई है। हम खाने, सोने, सोशल मीडिया, रोजगार या व्यवसाय के अलावा कुछ ना सोचते हैं और ना ही समझते हैं। हमारे पास अपनों के लिए समय नहीं है, रिश्तों के लिए समय नहीं है। 24 घंटे में 737 मिनट एक भारतीय बस अपने लिए दे रहा है। बच्चों, बुजुर्गों, मित्रों और रिश्तेदारों के लिए समय नहीं है। हम आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं। सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यों के लिए हम मानो पैदा ही नहीं हुए हैं। हम बिना कुछ किए महान बनना चाहते हैं।
ऐसे सर्वे कुछ अंतराल पर अवश्य होते रहने चाहिए ताकि हमारी जीवनशैली सुधर सके। हम भोग के बजाय योग पर ध्यान करें। हम अपनों के साथ ही साथ गैरों पर भी ध्यान दें। हम स्टेटस के साथ ही साथ जीवन को भी ऊंचा उठा सकें। हम जीवन जीने के लिए अर्थोपार्जन के साथ ही साथ अपने समाज, संस्कृति और धर्म के बारे में भी चिंतन-मनन कर सकें। हम आज के दौर के आवश्यक कार्यों को करने के साथ ही साथ कुछ अनावश्यक कार्य भी कर सकें, जैसे बुजुर्गों की सेवा, गायों की सेवा, बागवानी, मंदिरों में सेवा, परमार्थ, कीर्तन, प्रवचन सुनना, धार्मिक ग्रंथों पर चर्चा। भोर देखना, सूर्योदय और सूर्यास्त देखना, विशाल आकाश में जुगनू रूपी तारों को टिमटिमाते देखना, चंद्र कलाएं देखना ताकि पता लगे कि तृतीया, पंचमी और पूर्णिमा का चांद कैसा होता है। उगते और डूबते सूर्य की लालिमा कैसे अलग होती है। उम्मीद है कि इस वर्ष 2020 के कोरोना काल में लोगों की दिनचर्या कुछ ना कुछ जरूर बदली होगी। (लेखक- स्तंभकार, विचारक एवं आर्थिक विश्लेषक हैं)