दंड का दैवीय: विधान
   Date20-Oct-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
ह र अहंकारी, लोभी, लालची को भगवत्सत्ता के दैवी विधान से नियमानुसार फल मिलता ही है एवं अन्यों के लिए वह सबक बनता है। अहंकारी, शक्तिशाली, गर्व से चूर दुर्योधन जब अपनी अनीतियों से बाज नहीं आया तो उसे अपनी ही आँखों से अपना सर्वस्व नष्ट-भ्रष्ट होते देखना पड़ा और बड़ी असहाय अवस्था में शरीर छोडऩा पड़ा। महाबली रावण का दर्प-अहंकार उस समय नष्ट हो गया, जब उसका सारा वैभव नष्ट हो गया और वह असहाय घायल अवस्था में रणभूमि में पड़ा था, जिसने बड़े-बड़े देशों पर विजय पाकर उन्हें बंदी बना छोड़ा था, उसे दो अवतारी क्षत्रिय पुत्रों ने कुलसहित नष्ट कर दिया। विश्वविजयी सिकंदर महान अपनी अपार संपत्ति के होते हुए भी छटपटाता हुआ मरा और उसे कोई न बचा सका। उसका दर्प-अहंकार मिट्टी में मिल गया। दुनिया की खुली पुस्तक में दैवी विधान की इस सुधार-प्रक्रिया का पाठ सरलता से पढ़ा जा सकता है।