आस्था और विश्वास की प्रतीक आराध्य देवी चंद्रिका
   Date17-Oct-2020

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हरिप्रसाद चौरसिया
भारतीय इतिहास में महोबा का नाम अजर अमर है। बुंदेलखंड का यह ऐतिहासिक नगर अपनी वीरगाथाओं और आल्हा-ऊदल की कर्मभूमि के साथ-साथ महोबिया पान के लिए विश्वविख्यात रहा है। आज भी यह ऐतिहासिक नगर होने के साथ-साथ पुरातत्विक महत्व से भरपूर है। विश्व प्रसिद्ध खजुराहो के मंदिर का इतिहास महोबा से ही जुड़ा रहा है। महोबा झांसी-माणिकपुर रेलवे लाइन पर वर्तमान में रेलवे जंक्शन है, जहां से खजुराहो को ट्रेन जाती है। महोबा चंदेल राजाओं की राजधानी रही है। आल्हा माता शारदा के परम भक्त माने जाते हैं तो चंदेलों की आराध्य कुलदेवी चंद्रिका माता रही हैं। वैसे मनियादेवी भी इनकी उपासक देवी रही हैं। महोबा के प्रथम शासक नन्नकु या चंद्रवर्मन थे। उनका राज्यकाल सन् 831 से 845 ई. था। महोबा के बारे में निम्न दोहा प्रसिद्ध है-
पारस पथरी है महुबे माँ।
लौहो छुवत सोन हुय जाय।।
अर्थात महोबे में पारस पत्थर है, जिसको लोहे से छुआने से लोहा सोना बन जाता है। चंद्रवर्मन का जन्म स्थान मनियागढ़ पन्ना था। चंदेलवंश के संस्थापक चंद्रवर्मन ने अपने पिता चंद्रदेव के निर्देशन पर खजुराहो में 'भाण्डया यज्ञÓ का आयोजन किया था। इसके समापन पर सन् 831 ई. में महोबा में एक विशाल महोत्सव का आयोजन किया और राजधानी महोबा बनाई और ग्रेनाइट 12 फुटी शिला पर उत्कीर्ण 18 भुजी महिषासुर मर्दिनी देवी दुर्गा शक्तिपीठ की स्थापना की, जो स्थानीय जनमानस में बड़ी चंद्रिका के नाम से जानी जाती है। कला सौष्ठव की दृष्टि से अभयमुद्रा में तथा शिरोभाग पर गजासुर वध का प्रतीक चिन्ह अंकित होने से मूर्ति अत्यंत भव्य एवं प्रभावशाली है। इसकी मान्यता दुर्ग व नगर रक्षा हेतु चामुण्डा स्वरूप दक्षिण में स्थापित मानी गई है। मूर्ति के सामने एक मानस्तम्भ या दीपस्तम्भ है। इसके पीछे नृत्य मुद्रा में गणेश साढ़े तीन बाय ढाई वर्ग फीट की शिला पर स्थापित किए हैं। गणेश प्रतिमा बाद की है। मध्ययुग में सिद्ध धर्माचार्यों द्वारा यज्ञादि अनुष्ठान श सन्मतविद्या से वर्षभर आयोजित करके उक्त चंदेल शासक ने अपने राज्यकाल में इस चंद्रिका मूर्ति की स्थापना की थी। महोबा का प्राचीन नाम रतनपुर के स्थान पर इसे महोत्सव नगर नाम दिया गया, जो कलांतर में अपभ्रंश होकर महोबा हो गया। चंदेलकालीन शिल्पकला में निंरतर भक्ति विध्नेश्वर, तरुण गणपति, बाल गणेश, हेरम्य गणपति और प्रसन्न गणपति को राजप्रसादों, मंदिरों, आवासों और दुर्गों के द्वारों पर प्रतिष्ठापित करने की प्रथा थी। बड़ी चंद्रिका परिसर में ही देवताओं शिव, विष्णु, देवी, गणेश व सूर्य की समन्वित पूजा की प्रतीक पंचदेव चौकी की स्थापना की गई है। ग्रेनाइट पत्थर की चौकी का आकार 4 बाय 4 वर्गफीट है। इसके मध्य में शिव के 5 लिंग वर्ताकार उत्कीर्ण है। इसके चारों कोनों का अलंकृत किया गया है। भक्तों द्वारा अर्पित जलनिकासी हेतु एक मकराकृत गोल छिद्र भी रचा गया है। यह चौकी अपने में एक अद्भुत कलाकृति है, जो सामान्य रूप से कहीं प्रदर्शित नहीं है। इसका निर्माण गुप्तकालीन प्रतीत होता है। पांचवीं-छठी शताब्दी में पंचकृत पूजा का प्रचलन था, जिसे पंचकृत लिंग पूजा कहा जाता है। शिव के पांच स्वरूप (सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान) कृत लिंग में दर्शाये गए हैं, जो उभरदार है। प्रथम चार वृत्त समान और पांचवां ईशान वृत्त को विशेष लिंग में अधिक उभारदार में रूपायित किया गया है। यह भी मत है कि उस समय के धार्मिक आचार्यों द्वारा हिन्दू एकता प्रतीक हेतु शक्ति, गणेश, सूर्य, विष्णु और शिव की समन्वित पूजा का प्रचलन किया गया था। प्राचीन धरोहर उत्खलन के दौरान एक शिवकंठ भी प्राप्त हुआ था, जो आकार में ढाई फीट ऊंचा व लगभग एक फीट चौड़ा है। वस्तुत: यह एक लिंग शिव हैं। इस प्रकार के शिवलिंग की कालिंजर दुर्ग में कई स्थानों पर स्थापना की गई थी। ऐसा प्रतीत होता है कि आक्रमणकारियों से सुरक्षा के लिए इस शिवकंठ को समीपवर्ती कंठेश्वर गुफा के पास लाकर इसे भूमिगत कर दिया गया था। मूर्तिकार ने चंद्रमौली को शांत मुद्रा में ललाट पर त्रिनेत्र तथा जटाये धारण कराकर रूपान्ति किया है। श्री चंडिका देवी पीठ के चारों ओर 6 सती चिन्ह शिलाओं पर उत्कीर्ण है। कुछ जगहों पर शिला पट्टिकाओं में युगल (पति-पत्नी) के ऊपर पंजा और दायीं-बायीं और सूर्यचंद्र दर्शाए गए हैं, जिसकी व्याख्या यह हो सकती है कि पंचतत्वों में विलीन युगल को जब तक आकाश मंडल में सूर्य-चंद्र रहेंगे, उन्हें अमरत्व प्राप्त होता रहेगा। ऐसे सती चिन्हों को 'सती संतान चीराÓ भी कहा जाता है। इन स्थानों को किसी समीपवर्ती शिला या शिला पट्ट में प्रतिष्ठित करने की प्रथा थी। 13वीं शताब्दी में बाह्य आक्रमणकारियों से युद्ध में रत युवा सैनिक के वीरगति के प्राप्त होने पर उनकी विधवाएं सती (आत्मदाह) हो जाया करती थी। इसके प्रमाण महोबा में बहुत स्थान पर मिलते हैं। विशेषकर देवी पीठों के समीप मिले हैं। महोबा में छोटी चंद्रिका चंडिका, शिव तांडव, सिंहभावनी पूर्वी चामुंडा, चौदह रानी महेश्वरी देवी के अलावा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में पाए जाते हैं। मुगल आक्रमणकारियों के समय यह प्रथा अपने चरम पर थी। कालिंजर दुर्ग में भी ऐसे चिन्ह देखने को मिलते हैं। सारांश यह कि चंदेल वंश में वीरता के साथ-साथ धार्मिक आयोजनों और देवालयों की भरपूर चिन्ह आज भी महोबा नगर और उसके आसपास उपलब्ध हैं। अधिकांश मंदिर दुर्गादेवी और शिव के थे। किसी को भी मंदिर में प्रवेश का निषेध नहीं था। राजा के राजभवन के निकट एक ऐसा मंदिर बनाया गया था, जिसके एक भाग में दुर्गादेवी की मूर्ति, दूसरे में शिव की और तीसरे में विष्णु की प्रतिमाएं थी। इस प्रकार से महोबा एक दर्शनीय नगर है। मंदिर के पास बने महिसागर तीर्थी की भी आपनी मान्यता है। लोगों के अनुसार इस तीर्थ में घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने तप किया था। ये तीर्थ मनोकामनीपूर्ति व पापों को नाश करने के लिए माना जाता है। मंदिर की तीन दिशाओं में गोमती नदी है तथा एक ओर संगम जो मंदिर के पर्यटन के लिहाज से भी खास है। मंदिर की मान्यता व लोकप्रियता के चलते यहां हर महीने की अमावस्या को मेला लगता है, जिसमें तमाम भक्त शामिल होते हैं।
मान्यता-अठारहवीं सदी के पूर्वाद्र्ध से यहां मां चंद्रिका देवी का भव्य मंदिर बना हुआ है। ऊंचे चबूतरे पर एक मठ बनवाकर पूजा-अर्चना के साथ देवी भक्तों के लिए प्रत्येक महीने की अमावस्या को मेला लगता था, जिसकी परम्परा आज भी जारी है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए मां के दरबार में आकर मन्नत मांगते हैं, चुनरी की गांठ बांधते हैं तथा मनोकामना पूरी होने पर मां को चुनरी, प्रसाद चढ़ाकर मंदिर परिसर में घंटा बांधते हैं। अमीर हो अथवा गरीब, अगड़ा हो अथवा पिछड़ा, मां चंद्रिका देवी के दरबार में सभी को समान अधिकार है। मां के मंदिर में पूजा-अर्चना पिछड़ा वर्ग के मालियों द्वारा तथा पछुआ देव के स्थान (भैरवनाथ)पर आराधना अनुसूचित जाति के पासियों द्वारा कराई जाती है। ऐसा उदाहरण दूसरी जगह मिलना मुश्किल है।