साधना की सफलता का अर्थ है सिद्धि
   Date20-Oct-2020

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धर्मधारा
सा धना-पथ पर चल रहे साधकों के मन में साधना में सफलता को लेकर अगणित शंकाएँ, आशंकाएँ जन्म लेती हैं। अकसर हमें लगता है कि हमें साधना करते कितने वर्ष बीत गए, पर अब तक हमें कोई ऊँची उपलब्धि हासिल न हो सकी। हमने अपने जीवन में कई अनुष्ठान किए, तीर्थयात्राएँ की, शास्त्रों का स्वाध्याय किया, पर फिर भी हमें कोई यथोचित लाभ प्राप्त क्यों नहीं हुआ? हमने सद्गुरु से दीक्षा ली, फिर भी हमारी साधना सफल क्यों नहीं हो सकी आदि प्रश्न अकसर हमारे मन में उठते हैं। इसी उधेड़बुन, दुविधा और द्वंद्व में कई लोग साधना से ही मुँह मोड़ लेते हैं। बीच में ही साधना-पथ का परित्याग कर देते हैं। सच तो यह है कि साधना यदि सचमुच सही दिशा में हो, और साधना से जुड़े नियम-अनुशासन एवं संयम आदि का यथोचित पालन किया जाए तो साधना में सफलता न मिलने की दूर-दूर तक कोई संभावना ही नहीं है। साधना में सफलता शत-प्रतिशत सुनिश्चित है, पर समस्या तब आती है, जब हम साधना को, अध्यात्म को कर्मकांडीय क्रियाभर मान लेते हैं।
साधना के स्थूलपक्ष पर तो हमारा ध्यान होता है, माला, जप, हवन, पूजा आदि क्रियाएँ हम करते तो हैं, पर उन क्रियाओं के वास्तविक दर्शन, तत्वदर्शन की हम अकसर उपेक्षा ही करते हैं। परिणामस्वरूप ये सारी क्रियाएँ बौद्धिक क्रियाएँ मात्र बनकर रह जाती हैं। इसी कारण हमारी भावनाएँ इनसे अछूती ही रह जाती हैं। हमारी भावनाएँ परिष्कृत नहीं हो पातीं और हमारी आत्मा आह्लादित नहीं हो पाती। हमें अपने अंतस् में आत्मा के रूप में विराजमान परमात्मा की अनुभूति नहीं हो पाती। उनका कृपाप्रसाद हमें नहीं मिल पाता। मिले भी तो कैसे? क्योंकि साधना में सफलता का सीधा अर्थ हम अकसर यही मानते हैं कि हमारी भौतिक प्रगति और अधिक हुई या नहीं।