गौशालाओं को आर्थिक संबल...
   Date14-Oct-2020

vishesh lekh_1  
भारतीय परंपरा में प्रत्येक पर्व-उत्सव, तीज-त्योहार का वृहद महत्व है... वह सिर्फ बाजार को ध्यान में रखकर या फिर व्यक्ति के मनोरंजन या फिर उसकी खुशी के प्रकट करने का अवसरभर नहीं है, बल्कि इन त्योहारों-पर्वों का प्राकृतिक रूप से, सामाजिक रूप से, सांस्कृतिक रूप से, आर्थिक रूप से और ऋतु परिवर्तन के साथ बाजार की मांग एवं आवश्यकता के अनुरूप निरंतर ऐसी गतिविधियां संचालित करने का निमित्त बनता है, जिसमें हर किसी का आर्थिक पोषण नियमित होता रहे... गुरुपूर्णिमा एवं गणेशोत्सव से देश में पर्व-उत्सव का एक सिलसिला प्रारंभ हो जाता है, जो प्रकृति के संरक्षण-संवर्धन के साथ ही नई फसलों के आगमन से घर-आंगन, खलिहान में खुशियों की आमद का द्योतक होता है... पांच दिवसीय दीपोत्सव वैसे तो भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन का वह अवसर है, जिसमें अब तो पूरा भारत ही नहीं, सात समंदर पार अमेरिका व अन्य देशों में भी दीप मालिकाएं जगमगाती हैं... कोरोनाकाल के इस संकट में आमजन दो तरह की स्थितियों का सामना कर रहा है... चीन की अतिक्रमणकारी दुस्साहस का जवाब उसके हर तरह के सस्ते उत्पादों का बहिष्कार करके कैसे दिया जाए..? दूसरा आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत भारतीय पर्व-उत्सव में स्वदेश निर्मित उत्पादों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग हो... अगर इस नजर से देखें तो इस बार कामधेनु आयोग ने देश की गौशालाओं को आर्थिक संबल प्रदान करने की रणनीति पर लंबे समय से काम शुरू कर दिया है... पूरे देश में दीपावली पर 33 करोड़ से अधिक गोबर के दीपक जलाये जाएंगे... यही नहीं, देश की गौशालाओं में गोबर से 100 से अधिक ऐसे उत्पाद निर्मित किए जा चुके हैं, जिनका धार्मिक कार्यक्रमों, पर्वों-उत्सवों एवं अन्य संस्कारों में उपयोग होता है... ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में तो अंतिम संस्कार में बड़े पैमाने पर गोबर के कंडों का उपयोग हो रहा है... क्योंकि अनेक जगह लकडिय़ों का भीषण अभाव है... अगर शुभ-लाभ जैसे प्रतीक चिन्ह गोबर से निर्मित करके घर की सजावटी वस्तुओं के रूप में उपयोग किए जाएंगे तो इसका कहीं-न-कहीं गोपालकों एवं गौशालाओं को आर्थिक लाभ मिलना तय है... इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि जब राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने मध्यप्रदेश-उत्तरप्रदेश को एक-एक लाख से अधिक गोबर के दीपक आपूर्ति करने का लक्ष्य लिया है तो ऐसा ही निर्णय अन्य राज्यों ने भी किया होगा... कामधेनु दीपावली अभियान से न केवल वास्तविकता में गौवंश को समर्पित दीपोत्सव का महत्व स्थापित होगा, बल्कि कृषकों, गोपालकों एवं गौशालाओं के आर्थिक हितलाभ का भी समाधान हो सकेगा... अत: स्वदेशी वस्तुओं का काम से कम स्वदेशी उत्सवों-पर्वों में व्यापक रूप से उपयोग हो, ताकि कामधेनु दीपावली अभियान जैसी प्रेरक पहल को पूर्ण प्रोत्साहन मिल सके...
दृष्टिकोण
उद्योगपति का सुख और गरीब का दु:ख...
चुनाव में किस तरह की भाषाशैली एवं बयानों का उपयोग किया जाना चाहिए, इसको लेकर कम से कम अपने को राष्ट्रीय दल कहने वाले दलों के नेताओं को तो ध्यान रखना ही होगा... यह भी शाश्वत सत्य है कि चुनाव के समय जिस तरह की बयानबाजी होती है और जो लक्ष्य करके बायनी जुमले छोड़े जाते हैं, उससे अनेक बार वास्तविक स्थिति भी अपने आप सामने आने लगती है... मध्यप्रदेश में सत्ता का निर्धारण करने वाले 28 विधानसभा सीटों के उपचुनाव को लेकर चुनाव प्रचार गति पकडऩे लगा है... इस दौरान जिस तरह से कांग्रेस की तरफ से बयानबाजी हो रही है और उसका जवाब भाजपा की तरफ से दिया जा रहा है, वह वास्तविक स्थिति का ही आंकलन नहीं करा रहा, बल्कि लोगों का ध्यान भी आकर्षित कर रहा है... यह बात चुनाव में सामने आई कि कोई नेता उद्योगपति है तो क्या वह हर व्यक्ति के सुख-दु:ख को उतनी गंभीरता से समझ सकता है..? या फिर जो व्यक्ति उसी सुख-दु:ख को देखकर जीवन में उसे सहकर, उससे ऊपर उठा है, वह उस स्थिति को ज्यादा गंभीरता से बयां कर सकता है... गत दिनों एक कांग्रेस नेता ने चुनावी सभा में पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ को देश का दूसरे नंबर का उद्योगपति और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को नंगे-भूखे घर का बताया था... सवाल यह है कि कमल नाथ अगर उद्योगपति हैं तो उनके सुख से क्या जनता का दु:ख अपने आप मिट जाएगा..? क्या इसके लिए उनको सत्ता में रहते हुए किए गए प्रयासों का उदाहरण देकर बताना चाहिए कि उद्योगपति होने के नाते उन्होंने लोगों के दु:खों को किस तरह से दूर करके स्वयं को संतुष्ट किया... इसलिए अगर शिवराजसिंह चौहान यह कहते हैं कि गरीब हूँ, इसलिए हर गरीब का दर्द समझता हूँ... तो इसे उनके जनता से जुड़े निर्णयों-नीतियों के आईनों में देखना चाहिए, तो अपने आप पता चल जाएगा...