रस्सी जल गई, बल नहीं गए...
   Date13-Oct-2020

vishesh lekh_1  
अपना विवादित, अराजक या कहें राष्ट्रद्रोही स्वभाव अथवा चरित्र न छोडऩे वालों के लिए वैसे तो कहावत बहुत सारी हो सकती है, लेकिन जो कूट-पिटकर ही अपनी आदतों से बाज न आए, अपनी खुराफाती हरकतों को लगातार दोहराए, तब उसके लिए यही कहा जा सकता है कि वह ठोकर खाकर भी सुधरने वालों में से नहीं है... जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारुख अब्दुल्ला का विवादित विचार व व्यवहार जगजाहिर है... ये वे ही अब्दुल्ला हैं, जो सत्ता छिनते ही लंदन में अपनी जिन्दगी ऐशोआराम से गुजारते हैं और सत्ता मिलते ही जम्मू-कश्मीर के लिए मर-मिटने की कसमें खाने की बजाय कश्मीर को भारत से अलग करने की खुराफाती रणनीतियों को निरंतर खाद-पानी देते हैं... 5 अगस्त 2019 को नरेन्द्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 एवं 35-ए का खात्मा करके एक राष्ट्र-एक संविधान और एक निशान के उस संकल्प को पूर्ण किया था, जिसका सपना डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने देखा था... अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर के साथ ही पीडीपी की मुखिया मेहबूबा मुफ्ती तभी से नजरबंद रखे गए थे... फारुख अब्दुल्ला को अभी हाल ही में रिहा किया गया है... लेकिन उमर और मेहबूबा अभी भी परदे के पीछे ही हैं... जिस तरह से फारुख अब्दुल्ला लगातार अनुच्छेद 370 एवं 35-ए को लेकर विवादित बयान दे रहे हैं, उसे पुन: बहाल करने की हास्यास्पद दावे कर रहे हैं... उससे इतना तो अनुमान लगाया जा सकता है कि वे अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं... तभी तो वे भारत के आंतरिक मामलों में किस हैसियत से चीन की दखलंअदाजी का दावा कर रहे हैं... आखिर चीन की मदद से जम्मू-कश्मीर में फारुख अब्दुल्ला कैसे 370 और 35-ए की बहाली करवाएंगे, इसका उन्हें स्पष्ट रूप से खुलासा करना चाहिए..? क्या उनकी किसी चीनी राजदूत अथवा सरकार में मुख्य भूमिका निभाने वाले पदाधिकारी से कोई चर्चा हो रही है..? अगर हो भी रही है तो वे किस हैसियत से भारत की तरफ से ऐसा कर सकते हैं... क्या ऐसा करने के मामले में उन्हें जेल की सलाखों के पीछे नहीं धकेला जाना चाहिए..? क्योंकि भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को कमजोर करने के किसी भी खुराफाती खेल का तुरंत जवाब दिया जाना चाहिए... और जब भारत में रहकर, भारत की ही खाकर, भारत के खिलाफ कोई अपने हिंसक-अराजक व्यवहार को लगातार पोषित करता रहे, तब तो ऐसे व्यक्ति पर निरंतर निगरानी जरूरी है... ये वे ही अब्दुल्ला हैं, जिन्होंने कभी अटल सरकार के समय कहा था कि मैं अगर पाकिस्तान में होता तो अब तक वहां का प्रधानमंत्री बन जाता... लेकिन वे कितनी बार मुख्यमंत्री बने या उनके परिवार ने कितनो वर्षों तक जम्मू-कश्मीर पर राज किया, इसको वे भूल जाते हैं... और अपनी हरकतों के बार-बार उसी जली हुई रस्सी की भांति दर्शाने की कोशिश करते हैं, जो जलने के बाद भी अपने बल अर्थात् स्वभाव नहीं छोड़ती...
दृष्टिकोण
ग्रामीण विकास को मिली गति...
इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि 2014 के बाद हिन्दुस्तान में राजनीतिक निर्णय के रूप में ही नहीं, बल्कि विकास की स्थितियों को लेकर और संवैधानिक नियमों-कानूनों के तहत की गई व्यवस्थाओं के मान से भी अनेक बड़े और क्रांतिकारी परिवर्तन लगातार देखे गए हैं... इनका असर भविष्य के मान से बहुत व्यापक होने वाला है... जब आजाद भारत के संदर्भ में उसके विकास और संसाधनों के वितरण को लेकर चर्चा निकलती है, तब स्पष्ट रूप से भारत को दो रूपों में देखा जाता है... एक ग्रामीण भारत और दूसरा शहरी भारत.. इन दोनों में अधोसंरचनात्मक विकास और संसाधनों की आपूर्ति का अंतर तो आजादी के बाद से ही प्रारंभ हो गया था... लेकिन उस खाई को पाटने का काम 2014 से शुरू हुआ... पहली बार 2018 में यानी मोदी सरकार ने अथक 4 वर्षों के प्रयास से उन गांवों तक बिजली पहुंचाने में सफलता प्राप्त की, जहां पर आजादी के बाद करीब 70 वर्षों तक घुप्प अंधेरा छाया हुआ था... ठीक इसी तरह से आज ग्रामीण और शहरी भारत में करीब 2 करोड़ से अधिक गरीब लोगों को पक्की छत यानी अपना घर मिला है... पहले सिर्फ आवास योजनाएं पैसों को ठिकाने लगाने का जरिया बन गई थी... साढ़े आठ करोड़ से अधिक गरीबों, दलितों, वंचितों और अभावग्रस्त लोगों को मुफ्त में रसोई गैस मिलना किसी बड़ी उपलब्धियों से कम नहीं है... किसानों तक सुविधा और कृषि व्यवस्थाएं पहुंच रही हैं... कहने का तात्पर्य यही है कि ग्रामीण विकास ने तेजी से रफ्तार पकड़ ली है... स्वामित्व योजना का शुभारंभ करते हुए प्रधानमंत्री ने जो बात रखी, उससे नए ग्रामीण भारत के निर्माण में बड़ी भूमिका का निर्वाह होगा... क्योंकि इससे एक लाख परिवारों को लाभ मिलने वाला है...