...तो सर्दियों में कोरोना फिर करेगा अट्टहास..!
   Date18-Oct-2020

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
वै श्विक महामारी कोरोना का मौसम एवं भौगोलिक मापदंड के अनुसार संक्रमण की तासीर लगातार बदल रही है... जिन ठंडे प्रदेशों में कोरोना कड़ाके की सर्दी के बीच कोहराम मचा रहा था, वहां पर सर्दी के सामान्य होने पर भी स्थिति पुन: पूर्व वाली बनने लगी है... भारत में जहां गर्मी में इसके खत्म होने की संभावनाएं व्यक्त की जा रही थी, उसी दौर में कोरोना ने विकटपूर्ण स्थिति निर्मित कर दी... कहने का तात्पर्य यह है कि बार-बार अपना स्वरूप बदल रहा कोरोना बिना टीके (वैक्सीन) के काबू होने वाला नहीं है... क्योंकि जिस चीन से कोरोना निकला, वहां पर भी इसकी पूर्ण समाप्ति व तालाबंदी खोले जाने के बाद सैकड़ों में मामले पुन: सामने आने लगे हैं... फ्रांस में आपातकाल लगाने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं... अमेरिका में सरकार ने लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया है... ऐसी स्थिति में भारत में आने वाला समय कोरोना के मान से कोहराम मचाने वाला होगा... या कुछ स्थितियां नियंत्रण में होती चली जाएंगी, इसको लेकर जानकारों, विशेषज्ञों के अपने-अपने मत व तर्क भी हैं... इसलिए कोरोना का भय जितना गर्मी में था, उससे कहीं ज्यादा सर्दी में अभी से जान पड़ रहा है... यह सरकार से ज्यादा जनता के हाथों में है कि वे कोरोना को सर्दी में अट्टहास करने का मौका देना चाहती है या नहीं..? क्योंकि उसका रास्ता हमारी वर्तमान की लापरवाहियों से बनता चला जाएगा...
कोरोना को लेकर अभी लड़ाई बहुत लंबी है, इस बात को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गंभीरता से समझा है... तभी तो उन्होंने 8 अक्टूबर को कोरोना के खिलाफ नए जनांदोलन की शुरुआत करते हुए नारा दिया 'जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहींÓ यानी कोरोना टीका (वैक्सीन) आने तक मास्क का उपयोग, दो गज की दूरी है जरूरी जैसी बातें फिलहाल अंतिम उपाय के रूप में जनता के सामने रखी हैं... अब यह सरकार के साथ ही समाज के लिए भी चिंता का विषय है कि वे इस जन आंदोलन को किस तरह से कोरोना के खिलाफ एक निर्णायक लड़ाई में परिवर्तित करने में सफल होते हैं..? इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि अगर अभी स्थितियां नहीं संभाली गई और अनलॉक-5 के तहत मिली छूट को अपनी लापरवाहियों का हिस्सा बना लिया, तब स्थिति नियंत्रण से बाहर होना तय है... सरकार की मजबूरी समझी जा सकती है कि वह तालाबंदी लंबे समय तक जारी रखकर गर्त में जा चुकी अर्थव्यवस्था का अवसान नहीं कर सकती... इसलिए कोरोना संकट से लड़़ते हुए, सतर्कता बरतते हुए जो उपाय किए जा सकते हैं, उसमें सरकार के साथ समाज के प्रत्येक अंग को अपनी जवाबदेही का निर्वाह करना होगा... तभी स्थिति सुधरेगी...
भारत के संदर्भ में कोरोना की स्थिति का आंकलन करें तो यह तथ्य तेजी से उभरकर सामने आ रहा है कि हमने बिना टीके के भी कोरोना को पस्त करने या कहें नियंत्रित करने में सफलता पाई है... शनिवार, 17 अक्टूबर तक देश में करीब 75 लाख कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा सामने आ चुका है.., लेकिन इसमें भी राहत वाला पक्ष यह है कि 6525042 लोग कोरोना को मात देकर घर पहुंच चुके हैं... 113042 लोगों ने जान गंवाई है.., जबकि संक्रमित लोगों का आंकड़ा भी तेजी से कम हो रहा है... गत सप्ताह 10 लाख से ऊपर रही यह संख्या अब 7 लाख के करीब आ चुकी है... यानी प्रत्येक पहलुओं से हम कोरोना को हराने में सफल हो रहे हैं... आज की तारीख में कोरोना के 18 फीसदी से अधिक मरीज कम हुए हैं.., जबकि इसकी औसत संक्रमण संख्या में भी 19 फीसदी की गिरावट आई है...
भारत में लोगों की मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) ने टीके के पूर्व ही कोरोना के सामने एक बड़ी दीवार खड़ी करने में सफलता पाई... लेकिन अभी भी भारत में हर्ड इम्युनिटी नहीं बन पाई है... क्योंकि फिलहाल 3, 5, 7 या 10 प्रतिशत एंटीबॉडीज का ही अनुपात सामने आ रहा है... हर्ड इम्युनिटी के लिए यह स्तर 70 से 75 फीसदी तक आना चाहिए... यह स्थिति विश्व में कहीं नहीं है... लेकिन इन सब में भी भारत सबसे ऊपर है... इसलिए ऐसा दावा किया जा सकता है कि टीका आने के पूर्व ही हम कोरोना को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकते हैं... अगर तात्कालिक लापरवाहियों पर सामाजिक स्तर पर लगाम लगा दी जाए... सरकार ने अनलॉक -5 के तहत बाजार, सिनेमा घर, बगीचे, पर्यटक स्थल एवं धार्मिक स्थलों के साथ ही स्कूल खोलने की कुछ शर्तों के साथ अनुमति इसीलिए दी, ताकि अर्थव्यवस्था को भी गति मिल सके और जनता कोरोना के साथ किस तरह से लंबी लड़ाई लडऩा है, इसकी तैयारी करके आगे बढ़े... क्योंकि टीका आने या किसी शहर-कस्बे में पूर्णत: टीकाकरण होने के बाद भी मास्क तो छह माह तक लगाना ही होगा... ठीक इसी तरह से शारीरिक दूरी का भी पालन करना होगा... फिर नियमित रूप से हाथ धोने एवं हर तरह की सतर्कता बरतकर अपनी इम्युनिटी को मजबूत करते रहना होगा... तभी बात बनेगी...
कोरोना को लेकर कुछ गफलतें सरकार की तरफ से लगातार हुई हैं... जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता... जब तालाबंदी का प्रारंभिक चरण था, तब मजदूरों-श्रमिकों का पलायन इस कोरोना महामारी को बड़े-बड़े महानगरों, शहरों से गांव-कस्बों तक फैलाने की कड़ी बना... अब जब ऐसा अनुमान विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त किया जा रहा था कि भारत में कोरोना नियंत्रित हो रहा है, तब अर्थव्यवस्था को गति देने की मजबूरी में सरकार ने बाजार से लेकर चुनावी चौपाल तक के लिए जो भीड़ जुटाने की खुली छूट दी, वह भी अनेक सवाल खड़े कर रही है... अब संक्रमण शहरों से गांवों, शहरी कस्बों में तेजी से फैल रहा है... गाँव-देहात, वनवासी अंचलों में संक्रमण रोकने की चुनौती बहुत जटिल होती जा रही है... क्योंकि इसके लिए इन क्षेत्रों में पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं व संसाधन उपलब्ध नहीं हैं... सवाल इसके साथ यह भी उठता है कि आखिर सरकार सिनेमा, चुनावी कार्यक्रमों, रैलियों, सभाओं के लिए भीड़ की खुली छूट देने का जोखिम क्यों ले रही है..? इससे सरकार की नीति-नीयत दोनों पर सवाल खड़े होते हैं... क्योंकि कारोबारियों को लंबे समय तक दुकानें बंद रखने के लिए मजबूर करना, फिर कुछ छूट देने पर भी उन्हें शर्तों के साथ बंधनों में बांधना, लेकिन नेता-दलों को चुनावी लाभ के लिए हर तरह की खुली छूट किसी लापरवाही से कम नहीं है...
प्रधानमंत्री मोदी के कोरोना के खिलाफ इस जन आंदोलन को सफल करना है तो समाज-सरकार दोनों की बराबर भागीदारी सुनिश्चित होना चाहिए... तभी आने वाली सर्दियों में कोरोना की दूसरी सुनामी या कहें कहर से हम बच पाएंगे... इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान देना होगा... क्योंकि जनसंख्या के अनुपात में चिकित्सकों की कमी भयावह है... आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि देश में फिलहाल 10 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तो ऐसे हैं, जहां कोई चिकित्सक नहीं... इन क्षेत्रों के अस्पतालों में बिस्तर की कमी सबसे बड़ी समस्या है... ग्रामीण क्षेत्रों में 1 लाख की आबादी पर आज भी महज 3 बिस्तर उपलब्ध हैं... जबकि डब्ल्यूएचओ के अनुसार प्रति 300 पर 1 बेड होना चाहिए... ग्रामीण क्षेत्रों में 20 से 30 फीसदी ऐसे लोग हैं, जिन्हें चिकित्सक के रूप में देखा तो जाता है, लेकिन वे उसकी आर्हता नहीं रखते... फिर इन दुरुस्थ अंचलों में मरीज को समय पर लाने ले जाने की परिवहन व्यवस्था उपलब्ध नहीं है... और इन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन क्षेत्रों में अभी भी जागरुकता का अभाव है, रोग से लडऩे के तरीकों को लेकर अनभिज्ञता है... ऐसे में त्योहारों पर बाजार की भीड़, चुनावी रैलियों की भीड़ कोरोना के लिए सर्दी में अट्टहास करने का खाद-पानी न बन जाए..? इसकी चिंता अभी करना होगी, तभी जन आंदोलन सफल होगा...