टीआरपी : पारदर्शिता पर सवाल...
   Date17-Oct-2020

vishesh lekh_1  
यह इस दौर की विडंबना है कि जिन संस्थाओं के ऊपर देश, संविधान के अतिरिक्त समाज के हाशिये पर पड़े आखिरी नागरिक के हितों की रक्षा की जिम्मेदारी है.., उन्हें अपनी ही साख की लड़ाई लडऩी पड़ रही है। कथित टेलीविजन रेटिंग प्वॉइंट (टीआरपी) घोटाला इसका सबसे ताजा उदाहरण है...पिछले दिनों मुंबई पुलिस ने इस तथाकथित भ्रष्टाचार का खुलासा करते हुए दो मराठी चैनल मालिकों को हिरासत में लिया था और एक अन्य चैनल से पूछताछ अभी जारी है... ऐसे में, रेटिंग एजेंसी ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च कौंसिल (बार्क) ने फैसला किया है कि अगले तीन महीनों तक वह न्यूज चैनलों की लोकप्रियता रेटिंग जारी नहीं करेगी...बार्क का यह फैसला बिल्कुल मुनासिब है.., और इस अवधि का इस्तेमाल उसे अपने सिस्टम की खामियों को दुरुस्त करने और एक पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने के लिए करना चाहिए... यह न सिर्फ रेटिंग एजेंसी, बल्कि पूरे न्यूज मीडिया के हक में है...टीआरपी की आपसी होड़, उसको लेकर पैदा हुए विवाद, कोई आज की बात नहीं है...यह काफी पुराना मसला है... हां, आज से पहले कभी इसको इतनी गंभीरता से नहीं लिया गया...दरअसल, पिछले कुछ पखवाड़ों के घटनाक्रमों ने यह आशंका पैदा की है कि टीआरपी का आधार पत्रकारीय प्रतिस्पद्र्धा से अर्जित लोकप्रियता नहीं.., बल्कि दूसरे तमाम खेल हैं...निस्संदेह, न्यूज मीडिया भी एक इंडस्ट्री है, और उसके ठोस आर्थिक पक्ष हैं...मगर हम नहीं भूल सकते कि इसका मूल आधार तथ्यपरक खबर है और पत्रकारिता के स्थापित मूल्यों के संरक्षण का दायित्व भी उसके कंधों पर है...पर जिस तरह से यह पूरा मामला सामने आया है.., उसने पूरी रेटिंग प्रक्रिया और उसकी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं...देश के करीब 20 करोड़ घरों में टीवी लगे हैं और दर्शक संख्या 80 करोड़ से अधिक है...ब्योरों के मुताबिक, सिर्फ 44 हजार घरों में टीआरपी मीटर लगे हुए हैं...इनमें से भी ज्यादातर मनोरंजन चैनलों के आकलन के लिए हैं...कहा तो यह भी जा रहा है कि प्रति एक लाख टीवी सेट पर सिर्फ चार की दर्शक अभिरुचि के जरिए हिंदी न्यूज चैनलों की रेटिंग होती है...अंग्रेजी न्यूज चैनलों की तो इससे भी कम पर...जाहिर है, यह बेहद छोटा सैम्पल है और इतने छोटे सैम्पल में गड़बडिय़ों की आशंका रहेगी ही...तब तो और, जब इस बिना पर करीब 40 हजार करोड़ रुपए के विज्ञापन-बाजार में अपने लिए बेहतर संभावनाएं तलाशनी हों...किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में न्यूज मीडिया को पूरी स्वायत्तता इसीलिए हासिल है..,क्योंकि उसे एक प्रहरी की भूमिका मिली हुई है...यही वजह है कि उसे आत्म-नियमन के लिए प्रेरित किया जाता रहा है...
इस तरह की घटनाएं न सिर्फ जनता के भरोसे को डिगाती हैं, बल्कि सरकारी हस्तक्षेप के अवसर भी पैदा करती हैं। बेहतर होगा कि इस अप्रिय विवाद से जरूरी सबक लेते हुए कुछ अन्य रेटिंग एजेंसियों की भी गुंजाइश बने, ताकि किसी एक का दबदबा न कायम हो सके और स्वस्थ व पारदर्शी तरीके से लोकप्रियता का आकलन हो सके। साफ है, विज्ञापन उद्योग को मानक आंकड़े चाहिए और टीवी मीडिया उद्योग को अपने हित में इसकी व्यवस्था करनी ही होगी। यकीनन, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की भी इन सब पर निगाह होगी। लेकिन असली चिंता न्यूज मीडिया को करनी पड़ेगी, साख उसी की दांव पर है।
दृष्टिकोण
गुपकार के बहाने फिर साजिश...
दशकों तक करीब 50 परिवार की जागीर के रूप में संचालित होते रहे जम्मू-कश्मीर को 5 अगस्त 2019 को मोदी सरकार ने वास्तविकता में आजादी दिलाई थी..,क्योंकि अनुच्छेद 370 एवं 35 ए की आड़ में यही चुनिंदा परिवार जम्मू-कश्मीर का दोहन और शोषण दशकों से कर रहे थे...इन परिवारों के बच्चे विदेशों में अध्ययन करते हैं और ये सामान्य कश्मीरी लोगों को दशकों से सेना के खिलाफ, पुलिस के खिलाफ पत्थर फिंकवाने में झोंकते रहे...स्थिति यहां तक बन गई कि इन्हीं परिवारों में से कुछ कट्टरपंथी धड़ों ने मिलीभगत करके पूरे कश्मीर को पंडितविहीन या कहें कि हिन्दूविहीन करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी...तभी तो जब इन चुनिंदा 50 परिवारों के पास से जब अपनी मालिकाना जागीर छिन गई यानी 370 और 35 ए का खात्मा हो गया तो यह स्वाभाविक था बिलबिलाएंगे और बिलबिला रहे हैं...तभी तो नजरबंदी से मुक्त हुए तो राजनीतिक जमावट शुरू कर दी...उन धुर विरोधियों ने जो एक-दूसरे का मुंह देखना पसंद नहीं करते थे...आखिर फारुख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती और कांग्रेस के साथ अन्य 6 राजनीतिक दलों का एक मंच पर आना क्या बताता है..? ये सही मायने में गुपकार के बहाने घाटी में पुन: अशांति फैलाने की सबसे बड़ी साजिश है...आखिर ये उन बेजा धाराओं को बहाल करवाने की मांग करके किसका हितसंवर्धन करना चाहते हैं...आखिर यह किस दावे के साथ यह कह रहे हैं कि इन बेजा प्रावधानों के बिना जम्मू-कश्मीर की पहचान, स्वायत्ता और उसके विशेष दर्जे को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता...370 की बहाली के लिए संघर्ष की बात कहने वाले पीडीपी, नेकां और कांग्रेस के नेताओं के बयानों से पता चल रहा है कि ये जम्मू-कश्मीर में तेजी से आ रहे बदलाव के कारण स्वयं को कितना असुरक्षित महसूस कर रहे हैं...50 परिवारों का भविष्य बचाने के लिए धरती के स्वर्ग कश्मीर को भी दांव पर लगाने मंसूबे पाल रहे हैं...