नौवहन मार्ग में समस्याएं उत्पन्न करता चीन
   Date14-Oct-2020

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महेंद्र राजा जैन
ब्रि टिश अखबार 'द गार्डियनÓ में छपे एक लेख के अनुसार भारत के साथ 'सुपरÓ बनने की होड़ में चीन का संघर्ष जमीनी सतह पर नहीं होगा। पैंगोंग झील एक ऐसा स्थान है, जिसको लेकर परमाणु शक्ति सम्पन्न दो देशों के बीच सामुद्रिक युद्ध हो और जिसकी ओर तीसरे देश पाकिस्तान की नजर भी न हो। वस्तुत: ऐसा कभी सोचा नहीं जा सकता, पर यह सत्य है। इस्लामाबाद से पूर्व की ओर करीब दो सौ अस्सी मील, नई दिल्ली से उत्तर की ओर तीन सौ साठ मील और बीजिंग से पश्चिम की ओर करीब दो हजार एक सौ सत्तर मील दूर पैंगोंग झील हिमालय के उत्तर में एक निर्जन प्रदेश में है। इसके बारे में 1905 में ब्रिटिश समन्वेषक एल्सवर्थ हंटिंग्टन ने लिखा था कि सौंदर्य की दृष्टि से इसकी तुलना स्विट्जरलैंड और इटली की झीलों से की जा सकती है और उनकी तुलना में यह उन्नीस नहीं, इक्कीस ही ठहरेगी। लद्दाख का इलाका बकरे चराने वाले थोड़ी-सी संख्या वाले लोगों का निर्जन प्रदेश-सा है, जो शीत ऋतु में पूरी तरह बर्फ से जमा हुआ प्रदेश बन जाता है। यह अक्साई चीन से सुदूर दक्षिण में लद्दाख का एक भाग है। जो हो, वर्तमान में यह अक्साई चीन की ओर से भारत नियंत्रित लद्दाख के उत्तर में चीन के कब्जे में है, जिस पर भारत अपना दावा मानता है, लेकिन इस पर माओ की सेना ने 1962 में पंचशील की आड़ में नेहरूजी की पीठ में छुरा घोंपकर कब्जा कर लिया था।
उसके बाद 1967 और 1975 में भारत और चीन में झड़पें हुईं और फिर 1999 में पैंगोंग झील की गतिकी में परिवर्तन हुआ, जब चीन ने कब्जे में आए क्षेत्र में सड़क बनाई। उसके बाद बीच-बीच में चीन ने कई बार इस प्रदेश में आगे बढऩे की छिटपुट कोशिशें की, पर भारतीय सेना ने उन्हें विफल कर दिया। इस वर्ष मई और जून में फिर इस झील के उत्तर में गलवान घाटी में चीनी सेनाओं ने आगे बढऩे की कोशिशें की, जिसके फलस्वरूप हुए संघर्ष में हमारे बीस जवान शहीद हुए। बीच-बीच में थोड़े बहुत विस्तार के अलावा चीन को कोई और लाभ नहीं हुआ, उसने तो 1962 में हुए युद्ध में ही वह सब प्राप्त कर लिया था, जो वह चाहता था। तो फिर भारत के खिलाफ चीन की क्या परिरोधन युद्ध योजना है?
चीन की आर्थिक और सैनिक युद्ध योजना का मकसद चीन और मध्य पूर्व के बीच समुदी क्षेत्र पर आधिपत्य जमाना है। इसके लिए चीन एशिया के नौवहन मार्ग में रोड़े बिछाना चाहता है। स्वेज नहर के पास चीन का पहला नौवहन बंदरगाह जिबूती में बनकर तैयार हो चुका है। चीन की आर्थिक सहायता से तैयार किया गया अरब सागर में पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह दूसरा रोड़ा है, जो होरमुज के जलडमरू मध्य के रास्ते को रोके हुए है। इधर, चीन दक्षिण चीन सागर पर नौसैनिक सुविधाएं स्थापित कर अपना प्रभुत्व पहले ही कायम कर चुका है, पर उसके लिए इतना ही काफी नहीं है। दुनियाभर में जलयान द्वारा भेजे जाने वाले सामान का एक तिहाई और चीन का अधिकांश तेल आयात सिंगापुर और इंडोनेशिया के द्वीप सुमात्रा के बीच स्थित मलाका जलडमरू मध्य से होकर निकलता है। सिंगापुर के चांगी युद्ध पत्तन पर अमेरिकी नौसेना के अड्डों की तैनाती के कारण मलाका जलडमरू मध्य चीन की समुद्री युद्ध नीति की दृष्टि से सबसे कमजोर कड़ी है। इसलिए चीन ने थाईलैंड के दक्षिण में अस्सी मील लंबी नहर की खुदाई शुरू कर दी है। इसमें उसके लगभग तीस अरब डॉलर खर्च होंगे। यह नहर चीन को बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर तक बिना किसी अवरोध के आने देगी। इसके अलावा बंगाल की खाड़ी में भी प्रवेश कर चीन ने बांग्लादेश में चटगांव में एक नए बंदरगाह का निर्माण शुरू कर दिया है। अकसर यह भुला दिया जाता है कि इस समय बांग्लादेश आर्थिक दृष्टि से प्रगति कर रहा एशिया का सबसे बड़ा देश है। म्यांमार तो अब चीन का लगभग गुलाम-सा ही है। एक पुरानी बर्मी कहावत है कि जब चीन थूकता है तो बर्मा उसमें तैरता है। यहां भी चीन रोहिंग्या मुसलमानों के राखीन प्रांत के किनारे बंदरगाह के विस्तार करने में आर्थिक सहायता देकर उसे एक प्रकार से अपने कब्जे में कर लेना चाहता है।
इस साल जनवरी में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की म्यांमार की यात्रा के बाद जो संयुक्त घोषणा की गई थी, उसमें यह बात विशेष रूप से ध्यान देने लायक है कि क्याकिपु में नया बंदरगाह बनाने के कार्य में शीघ्रता की जाएगी। उसके बाद चटगांव से रेल मार्ग तैयार कर यहां तक लाया जाएगा और उसके आगे समुद्री मार्ग से चीन के पश्चिम में युनान प्रदेश की राजधानी कुमिंग तक चटगांव जोड़ा जाएगा। दोनों प्रदेशों के बीच तेल की पाइप लाइन बिछाने की योजना पर भी विचार चल रहा है। बंगाल की खाड़ी के दक्षिण में चीन और श्रीलंका में पचास के दशक से ही घनिष्ठ संबंध हैं। हालांकि चीन की इन युद्ध नीतियों से भारत अच्छी तरह परिचित है। पाश्चात्य देश एक प्रकार से सो रहे हैं। लगभग अमेरिकी अर्थव्यवस्था के बराबर वाला चीन अगले तीस से पचास वर्षों में लगभग दूना हो जाने की संभावना है। इस प्रकार शी जिनपिंग के नेतृत्व वाले चीन की नीति छिपे-छिपे ही विश्व नेतृत्व की है। यह एक प्रकार से बिना तोप चलाए ही युद्ध करने या कहा जाए बिना लड़े हुए दुश्मन के प्रतिरोध को तोडऩे की बात है। ऐसी स्थिति में म्यांमार में आंग सेन सू की रोहिंग्या दमन नीति, थाईलैंड में लोकतांत्रिक सरकार के पतन, फिलीपींस के राष्ट्रपति द्वारा अपराधियों के प्रति नृशंस पाशविक नीति की ओर नैतिक दृष्टि से अमेरिका इस क्षेत्र में अपने स्वाभाविक मित्र देशों की मैत्री से वंचित हो गया है। ये वे देश हैं, जिन्हें चीन की आर्थिक और सैनिक शक्ति का भय है और यह कि अमेरिकी विदेश नीति इस विषय में उनके लिए पहले जैसी सहायक नहीं होगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन की आर्थिक नीति के मार्ग में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए हैं, पर इस बात के अभी कोई संकेत नहीं दिखते कि अमेरिका एशियाई मित्र देशों को अपने बाड़े में हांकने के लिए किस प्रकार प्रयत्नशील है। इस क्षेत्र में चीन के दो की तुलना में ग्यारह अमेरिकी हवाई बेड़ों की मौजूदगी से एशिया में नौवहन की दृष्टि से अमेरिका की स्थित मजबूत है।
फिर भी कहा जा सकता है कि इस स्थिति में बड़ी तेजी से बदलाव हो रहा है। इसी वर्ष मई में प्रकाशित अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष के अंत तक इस क्षेत्र में अमेरिका के 297 जल बेड़े रहेंगे, यानी उतने ही जितने पंद्रह वर्ष पहले थे, जबकि चीन के तीन सौ साठ होंगे, जो कि उतने ही समय के दुगने हैं। एक तिहाई का अभी निर्माण हो रहा है और चौथे जलयान पोत का ढांचा अगले वर्ष बैठा दिया जाएगा। यदि यही स्थिति रही तो अमेरिकी नौसैनिक गतिविधियां चीन की निगाह से बच नहीं सकेंगी। इसमें कोई शक नहीं कि चीन इस क्षेत्र में प्रत्येक दृष्टि से काफी निवेश कर रहा है। वह हर किसी से हर क्षेत्र में आगे बढ़ कर है। यदि अभी से इस खतरे की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो यह निश्चित है कि आगामी डेढ़-दो दशक में चीन अमेरिका से काफी आगे निकल जाएगा। युद्धपोत संबंधी मामलों में भारत और यूरोप के लिए प्रभुत्व की दृष्टि से यह चीन के साथ सैनिक संघर्ष की बात नहीं, वरन यह बिना एक गोली चलाए चीन के प्रभुत्व की बात होगी।
(लेखक-वरिष्ठ हिंदी लेखक हैं)