आध्यात्मिक जीवन का मूलाधार त्याग
   Date15-Oct-2020

dharmdhara_1  H
धर्मधारा
सां सारिक दृष्टि से हम बड़ा आदमी किसे कहते हैं, जिसने जितना अधिक स्वार्थ को पूरा किया, जितना अधिक अहंकार को प्रतिष्ठित किया। स्वार्थपरता जहां चरम पर है, जहां अहंकार शिखर पर है, उसे हम उपलब्धिवान व्यक्ति कहते हैं, इसके पास बड़ी उपलब्धियां है, बड़ा गौरव है और आध्यात्मिक जीवन में वह बड़ा व्यक्ति है, जिसने स्वार्थ का त्याग कर दिया, अहंकार का त्याग कर दिया, अहंकार को छोड़ दिया। स्वार्थ व अहंकार को त्यागने वाला व्यक्ति भी सांसारिक जीवन में रहकर अपना कार्य करता है। ऐसा नहीं है कि त्याग का मतलब है कि वह संसार को छोड़कर कहीं वन में जाकर रहने लगे, बल्कि त्याग का मतलब है कि अब उसका स्वार्थ व अहंकार न्यूनतम हो गए है। भारतीय संस्कृति में त्यागरूपी जीवन जीने वाले संन्यासी कहे गए हैं। भगवान गीता में संन्यास को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि संन्यासी वो नहीं है, जिसने अग्नि का त्याग कर दिया हो, जिसने कर्म का त्याग कर दिया हो। वो संन्यासी नहीं है, फिर संन्यासी कौन है? कहते हैं - ज्ञेय: स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काड्क्षति। (गीता-5/3) वो नित्य संन्यासी मानने योग्य है जो किसी से द्वेष नहीं करता, जिसको किसी चीज की आकांक्षा नहीं है। त्याग को हम कई तरह से परिभाषित करते हैं और त्याग को समझने की कोशिश भी करते हैं। अब सवाल उठता है कि क्या त्यागे? तो इसका उत्तर है कि आसक्ति त्यागें, अहंकार त्यागे, स्वार्थ त्यागें और अहंता को त्याग दें, यही संन्यास है, यही त्याग है, क्योंकि सांसारिक चीजों में सोचोंगे, अहंकार के बारे में सोचेंगे कि मुझे ये मिलना चाहिए, ये मेरा है, उतना ही हम ज्यादा संकीर्ण होते चले जाएंगे।