कर्तव्य पथ
   Date18-Jan-2020

prernadeep_1  H
प्रेरणादीप
इस बच्चे का टिकिट कहां है? टिकिट जांच कर्ता ने अहमदाबाद से वैरावल जाने वाली सोमनाथ मेल में यात्रा कर रही एक बुढिय़ा से पूछा। बेटा! इस बच्चे की उम्र अभी बहुत कम है, इसलिए इसका टिकिट नहीं लिया। कितनी है इसकी उम्र। पांच साल बेटा। वृद्धा ने सच-सच बता दिया। पांच साल? तीन साल के बाद पूरा किराया लगता है माँ। बिना टिकिट के अब पूरा किराया लगेगा। अहमदाबाद से वैरावल का दोगुना किराया सुनकर बुढिय़ा घबरायी और अपनी अज्ञान जनित भूल के पश्चाताप को शब्दों में व्यक्त करने में विवश होने के कारण वह फूट-फूटकर रोने लगी। डिब्बे के यात्री भी निरीक्षक से आग्रह करने लगे कि वे वृद्धा को क्षमा कर दें। परंतु ऐसा करने पर उसके लिए राष्ट्रीय कुसेवा होती। इस तरह करूणा व कर्तव्यपालन की दुविधा में परीक्षक महोदय डूबे थे। उसी समय उनकी बुद्धि ने बीच का मार्ग निकाल लिया। उसने उस बच्चे के दोगुने किराए की ही रसीद बनाई, किंतु वृद्धा से आधे ही पैसे लिए और आधे पैसे अपने पास से भर दिए। उस समय वृद्धा की कृतज्ञतापूर्ण दृष्टि टिकिट परीक्षक पर आशीष का मूक अभिषेक कर रही थी।