कर्तव्य
   Date17-Oct-2020

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प्रेरणादीप
महाभारत समाप्त हुआ। पुत्रों के वियोग से दु:खी धृतराष्ट्र ने महात्मा विदुर को बुलाया। उनके साथ सत्संग में दु:ख हलका करने लगे। चर्चा के बीच धृतराष्ट्र ने पूछा-'विदुरजी! हमारे पक्ष का एक-एक योद्धा इतना सक्षम था कि उसने सेनापति बनने पर अपने पराक्रम से पांडवों के छक्के छुड़ा दिए। यह जीवन-मरण का युद्ध है, यह सबको विदित था। यह ध्यान में रखते और सेनापति बनने पर ही अपना पराक्रम प्रकट करने की जगह कर्तव्य-बुद्धि से एक साथ पराक्रम दिखाते तो क्या युद्ध जीत न जाते? विदुरजी बोले-'राजन्! आप ठीक सोचते हैं। यदि वे ऐसा कर सकते तो जीत सकते थे, परंतु अकेले अधिक यश बटोरने की लिप्सा तथा अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की अहंता ने कर्तव्य को सोचने, उसे निभाने की उमंग पैदा करने का अवसर ही नहीं दिया। यदि कर्तव्य ही सोचा होता तो वे अपने भाइयों को उनका हक देकर युद्ध टाल भी सकते थे। जो जैसा करता है, वैसा पाता है। अत: हे राजन्! आप कौरवों की हार व उनकी मृत्यु का दु:ख न करें।Ó