विकास की राह में सबसे बड़ा अवरोधक भ्रष्टाचार
   Date09-Jan-2020

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रमेशचन्द्र त्रिपाठी
जै सा कि हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार और अपराध की प्रवृत्तियों ने हमारे समाज में व्यापक रूप से अपनी जड़ें फैला रखी हैं। भू-आंदोलन के प्रणेता आचार्य विनोबा भावे ने भ्रष्टाचार को व्याख्यायित करते हुए कहा है कि 'भ्रष्टाचार तो शिष्टाचार हो गया है। जब सभी लोग ऐसा करने लगे तो वह भ्रष्टाचार न होकर शिष्टाचार हो जाता है। भ्रष्टाचार तभी तक है, जब कुछ लोग उसे करें, लेकिन सब लोग उसे अपना लें तो वह भ्रष्टाचार न होकर शिष्टाचार हो जाता है।
विडम्बना देखिये देश को यदि मोदी के रूप में एक ईमानदार प्रधानमंत्री मिला भी है तो समाज के कुछ तथाकथित लोग (हमारे और आपके बीच से) उनके काम को लेकर छिंद्रान्वेषण करने से बाज नहीं आ रहे हैं। वामपंथियों और कांग्रेसियों को उनके हर काम में कमी नजर आती है। यहां तक कि स्वच्छ भारत मिशन को भी वे राजनीतिक चश्में से देखते हैं, जिसकी प्रशंसा संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी की है। आश्चर्य तो तब होता है, जब प्रबुद्ध वर्ग कुतर्क करके उनके काम को गलत साबित करने की कोशिश करता है।
भ्रष्टाचार खत्म न होने का एक कारण यह भी है कि हमारे अगुआ (नेता) अधिकारी स्वयं इसमें संलिप्त हैं। ताजा मामला महाराष्ट्र का है, राकांपा के अजीत पवार पर सिंचाई विभाग का अरबों-खरबों घोटाले का आरोप है, फिर भी उन्हें उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई। ऐसे में ये भ्रष्टाचारी नेता अधिकारियों पर क्या प्रतिबंध लगा पाएंगे आप स्वयं विचार कर सकते हैं। इसी भ्रष्टाचार पर सरकारी विभाग के एक अधिकारी से बात हुई तो वह लापरवाही से बोला, जब देश का नेता आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है तो वह किस मुख से अधिकारियों पर सख्ती करेगा। जब अगुआ हो लूट-खसोट कर रहा है तो हम तो नौकरशाह हैं। हमारे जैसे लोगों के भ्रष्टाचार करने से थोड़े ही देश की अर्थव्यवस्था पर फर्क पड़ता है। समुद्र से एक लोटा जल निकाल लेने से उसकी गरिमा नहीं घट जाएगी और न ही उसमें पानी की कमी होगी। जो नेता आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा रहता है वह मीडिया के सामने बड़े दर्प से कहता है कि मेरे ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप साबित नहीं हुआ है। मैं भ्रष्टाचारी नहीं हूं। सरकार मुझे बदनाम करने की कोशिश कर रही है। ऐसे लोग जेल की सजा भी काट चुके रहते हैं। ताज्जुब तब होता है, जब ऐसे भ्रष्टाचारी लेखक और विद्वान बनकर दैनिक पत्रों में लेख लिखते हैं, उससे भी बड़ा आश्चर्य जब दैनिक पत्र के संपादक उनको प्रमुख आर्टिकल बनाकर पत्र में प्रकाशित करते हैं। ऐसे विद्वानों का केंद्रीय विचार वर्तमान सरकार की बखिया उधेड़ता रहता है। येन केन प्रकारेण वे जनता के सामने सरकार की बिना सिर-पैर की कमियां दिखाना चाहते हैं। यानी विशुद्ध रूप से अपने लेख के माध्यम से लोगों को बरगलाने की कोशिश करते हैं। ये बने हुए विद्वान ऐसे-ऐसे उदाहरण देंगे कि जो उस विषय का माहिर खिलाड़ी होता है वह भी गच्चा खा जाता है, माथा पकड़कर बैठ जाता है। दैनिक पत्र के संपादक समझते हैं कि ऐसे बने हुए विद्वान का लेख प्रकाशित करने से लोग हमारे पत्र को अहमियत देंगे तो उनकी ये भूल है। उनके लेख को पढ़कर पाठक मुंह ही बिचकाता है, क्योंकि उसके मानस पटल पर वह व्यक्ति भ्रष्टाचारी के रूप में अंकित हो चुका रहता है। वह कुछ भी लिखे लोगों को विश्वास नहीं होता है। हमारी मीडिया बिरादरी न जाने क्यों उनको सिर पर बिठाए रहती है। विस्मय तब होता है, जब हमारे भाई-बंधु उनकी रिहाई के लिए हवन-यज्ञ करते हैं और जब वे रिहा हो जाते हैं, तब मीडिया उनके आगे-पीछे माइक लेकर ऐसे घुमती है, जैसे अगला ओलंपिक पदक जीतकर आया हो। हम ऐसे भ्रष्टाचारियों का बहिष्कार क्यों नहीं करते हैं। मैं आज तक नहीं समझ पाया हूं। भ्रष्टाचार देश से तब तक नहीं खत्म होगा जब तक हम और आप ऐसे लोगों का बहिष्कार नहीं करेंगे। जैसे अपराधियों पर अपराध साबित हो जाने पर चुनाव आयोग ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया है। चुनाव लडऩे को लेकर ठीक वैसे ही भ्रष्टाचार सिद्ध हो जाने पर भ्रष्टाचारियों पर आजीवन प्रतिबंध लगना चाहिए। उन पर ही नहीं चुनाव में प्रत्याशी बनने को लेकर उनके समस्त परिवार पर प्रतिबंध लगना चाहिए। यहां तक कि उनके रिश्तेदारों पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए।
मोदी सरकार देश से भ्रष्टाचार समाप्त करना चाह रही, इस पर उनकी टीम काम भी कर रही है, लेकिन उनके नौकरशाह, सरकारी अधिकारी, कर्मचारी, बाबू उनकी इस मुहिम में पलीता लगा रहे हैं। आईजी अमिताभ ठाकुर और सपा प्रमुख (उस समय) मुलायमसिंह यादव का विवाद किसी से छिपा नहीं है। जब तक सपा सत्ता में रही, तब तक अमिताभ ठाकुर निलंबित रहे। 2017 में जब भाजपा सत्ता में आई, तब अमिताभ ठाकुर को ससम्मान उनके पद पर लौटाया गया और कुम्भ मेले की यातायात की जिम्मेदारी सौंपी गई। जिले में यदि कोई ईमानदार जिलाधिकारी, एसएसपी आ जाता है और वह सख्ती करने लगता है तो सत्तापक्ष के लोग जो चुनाव के समय भ्रष्टाचार पर बड़े-बड़े भाषण देते हैं, उसके ट्रांसफर में एड़ी से चोटी का जोर लगा देते हैं। यही नहीं कुछ जनप्रतिनिधि तो उनके साथ बदसलूकी भी करते हैं। सिर्फ नेता ही नहीं, नीचे के अधिकारी, कर्मचारी, बाबू भी उसके ट्रांसफर की दुआ करते हैं, उसकी ईमानदारी और सख्ती से त्रस्त होकर आंदोलन करते हैं, क्योंकि वे जनता-जनार्दन से पैसा नहीं कमा पाते हैं। कहीं-कहीं तो यह आंदोलन इतना उग्र रूप ले लेता है कि सरकारी कामकाज में व्यवधान उत्पन्न होने लगता है। सरकारी कामकाज के साथ लोगों को भी अच्छी-खासी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। महीनों लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है। इसी बीच यदि कोई जनहित याचिका या मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत कर देता है तो उसे अधिकारियों, कर्माचारियों और बाबुओं का कोपभाजन बनना पड़ता है। इसके इतर उसे पब्लिक का भी कोपभाजन बनना पड़ता है। देश से भ्रष्टाचार खत्म करना उतना ही मुश्किल है जितना गधे के सिर पर सींग होना। देश में भ्रष्टाचार को लेकर दो धड़े हैं। एक पक्ष में, दूसरा विरोध में। इस पक्ष-विपक्ष में जनता भी शामिल है। जनता में कुछ लोग ऐसे हैं जो रिश्वत का व्यापार करना चाहते हैं, नेताओं, अधिकारियों से मिलकर कर भी रह रहे हैं। देखा जा रहा है कि नेता ही अधिकारियों पर दबाव डालते हैं घूसखोरी, रिश्वतखोरी के लिए। देखा ये भी जा रहा है कि भ्रष्टाचार को लेकर नेताओं ने ऐसा जाल फैला रखा है कि इस जाल से देश को मुक्ति मिलना नामुमकिन ही नहीं असंभव भी है।
किसी पश्चिमी विचारक ने भारत के सरकारी कार्यालयों के विषय में ठीक कहा है कि 'भारत में कागज कछुए की चाल से चलता है, जिसके कारण सार्वजनिक कामों में पारदर्शिता नहीं आ पाती है।Ó जिन्हें हम प्रबुद्ध कहते हैं वे स्वयं भ्रष्टाचार खत्म करने की बजाय बढ़ाने में लगे हुए हैं। ऐसे लोग भ्रष्टाचार पर लंबा चौड़ा भाषण तो देंगे, लेकिन सुविधा शुल्क की जहां बात आएगी सारे नियम-कानून ताक पर रखकर पैसा देकर काम कराने में सबसे आगे हैं। हम क्यों नहीं सोचते हैं कि ऐसा करके हम गरीब जनता के लिए मुसीबत बन रहे हैं। क्या ये विचार करने योग्य बात नहीं है कि गरीब निरीह जनता छोटे-मोटे कामों के लिए पैसा कहां से देगी। यह भी देखा जा रहा है कि जो सुविधा शुल्क नहीं दे पाता है, उसका काम भी नहीं होता है। यदि जमीन का मसला है तो समझ लीजिये जमीन उसके हाथ से निकल जाएगी। यह जमीनी सच्चाई है। सरकारी कोई भी डिपार्टमेंट इससे अछूता नहीं है।
यह अंधाधुंध बहाव ही वास्तव में किसी को ठहरकर सोचने नहीं देता। चोरी-छिपकर भ्रष्टाचार किया जाना ही इस बात की गवाही दे रहा है कि यह दुष्प्रवृत्ति मूल प्रवृत्ति बन गई है। लोग भ्रष्टाचार कर रहे हैं, किन्तु उसका बुरा मानकर अपने इस कुकृत्य के प्रति भयभीत भी हैं। जिस दिन यह भय निकाल जाएगा उस दिन समझना चाहिए कि लोग मूल रूप से भ्रष्टाचारी हो गए हैं उनके हृदयों से मनुष्यता का प्रकाश पूर्ण रूप से समाप्त हो गया है।