भारतीय राजनीति के अभिशापों को ढोता बिहार
   Date20-Oct-2020

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प्रणय कुमार
बि हार की राजनीति को जितना समझने का प्रयास किया जाए, उतना ही उसका सिरा हाथों से छूट जाता है। आम बिहारी राजनीति में गहरी रुचि रखता है। बिहार के चौक-चौराहों-चौपालों पर होने वाली परिचर्चाओं का सामान्य विषय देश-दुनिया की प्रमुख राजनीतिक गतिविधियाँ ही होती हैं। उन परिचर्चाओं में अपने अजब-गज़ब तर्कों से लोग सामने वाले को हतप्रभ करने की कला में माहिर होते हैं। बिहारी स्वाभावत: विद्रोही होता है। लीक छोड़कर चलना उसकी फि़तरत होती है। प्राय: बिहारी मुखर होते हैं। उनका प्रेम और उनकी घृणा दोनों मुखर होती है। कहा जाता है कि बिहारी परिवर्तन के वाहक होते हैं, पर विडंबना यह है कि हर परिवर्तन सुंदर-सुखद नहीं होता। और हर नारा और दावा हक़ीक़त नहीं। जिस बिहार ने मगध का उत्कर्ष देखा, जो बिहार बुद्ध-महावीर-चाणक्य की कर्मस्थली रहा, जिसने चंद्रगुप्त और अशोक जैसे शासकों को रचा-गढ़ा, जो स्वातंत्र्य-आंदोलन में गाँधी के उदय की पूर्व-पीठिका बना, जो आपातकाल थोपे जाने के विरुद्ध छेड़े गए संपूर्ण क्रांति का सशक्त संवाहक और सूत्रधार बना, उसी बिहार ने लालटेन का अपराध और अंधकार-युग भी झेला। कहा जा सकता है कि स्वातंत्र्योत्तर बिहार राजनीति के अभिशापों का शिकार अधिक रहा। गऱीबी, हिंसा, अपहरण, अपराध, अराजकता, बेरोजग़ारी, भदेसपन, मसखरापन ही बिहारियों की पहचान बना दी गई और भोले-भाले, मेहनतकश बिहारी उसी पहचान को अपना भाग्य मान अपनाते चले गए। जो उस पहचान से असहमत थे या स्वयं को उसमें मिसफि़ट पा रहे थे, उन्होंने पलायन को सुअवसर मान किनारा कर लिया। भारतीय राजनीति विचारधारा से अधिक चेहरों पर केंद्रित होती है। बिहार ने भी राजनीति के कई चेहरों को माँजा-चमकाया। चेहरे तो चमके, खूब चमके, मय परिवार चमके, पर बिहार अपनी चमक खोता चला गया। ऐसे चेहरों में सबसे बड़ा चेहरा लालू यादव का रहा। आज भले लालू का तिलिस्म टूट रहा हो, पर एक दौर में उनका जादू लोगों के सर चढ़कर बोलता था। जहाँ अपने समर्थकों के लिए वे सामाजिक न्याय के अग्रदूत और गरीबों के मसीहा थे, वहीं विरोधियों के लिए वे राजनीति के कलंक और अंधकार युग के जनक और प्रवर्तक रहे। एक साथ इतना धुर समर्थन और इतना धुर विरोध शायद ही किसी अन्य राजनीतिज्ञ को झेलना पड़ा हो। जो बिहार कभी अपनी समृद्ध विरासत, गौरवशाली अतीत और अधुनातन बौद्धिकता के अग्रदूत के रूप में जाना-पहचाना जाता रहा, उसे लालू ने अपने अलहदा अंदाज़, अनगढ़ मुहावरे और नित नवीन मसखरेबाजी से न केवल भिन्न एवं परंपरा से इतर पहचान दिलाई, बल्कि संपूर्ण देश में 'बिहारियोंÓ को भी इस नई पहचान का पर्याय बना डाला। जिन्हें इस पहचान से आपत्ति थी, उनके लिए 'बिहारीÓ होना धीरे-धीरे शर्म और 'उपहासÓ का विषय बनता चला गया। एक ऐसा भी दौर आया, जब यह संबोधन पिछड़ेपन एवं जाहिलता के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा, जिसके दबाव में रोजी-रोटी की तलाश में राज्य से बाहर आए मार-तमाम लोग आनन-फानन में दिल्ली-हरियाणा शैली की हिंदी बोल अपनी 'बिहारीÓ पहचान को छुपाने की असफल चेष्टा करने लगे। आज यह जानना आवश्यक है कि लालू-राज के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष परिणाम क्या-क्या हुए, उसका तत्कालीन एवं परवर्ती सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रभाव कैसा रहा?
बिहार मुख्यत: अपनी बौद्धिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक सक्रियता एवं सजगता के लिए जाना जाता रहा है, परंतु यह वह दौर था, जब जातीय घृणा की फसल को भरपूर बोया गया, खाद-पानी देकर बड़ा किया गया और उसे बार-बार काटा गया; यह वह दौर था, जब विकास का पहिया प्रतिगामी गति से घुमाया गया। जो बिहार को जानते-देखते रहे हैं, उन्हें अच्छी तरह याद होगा कि तब लोग सूर्यास्त होते ही अपने-अपने घरों में दुबककर बैठे रहना पसंद करते थे, अंधेरा होते-होते दुकानों के शटर गिरने लगते थे, थोड़ी भी देर होने पर परिजनों के चेहरों पर चिंता की लकीरें खिंचने लगती थीं, अपहरण कुटीर उद्योगों की तरह बिहार के शहर-शहर, गली-गली में विस्तार पाने लगा था, जब स्टेशनों, बस अड्डों, चौक-चौराहों, घरों-दफ़्तरों-दुकानों में देश-दुनिया की चर्चा की बजाय किसी-न-किसी उभरते रंगबाज़, गैंगस्टर, क्रिमिनल की चर्चा होती थी और सबसे ख़तरनाक स्थिति यह थी कि बड़े होते बच्चे किसी सुंदर-सलोने-स्वस्थ सपनों को सँजोने, कुछ मानवीय, कुछ बेहतर करने के बजाय एक रंगबाज़, गैंगस्टर या अपराधी बनने का सपना पालने लगे थे। किसी समाज के पतन की यह पराकाष्ठा होती है कि वह अपराधियों में नायकत्व की छवि देखने और तलाशने लगे। उस दौर में सभी जातियों के अपने-अपने अपराधी-नायक थे, समाज उन अपराधियों के पीछे बँटता और लामबंद होता चला जा रहा था। लोगों को लालू यादव में भी एक नेता की कम, एक दबंग जातीय सरगना की छवि अधिक दिखाई देती थी। लालू भी 'भूरा बाल साफ करोÓ जैसे नारे उछाल भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला (कायस्थ) जैसी जातियों पर सीधे हमला बोल रहे थे। उनके स्वजातीय दबंगों एवं अपराधी प्रवृत्ति को लगने लगा था कि इन जातियों को प्रताडि़त कर वे सूबे के मुख्यमंत्री के कृपा-पात्र बन जाएंगे। नेता और अपराधी का भेद मिटने लगा था।
संस्थाओं का जातीयकरण होता गया और जातिवाद की आड़ में भ्रष्टाचार को एक संस्कृति बना दी गई। भिन्न जाति वालों से विशेष वसूली को सामाजिक न्याय का ज़ामा पहनाकर महिमामंडित किया जाता रहा। कोढ़ में खाज का काम इस वामपंथी नैरेटिव ने किया कि जिनके पास पैसा और ज़मीन है, वे लूटे-ख़सूटे जाने लायक ही हैं। भ्रष्टाचार और जातीयता एक-दूसरे के पर्याय बन गए और उनका संस्थानीकरण होता चला गया। भ्रष्टाचार एक नियामक और मान्य सत्ता बनती गई और गरीबों के मसीहा व उनके स्वजातीय अनुयायी एक नवीन-उदीयमान शोषक सत्ता के रूप में रूपांतरित व स्थापित होते चले गए। जिसका परिणाम यह हुआ कि उद्योग-धंधे बंद होते चले गए, बड़े व्यापारी राज्य छोड़कर अन्यत्र चले गए, सक्षम-प्रतिभाशाली लोग पलायन कर गए और जो बचे, वे या तो छोटे-मंझोले कृषक या श्रमिक समाज से थे। कालांतर में रोज़ी-रोटी के लिए बड़ी संख्या में उन मजदूरों का भी बिहार से पलायन हुआ। होते-होते एक दिन ऐसा भी आया कि यादवों और मुस्लिमों (भाजपा विरोध की हठधर्मिता के कारण) को छोड़कर बिहार की सभी जातियों का उनसे मोहभंग हो गया। और लालू का सामाजिक न्याय जाति से होता हुआ अंतत: परिवार तक सिमटकर रह गया।
अचरज नहीं कि जैसे हर युग का अवसान होता है, सो लालू-युग का भी अवसान हुआ। काठ की हांडी जैसे बार-बार नहीं चढ़ाई जा सकती, वैसे जातिवाद की राजनीति भी हमेशा सत्ता नहीं दिलाती। यादव और मुस्लिम समाज में मज़बूत पैठ बनाने के बावजूद लालूजी को अपदस्थ होना पड़ा। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एक नई सरकार बनी, जिसके पहले कार्यकाल में बहुत-से अच्छे काम हुए, उम्मीद जगी, उन पर विश्वास भी बढ़ता गया। संगठित अपराध पर लगाम लगा। उद्योग की तरह पनपा अपहरण बिहार के लिए बीते दिनों की बात हो गई। सड़क एवं यातायात व्यवस्था में आमूलचूल सुधार हुआ। उनका दूसरा कार्यकाल औसत रहा। उनके तीसरे कार्यकाल का पहला वर्ष गठबंधन की बेमेल राजनीति की भेंट चढ़ गया। और शेष वर्षों में भी सरकार के प्रदर्शन ने प्रभावित करने के स्थान पर निराश ही अधिक किया। हाँ, यह अवश्य है कि गठबंधन का घटक होने के नाते केंद्र की नीतियों, कल्याणकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों का लाभ स्वाभाविक रूप से बिहार के सत्तारूढ़ दल को भी मिलेगा। मुख्यतया सड़क, बिजली, पानी पर केंद्र सरकार द्वारा किए गए कार्य का सीधा लाभ नीतीश कुमार को मिलता रहा है और इस बार भी मिलेगा। जिस मोदी को रोकने के लिए कभी नीतीश ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया था, आज वही उनके चुनावी रथ को विजय की ओर ले जाने वाले मुख्य सारथी हैं। जहाँ तक बिहार भाजपा की बात है तो उसे लेकर बिहार की जनता में एक सकारात्मकता रही है, पर नीतीश के चेहरे को सामने रखने के कारण लालू दौर में जुझारू एवं जीवट नेता के रूप में उभरे सुशील मोदी सत्ता का हिस्सेदार बनने के बाद लगातार अपनी चमक खोते जा रहे हैं। वे स्वयं भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के छोटे भाई के रूप में ही स्वयं को स्थापित करते नजऱ आते हैं। जाति को ही जनाधार का पर्याय मानने वाले बिहार में उनकी जाति भी उनकी सीमाएँ तय कर देती हैं। भाजपा अब तक बिहार में मुख्यमंत्री का चेहरा गढऩे व देने में विफल रही है और कदाचित उसे भी इसका भली-भाँति एहसास है।
(लेखक विभिन्न विषयों पर स्वतंत्र रूप से लिखते हैं)