विवेक और वैराग्य श्रेष्ठतम साधना
   Date21-Oct-2020

dharmdhara_1  H
धर्मधारा
सं सार में रहकर व्यक्ति जिन चीजों का उपभोग करता है, उनकी एक कीमत है। इसलिए सांसारिक सुखभोग के अनुरूप व्यक्ति का उतना ही पुण्य, उतना ही तप क्षीण हो जाता है, कट जाता है। इतना सुख आपने भोगा, आपका उतना पुण्य इसमें खप गया। संसार में प्रकृति की, परमात्मा की कम्प्यूटराइज्ड व्यवस्था है। हम जो कर्म करते हैं, अच्छा-बुरा, श्रेष्ठ-निकृष्ट जो भी करते हैं, वो उस कम्प्यूटराइज्ड व्यवस्था के तहत नोट हो जाता है, क्योंकि आपने तो कर्म किया, भले ही कैसी भी परिस्थितियों में किया, किन परिस्थितियों में किया, यह माने नहीं रखता और उस कर्म के अनुरूप कर्मफल विधान हम पर अनिवार्य रूप से लग जाता है।
परिस्थितियां माने नहीं रखतीं, कर्म माने रखता है और कर्म चाहे कोई भी करे, उसका फल उसे भुगतना पड़ता है। ऐसा नहीं कि परमेश्वर आकर स्वयं कर्म करें तो वो बच जाएंगे। नहीं, बचेगा कोई नहीं। कर्म का विधान अनिवार्य है और इसे कौन नोट करता है? इसका लेखा-जोखा कौन रखता है? इसका लेखा-जोखा प्रकृति रखती है। इसका लेखा-जोखा प्रकृति की व्यवस्था रखती है। यहां पर कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता।
ज्ञानीजन जानते हैं कि इस संसार की वास्तविक पूंजी क्या है? इस संसार में वास्तव में कौन धनवान है? स्थूलदृष्टि से जिसके पास बैंक में बहुत पैसा है, वो धनवान है, लेकिन प्रकृति की नजरों में धनवान वो है, जिसके पास पुण्य है, जिसके पास तप है। जो समझदार व्यक्ति है, वे अपने पुण्य का उपयोग, तप का उपयोग लोकसंग्रह में, लोकसेवा में करते हैं, सुख-भोग में नहीं करते। इंद्रियों की तृप्ति में नहीं करते।
हम समझते हैं कि त्याग में हम गँवाते हैं। नहीं, त्याग में हम पाते हैं। आध्यात्मिक जीवन की उपलब्धि त्याग है। इसलिए उच्चतम साधना, श्रेष्ठतम साधना व श्रेष्ठतम अनुशासन जिनको कहते हैं- वो विवेक और वैराग्य हैं। विवेक और वैराग्य क्यों है? क्योंकि विवेक और वैराग्य जितना दृढ़़ होते हैं, उतना हमारा व्यक्तित्व स्थिर और शांत होता है। इससे हमारे तन और मन में स्थिरता आती है।