हाथरस, मंसूबे और मानसिक रतौंधी...
   Date11-Oct-2020

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ब्रेक
के बाद
शक्तिसिंह परमार
उ त्तरप्रदेश के हाथरस वाले घटनाक्रम ने बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए हैं...जिनका समय के साथ जवाब भी सामने आएगा...किसी भी समाज व राष्ट्र की पहचान उसके नागरिकों द्वारा महिलाओं अर्थात् मातृशक्ति के साथ पेश आने के व्यवहार से होती है...क्योंकि विश्व की इस आधी आबादी का किसी भी निर्णय में, सुधार में अथवा बदलाव में पूरी भागीदारी सृष्टि की रचना के समय से तय है...फिर उनके साथ होने वाले किसी भी तरह के भेदभाव, उत्पीडऩ अथवा घर-परिवेश के आंतरिक व बाह्य रूप में होने वाली हिंसा को भांति-भांति के कारणों के साथ नत्थी करके आया-गया कैसे माना जा सकता है..? महिला विषयक इन तमाम सवालों के जवाब हर किसी को खोजने होंगे...और जवाबदेही-जिम्मेदारी भी सुनिश्चित करनी होगी...क्योंकि जिस तरह से देश में महिला सुरक्षा की तार-तार स्थितियां बार-बार निर्मित हो रही हैं...इन घटनाक्रमों की भट्टी में बयानों का कोयला-तेल डालकर जिस तरह से स्वार्थी राजनीति महत्वाकांक्षा को साधने की आग को भड़काये रखने का खेल चल रहा है, उस पूरे प्रपंच को समय रहते समझने की जरूरत है...क्योंकि कहीं इन सभी महिला विषयक घटनाक्रमों, उत्पीडऩों, हिंसा व अराजकता की आड़ में पूरे समाज को ही भिड़ाने का खेल तो नहीं रचा जा रहा है...क्योंकि हाथरस में स्वार्थी महत्वाकांक्षा ध्वस्त होना उन तथाकथित बुद्धिजीवी लोगों की मानसिक रतौंधी को उजागर कर गया है, जो दुष्कर्म या महिला उत्पीडऩ के मामलों में भी जाति वैमनस्य फैलाने का चश्मा लगाकर ही सबकुछ देखने व दिखाने का खुराफाती खेल खेल रहे हैं...
उत्तरप्रदेश के हाथरस में दुष्कर्म का मामला अब पीछे छूट गया है...क्योंकि जो तमाम जांच रिपोर्ट सामने आ रही है..,वह तो यही कहती है कि दुष्कर्म हुआ ही नहीं था..? एक पल के लिए अगर इन सभी दावों को मिथ्या मान लें..,तब भी क्या किसी भी तरह के दुष्कर्म को सिर्फ जाति के चश्मे से देखना महिला हित में माना जा सकता है..? क्या अब जाति के आधार पर यह तय होगा कि किसके साथ हुए दुष्कर्म को दुष्कर्म की श्रेणी में देखकर उसके लिए न्याय सड़कों पर उतरकर मांगा जाए और अगर वह अगड़े-पिछड़े, दलित-वंचित तबके से दुष्कर्म पीडि़त नहीं है तो उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाए..? हाथरस में इस घृणित कृत्य के संदर्भ में समाज के सामने इसी तरह के अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं...यही कि आखिर हम किसी की अस्मत को तार-तार होते हुए देखकर उस पर भी जाति की, धर्म की या फिर अपने राजनीतिक स्वार्थ साधने की सियासत से कब उभरेंगे..? या फिर देश को जातियों के दलदल में धकेलने वाले ऐसे ही हाथरस मामलों को आगे बढ़ाएंगे..?
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 2012 में सामूहिक दरिंदगी का वह घृणित घटनाक्रम आज भी हर किसी को याद है...जिसके दोषी नरपिशाच कालकलवित यानी फांसी के फंदे पर अपने प्राण-पखेरू उड़ा चुके हैं...लेकिन निर्भया के साथ आजाद भारत में जिस तरह की दरिंदगी हुई, उसने हमारे पूरे तंत्र की उस तंद्रा को तोडऩे का काम किया था...जो दुष्कर्म के साथ ही दरिंदगी के मामलों पर कानून व न्यायालयीन प्रक्रियाओं के बेहद पेचीदा होने की आड़ लेकर ऐसे मामलों को रफा-दफा करने की कोशिश करता नजर आता है...लेकिन जब पूरे देश में निर्भया को न्याय दिलाने के लिए आक्रोशित जनसैलाब सड़कों पर उतरा तो न केवल नियम-कानूनों को बनाने वाली वह पूरी संसद हिल गई थी..,बल्कि न्याय पालिका को भी अपने स्तर पर महिला सुरक्षा एवं निर्भया कांड जैसी दरिंदगी की पुनरावृत्ति रोकने के लिए उठ खड़ा होना पड़ा था...उसी के बाद केंद्र ने नारी सुरक्षा को ध्यान में रखकर 'निर्भया फंडÓ का निर्माण किया था...लेकिन उसके बाद के कालखंड पर नजर डालें तो पता चलता है कि दिल्ली के बाद हैदराबाद से हाथरस तक ऐसे कई घृणित घटनाक्रम राजस्थान, केरल, कश्मीर, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा और हिमाचल.., सभी जगह हो चुके हैं...दूधमुंही और उन छोटी-छोटी मासूम बच्चियों की अस्मत को तार-तार करते नशेड़ी-वहशी दरिंदगी की हदें पार कर रहे हैं और उसे रोकने के जितने भी कानूनन प्रावधान कड़े हो रहे हैं, उतने ही ये वीभत्स घटनाक्रम बढ़ते चले जा रहे हैं...सही मायने में इसके लिए हमारे उस सामाजिक-मानसिक दृष्टिकोण को भी स्थितियां जिम्मेदार हैं, जो समाज का एक पक्ष देखकर स्थितियों को भुलाने या फिर किनारे करने का आदी हो चुका है...दिल्ली की निर्भया हो या हाथरस या फिर हैदराबाद के नरपिशाचों का हाथोंहाथ काम तमाम हो...ऐसे कितने दरिंदगी की पराकाष्ठा वाले घटनाक्रम ही जिनको लेकर आम जनता या नेता हर बार दिल्ली, हाथरस या हैदराबाद की भांति सड़कों पर न्याय मांगते नजर आए..? तो हर कोई कह देगा कि किसी चयनित मामले को जब सोशल मीडिया या अन्य संचार माध्यमों ने ऊंचाई दी तो उसी की आग में नेता-दल अपनी रोटियां सेंकने के लिए उतावले हो जाते हैं और होड़ मचाते हैं...
उत्तरप्रदेश के हाथरस का मामला एक सप्ताह तक जिस तरह से दरिंदगी की पराकाष्ठा के साथ सड़कों पर राजनीतिक दलों के लिए ऐसा मुद्दा बन गया था कि पूरे देश की बेटियों पर मानो पहाड़ टूट पड़ा...और इसमें राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार और केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार खलनायक के रूप में इस तरह से विपक्ष द्वारा देखी व बताई गई कि इन दोनों सरकारों को फांसी के फंदे पर लटकाया जाए...हाथरस जाने के लिए प्रियंका-राहुल का जी-तोड़ वह हास्यास्पद घटनाक्रम कौन भूलेगा..? जिसने तमाम विपक्ष घडिय़ाली आंसू बहाता नजर आया...आनन-फानन में मुद्दे को उसकी गंभीरता को और उसके कारण किस तरह से देश में, समाज में स्थितियां हिंसा व तनाव की बन सकती है, इसको समझे बिना पूरे घटनाक्रम को जाति आधार पर देखकर इस तरह से प्रतिक्रिया दी गई कि मानो पूरे भारत का दलित, वंचित समाज असुरक्षित हो चुका है...यह कुछ वैसा ही था जैसा रोहित वेमुला के मामले में अवार्ड वापसी गैंग ने खेल खेला था...इसके बाद रह-रहकर दलितों के उत्पीडऩ के विषयों को जबरिया बयानी आग लगाकर धधकाते रहने का प्रपंच कोई गुल न खिला पाया तो हताश-निराश विपक्ष हाथरस के घटनाक्रम को अपने लिए सबसे बड़ा अवसर मान बैठा था..,लेकिन हाथरस में उसकी स्वार्थी महत्वाकांक्षा ध्वस्त हो गई...अब इस लापरवाही की भरपाई विपक्ष करेगा..?
इसमें कोई दो राय नहीं है कि हाथरस में प्रशासनिक तंत्र के स्तर पर पूरे मामले को समझने-सुलझाने में चूक हुई या कहें कि यह जानबूझकर की गई वह लापरवाही है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता...लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अगर प्रशासन उस समय पीडि़ता का हाथोंहाथ अंतिम संस्कार नहीं करवाता तो देश में जाति हिंसा की आग किस तरह से विकराल रूप ले लेती...क्योंकि कुछ स्वार्थी तत्व तो यह चाहते थे... अमेरिका में जो नस्लीय हिंसा फैलाई गई थी, उसी की तर्ज पर पीएफआई (पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) ने जो षड्यंत्र रचा और मॉरीशस से लेकर अन्य विदेशी एनजीओ के जरिए हाथरस की हिंसा को जातीय दंगों में तब्दील करने के लिए 100 करोड़ की फंडिंग हुई और 4 लोगों को इस मामले में हिरासत में लिया गया...इससे इतना तो साफ हुआ कि अगर समाज, सरकार व देश के जिम्मेदार नागरिक या कहें कि पूरा तंत्र सतर्क, सचेत नहीं रहेगा और झूठी संवेदनाओं को समाज का सत्य मानकर उसके बहाव में बहता चला जाएगा तो देश को बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है...हाथरस के घटनाक्रम ने संवेदनाओं को तो झकझोरा ही है..,लेकिन उस स्याह षड्यंत्र का भी पूरा पिटारा खोल दिया है, जो देश को जातीय हिंसा की आग में झोंकने के निरंतर षड्यंत्र रच रहा है...